गंगा के लिए 126 दिनों से अनशन पर बैठे स्वामी गोपालदास, जिन्हें प्रशासन ने शुक्रवार को अस्पताल में भर्ती कराया है. (फोटो: रामेश्वर गौड़ )
Text Size:
  • 898
    Shares

दिल्ली हाई कोर्ट ने हैबियस कापर्स (बंदी प्रत्यक्षीकरण) के तहत सरकार को आदेश दिया है कि गोपाल दास को हाज़िर करें. गोपाल दास एक संत हैं, जो तकरीबन दो सौ दिनों से गंगा के गंगत्व के लिए अनशन पर हैं या यूं कहें​ कि अनशन पर थे. अब लापता हैं. अंतिम बार वे दून अस्पताल के वार्ड नंबर 14 के बेड नंबर 15 पर देखे गए थे.

प्रख्यात पर्यावरणविद प्रोफेसर जीडी अग्रवाल की शहादत के बाद देश का ध्यान गोपाल दास की तरफ गया. अग्रवाल की मौत से हड़बड़ाई सत्ता ने उन्हें उठाकर कभी ऋषिकेश, तो कभी दिल्ली एम्स में भर्ती करा दिया. 5 दिसंबर को गोपालदास लापता हो गए. पहले तो एम्स प्रशासन ने उनके गायब होने पर अनभिज्ञता ज़ाहिर की. उनके पिता घंटों एम्स में बैठे रहे, लेकिन डाक्टरों ने बार-बार यही कहा कि हमें नहीं पता गोपाल दास कहां चले गए. जब राजनीतिक दबाव बढ़ा तब एम्स निदेशक रणदीप गुलेरिया सामने आए. उन्होंने तर्क दिया कि गोपाल दास पूरी तरह स्वस्थ थे और उनकी इच्छानुसार उन्हें छुट्टी दे दी गई. महीनों से अनशन पर बैठा शख्स ‘पूरी तरह स्वस्थ’ कैसे होता है, यह गुलेरिया ही जानते होंगे.

उस दिन एम्स की गाड़ी गोपाल दास को लेकर देहरादून पहुंची और कलेक्टर के घर के बाहर उन्हें छोड़ कर चली गई. गोपाल दास की नाक में ट्यूब लगी हुई थी, जिससे खून बह रहा था. कलेक्टर के घर के बाहर अकेले खड़े गोपाल दास ने अपने एक साथी को फोन किया, वे गोपाल दास को लेकर मैक्स अस्पताल पहुंचे जहां गोपाल दास की हालात देख कर मैक्स ने एमएलसी (मेडिको लीगल केस) बता इलाज करने से मना कर दिया. तब उनके साथी उन्हें लेकर दून अस्पताल पहुंचे और उन्हें एडमिट करा दिया. दून अस्पताल का रिकॉर्ड बताता है कि 5 दिसंबर रात 1.25 बजे उन्हें एडमिट किया गया.

उसी रात को वे दून अस्पताल से गायब हो गए.


यह भी पढ़ें: अविरल गंगा के लिए चौथे संत की ज़िंदगी दांव पर


प्रशासन सीसीटीवी फुटेज के आधार पर दावा कर रहा है कि वे खुद उठ कर अस्पताल से बाहर चले गए, लेकिन अब तक ऐसा कोई फुटेज सार्वजनिक नहीं किया गया है. गायब होने से पहले दिए अपने बयान में गोपाल दास ने कहा कि उन्हें नहीं पता वे कैसे देहरादून पहुचे. वे यह भी नहीं समझ पा रहे कि सरकार क्यों उन्हें मेडिकल टूरिज्म कराने पर अामादा है. अस्पताल को सीसीटीवी फुटेज इसलिए भी सामने रखना चाहिए, क्योंकि इससे पहले अस्पताल के स्टाफ की बदसलूकी की खबरें भी सामने आई थीं.

नवंबर में ऋषिकेश एम्स में गोपाल दास को ज़बर्दस्ती भर्ती किया गया था. जहां एक जूनियर रेजिडेंट ने उनके साथ हाथापाई की और उन्हें सरकार और डाक्टरों को परेशान करने वाला बताया. किसी आशंका के डर से गोपाल दास की मां ने प्रशासन से बेटे को वापस लाने की अपील की. वे दत्तात्रेय घाट, ऋषिकेश पर अनशन पर भी बैठ गईं, जिन्हें पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने समझा—बुझा कर उठाया. लेकिन गोपाल दास की कोई खबर नहीं मिली.

हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा हुआ है. पुलिस ने गोपाल दास के साथी आचार्य रविंद्र के हवाले से यह दावा ज़रूर किया कि वे आंध्र प्रदेश में हैं और सुरक्षित हैं. लेकिन इस दावे के बाद से आचार्य रविंद्र भी गायब हैं. आचार्य रविंद्र ने यह बयान हमीरपुर में दिया था.

इस बीच उत्तराखंड सरकार ने कोर्ट को बताया कि गोपालदास उत्तराखंड में ही हैं. इन अलग—अलग बयानों से आशंका बढ़ रही है. यदि वे उत्तराखंड में हैं तो कहां है, किसी से मिल क्यों नहीं रहे, या बात क्यों नहीं कर रहे. और क्या आचार्य रविंद्र ने आंध्र प्रदेश वाला बयान पुलिस के दबाव में दिया था. यदि वे आंध्र प्रदेश में थे तो पुलिस ने उन्हें ढूंढ़ने की कोशिश क्यों नहीं की.


यह भी पढ़ें: गंगा के लिए दो और संतों ने शुरू किया उपवास, गोपालदास के अनशन का 126वां दिन


हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद उत्तराखंड पुलिस प्रमुख ने इस आधार पर गोपाल दास को ढूंढ़ने से इंकार कर दिया कि किसी ने भी पुलिस के पास उनकी गुमशदगी दर्ज नहीं कराई. राज्य पुलिस हैबियस कार्पस को शायद जानती ही नहीं कि ये क्या होता है. मातृ सदन के उनके साथियों सहित किसी को भी जानकारी नहीं है कि वे हैं कहां. यदि उनके गायब होने में पुलिस की भूमिका नहीं होती तो पुलिस अब तक उन्हें पेश कर चुकी होती.

गोपाल दास के एक और साथी विकास भी गायब हैं. उनका फोन भी बंद है. पुलिस की चुप्पी एक शंका ज़रूर पैदा करती है कि उसे सब कुछ पता है और स्थिति उसके नियंत्रण में हैं. पुलिस ने अब तक गोपाल दास या उनके किसी साथी के मोबाइल को सर्विलांस पर भी नहीं लगाया. पुलिस के लिए उनकी लोकेशन पकड़ना मुश्किल नहीं है. लेकिन ऊपर से आदेश है कि इस मुद्दे पर कोई पहल नहीं करना है. वास्तव में सरकार गोपालदास और आत्मबोधानंद जैसे संन्यासियों से बात ही नहीं करना चाहती. उसे लगता है मीडिया को मैनेज कर गंगा सफाई पर उठ रहे सवालों को दबाया जा सकता है.

यही कारण है कि देश में चल रहे अनशनों के बीच गंगा मंत्रालय अंतर्राष्ट्रीय भागीदारों के साथ सेमिनार करने में व्यस्त है. जीडी अग्रवाल से फोन पर बातचीत लीक होने के बाद से गंगा संरक्षण मंत्री नितिन गडकरी किसी भी आंदोलनकारी से सीधे बात करने से कतरा रहे हैं. हालांकि, वह फोन टैप और लीक अग्रवाल की ओर से नहीं हुआ था, क्योंकि जीडी अग्रवाल मोबाइल नहीं रखते थे. माना जाता है कि अग्रवाल और गडकरी के बीच बातचीत उमा भारती ने अपने फोन से कराई थी.

इस बात की भी पूरी आशंका है कि गोपाल दास को पुलिस ने अपनी निगरानी में रखा हो और उन्हें ज़बर्दस्ती भोजन दिया जा रहा हो, गायब होने से पहले वे कई बार मनोवैज्ञानिक दबाव की बात कह चुके थे. क्योंकि उनके साथी भी उनके नाम पर डील करने में लगे थे. गोपाल दास इस बात से भी दुखी थे, मुद्दे पर बात करने के बजाए आंदोलन से जुड़े लोगों में सेनापति बनने की होड़ मची है.

हाईकोर्ट सहित पर्यावरण से जुड़े सभी लोग यह इंतज़ार कर रहे हैं कि प्रशासन उन्हें कोर्ट के सामने पेश करे और कोई अनहोनी न हुई हो.

(अभय मिश्रा लेखक और पत्रकार हैं.)


  • 898
    Shares
Share Your Views

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here