गंगा के लिए 126 दिनों से अनशन पर बैठे स्वामी गोपालदास, जिन्हें प्रशासन ने शुक्रवार को अस्पताल में भर्ती कराया है. (फोटो: रामेश्वर गौड़ )
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अविरल गंगा की मांग को लेकर अनशन कर रहे प्रो. जीडी अग्रवाल का निधन हो गया. उनके साथ ही अनशन कर रहे स्वामी गोपालदास भी 112 दिनों से अनशन पर हैं.

नई दिल्ली: गंगा के अविरल बहाव को लेकर चल रहा आंदोलन अब तक तीन संतों की जान ले चुका है. लेकिन ऐसा लगता है कि स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद उर्फ प्रो. जीडी अग्रवाल की मौत के बाद भी यह रुकने वाला नहीं है. हरिद्वार के मातृसदन से जुड़े स्वामी गोपालदास ने भी जीडी अग्रवाल के ही साथ अनशन शुरू किया था. 13 अक्टूबर को उनके अनशन का 112वां दिन पूरा हो जाएगा. 20 अक्टूबर को मातृसदन के स्वामी शिवानंद भी अपने अनशन की घोषणा करेंगे. वे उसी दिन या उसके बाद कभी भी अपना अनशन शुरू कर सकते हैं.

मातृसदन के अध्यक्ष स्वामी शिवानंद 20 अक्टूबर को अपने अनशन की घोषणा करेंगे. (फोटो: विशेष व्यवस्था )

स्वामी सानंद (अग्रवाल) से पहले स्वामी निगमानंद और गोकुलानंद गंगा के लिए अनशन करते हुए अपनी जान गवां चुके हैं. स्वामी के बाद अनशन कर रहे गोपालदास को प्रशासन ने अस्पताल में भर्ती कराया है. निगमानंद ने भी 114 दिन तक अनशन किया था और 13 जून, 2011 को देहरादून के जौलीग्रांट अस्पताल में उनका निधन हुआ था.

स्वामी निगमानंद के साथ ही स्वामी गोकुलानंद ने भी अनशन शुरू किया था. इन दोनों संतों का अनशन गंगा में अवैध खनन के खिलाफ था. निगमानंद के देहांत के बाद गोकुलानंद ने अनशन जारी रखा. 2013 में वे एकांतवास पर चले गए, बाद में उनका शव बामनी में बरामद हुआ. इन दोनों संतों की मौत के मामले में आरोप लगा था कि उन्हें जहर दिया गया था, हालांकि, ये आरोप साबित नहीं हो सके.

मातृसदन से प्रो. आत्मबोधानंद ने दिप्रिंट को बताया, ‘स्वामी गोपालदास जी को 12 अक्टूबर की रात को प्रशासन ने उठा लिया. उनको नाक में ड्रिप लगाकर तरल भोजन दिया जा रहा है, लेकिन उन्होंने अपना अनशन जारी रखा है. गोपालदास ने अपना ड्रिप निकाल दिया है.’

उन्होंने बताया, ‘प्रशासन स्वामी सानंद जी का पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए नहीं दे रहा है. शनिवार को मातृसदन के लोग स्वामी सानंद के अनुयायियों के साथ एम्स जाएंगे और अंतिम दर्शन के लिए शरीर को मातृसदन भेजने की मांग करेंगे.’ हालांकि, नियम यही है कि अगर किसी ने अपना शरीर दान किया है तो उसे वापस पाने के लिए दावा नहीं किया जा सकता है.

गंगा में खनन के खिलाफ अनशन के दौरान स्वामी निगमानंद की भी मौत हो गई थी. (फोटो: विशेष व्यवस्था)

प्रशासन का तर्क है कि स्वामी सानंद ने अपना शरीर दान किया था. इसलिए उसे एम्स में ही रखा गया है. लेकिन संतों का कहना है कि यह सही है कि उन्होंने अपना शरीर दान कर दिया था, हम उनकी उस इच्छा का सम्मान करते हैं, लेकिन कम से कम अंतिम दर्शन के लिए उनका शरीर कुछ देर के लिए मातृसदन में या कहीं भी रखना चाहिए ताकि लोग अंतिम बार उनका दर्शन कर सकें.

आत्मबोधानंद ने कहा, ‘स्वामी जी के शरीर को तीन दिन के लिए ओपेन मार्च्युरी में रख दिया जाए. कल जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने एम्स जाकर मांग की कि शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा जाए. आज फिर हम लोग जाएंगे. उम्मीद है कि हमारी यह मांग मान ली जाएगी.’

आंदोलन नहीं रुकेगा

गंगा सफाई का चुनावी अभियान चलाने वाली भाजपा के लिए गंगा मुसीबत बन सकती है क्योंकि स्वामी सानंद की मौत के बाद संतों में गुस्सा बढ़ रहा है. ऐसी खबर है कि बनारस में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद भी अनशन पर बैठ सकते हैं.

आत्मबोधानंद ने गुस्सा जताते हुए कहा, ‘यह आंदोलन रुकेगा नहीं. गोपालदास जी अनशन पर हैं. स्वामी शिवानंद भी अनशन पर बैठेंगे. हम सभी लोग अपना बलिदान देने को तैयार हैं. अगर गुरुदेव को कुछ होता है तो हम सब एक एक करके अनशन पर बैठेंगे.’

स्वामी सानंद ने 112 दिन तक अनशन किया था. 10 अक्टूबर को उन्होंने पानी भी त्याग दिया था. 11 अक्टूबर को एम्स ऋषिकेश में उनकी मौत हो गई.

सरकार की कोशिश है आंदोलन दबा दिया जाए

प्रो. आत्मबोधानंद का आरोप है कि ‘स्वामी सानंद के देहावसान के बाद भी सरकार ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. बल्कि सरकार की कोशिश है कि कैसे इस आंदोलन को दबा दिया जाए. वे अफवाह उड़ा रहे हैं कि स्वामी सानंद की 80 प्रतिशत मांग मान ली गई है. इन लोगों ने कोई मांग नहीं मानी. उमा भारती आई थीं लेकिन इसलिए नहीं कि मांग मान ली गई है. बल्कि वे इसलिए आई थीं कि अनशन तोड़ दिया जाए.’

देहांत से पहले स्वामी सानंद उर्फ प्रो. जीडी अग्रवाल. (फोटो: विशेष व्यवस्था)

स्वामी सानंद की मौत के बाद पीटीआई के हवाले से मीडिया में खबर छपी कि केंद्र सरकार ने उनकी ज़्यादातर मांगें मान ली थीं, लेकिन मातृसदन के प्रो. आत्मबोधानंद ने इसका खंडन किया है.

वे आरोप लगाते हैं, ‘स्वामी सानंद के पास तीन अगस्त को नितिन गडकरी जी का फोन आया था. फोन पर हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि अनशन तोड़ दीजिए. इस पर स्वामी जी ने कहा कि हमारी मांग मानी नहीं गई है इसलिए हम अनशन नहीं तोड़ेंगे. इस पर गडकरी ने कहा कि आपको जो करना है कीजिए. और फोन काट दिया.’

सानंद की मौत और गंगा पर राजनीति

11 अक्टूबर को ही स्वामी सानंद की मौत के बाद केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने गंगा सफाई अभियान को लेकर तीन ट्वीट किए. लेकिन स्वामी सानंद की मौत पर कुछ नहीं कहा. हमने कई बार उनसे फोन पर बात करने की कोशिश की लेकिन बात नहीं हो सकी.

राहुल गांधी भी ट्विटर पर जीडी अग्रवाल की लड़ाई को आगे ले जाने की घोषणा कर चुके हैं. 12 अक्टूबर को उन्होंने ट्वीट किया, ‘मां गंगा के सच्चे बेटे प्रो. जीडी अग्रवाल नहीं रहे. गंगा को बचाने के लिए उन्होंने स्वयं को मिटा दिया. हिंदुस्तान को गंगा जैसी नदियों ने बनाया है. गंगा को बचाना वास्तव में देश को बचाना है. हम उनको कभी नहीं भूलेंगे. हम उनकी लड़ाई को आगे ले जाएंगे.’

यह बताने की जरूरत नहीं है कि प्रो. अग्रवाल से पहले दो संतों की मौत हो चुकी है. पिछले दस साल तक केंद्र में सत्ता में रही कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार ने वही रवैया अपनाया था जो अभी एनडीए सरकार ने अपनाया. यानी गंगा के नाम पर राजनीतिक लाभ लेने में न भाजपा पीछे है, न ही कांग्रेस पीछे रहना चाहती है.

पं. मालवीय के साथ हुआ था अविरल गंगा समझौता

गंगा के लिए प्राण त्यागने वाले प्रो. जीडी अग्रवाल और अन्य लंबे समय से गंगा में खनन और अंधाधुंध बांध बनाने का विरोध करते रहे हैं. उनका कहना था कि आईआईटी के प्रोफसरों ने मिलकर अध्ययन किया था और कहा था कि गंगा की धारा में 50 प्रतिशत अविरल रहना चाहिए.

अपने देहांत से पहले उन्होंने मीडिया के लिए एक वीडियो रिकॉर्ड करवाया था, जिसमें वे कह रहे हैं कि ‘गंगा में अविरल प्रवाह के लिए 1916 में मदन मोहन मालवीय की अगुवाई में सरकार से एक समझौता किया गया था, जिसमें कहा गया था कि हरि की पैड़ी पर गंगा की धारा में न्यूनतम प्रवाह पूरे वर्ष एक हज़ार क्यूसेक रहेगा. ये उस समझौते में था. लेकिन सरकार ने यह सुनिश्चित नहीं किया.’

क्या है मांग

स्वामी सानंद और उनके सहयोगी उनकी मुख्य रूप से चार मांगे थीं…

1. गंगा के लिए गंगा-महासभा द्वारा प्रस्तावित अधिनियम ड्राफ्ट 2012 पर संसद में चर्चा कराकर पास कराया जाए. (इस ड्राफ्ट के प्रस्तावकों में जीडी अग्रवाल, एडवोकेट एमसी मेहता और डा. परितोष त्यागी शामिल थे), ऐसा न हो सकने पर उस ड्राफ्ट के अध्याय–1 (धारा 1 से धारा 9) को राष्ट्रपति अध्यादेश द्वारा तुरंत लागू किया जाए. इसमें गंगा के 50 प्रतिशत प्रवाह को सुनिश्चित करने की बात कही गई थी.

2. उक्त प्रस्ताव के अन्तर्गत अलकनंदा, धौलीगंगा, नंदाकिनी, पिंडर तथा मंदाकिनी नदियों पर सभी निर्माणाधीन और प्रस्तावित परियोजनाएं तुरंत निरस्त की जाएं. गंगाजी और उसकी सहायक नदियों पर सभी प्रस्तावित जलविद्युत परियोजनाओं को भी निरस्त किया जाए.

3. उपरोक्त ड्राफ्ट अधिनियम की धारा 4 (डी) वन कटान तथा 4(एफ) खनन, 4 (जी) किसी भी प्रकार की खुदान पर पूर्ण रोक तुरंत लागू कराना, विशेष रूप से हरिद्वार कुंभ क्षेत्र में.

4. एक गंगा-भक्त परिषद का प्रोविजिनल गठन हो, इसमें नामांकित 20 सदस्य हों, जो गंगा और केवल गंगा के हित में काम करने की शपथ लें और गंगा से जुड़े सभी विषयों पर इसका मत निर्णायक माना जाए.

बनारस के संतों में गुस्सा

स्वामी सानंद के गुरु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का आरोप है कि स्वामी सानंद की साजिश के तहत हत्या की गई है. अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रो. जीडी अग्रवाल को दीक्षा देकर स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद बनाया था. उनका कहना है कि सेहत के नाम पर प्रशासन ने उन्हें ज़बरदस्ती उठाकर इस घटना को अंजाम दिया है, जबकि उनका स्वास्थ्य पूरी तरह से ठीक था. उन्होंने सरकार के उस दावे को भी खारिज किया है कि स्वामी सानंद की 80 प्रतिशत मांगों को मान लिया गया था.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के सहयोगी मयंक ने बनारस से दिप्रिंट को बताया, ‘अभी तो स्वामी सानंद का पार्थिव शरीर नहीं मिल पा रहा है. प्रशासन ने शव देने से इनकार कर दिया है. हमारी मांग है कि उनका शरीर तीन दिनों के लिए हमें सौंपा जाए ताकि उनके शरीर को गंगा स्नान कराया जाए और गंगा भक्त उनके अंतिम दर्शन कर सकें. इसके बाद प्रशासन उनका शव ले सकता है. हम स्वामी सानंद की इच्छा का सम्मान करते हैं, लेकिन उनको अंतिम गंगा स्नान करवाने के लिए हम शरीर की मांग कर रहे हैं.’

क्या काशी में भी अनशन या आंदोलन हो सकता है, इस सवाल पर उन्होंने कहा कि ‘शनिवार को दो बजे प्रशासन से संतों की मीटिंग है. आज उनका शव मिल जाएगा तो पहले स्वामी सानंद को गंगा स्नान व जरूरी संस्कार पूरे किए जाएंगे. इसके बाद आगे की रणनीति तय की जाएगी.’

जो भी हो, लेकिन चिंताजनक तथ्य यह है कि एक और संत की जिंदगी दांव पर है और गंगा की हालत जस की तस. क्या अब नमामि गंगे जैसी परियोजनाओं की प्रासंगिकता पर नये सिरे से चर्चा होगी?


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