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Tuesday, 28 July, 2026
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Gen Z की नाराज़गी किसी एक मुद्दे को लेकर नहीं, शिकायत है कि सत्ता उनकी बात नहीं सुन रही

मोदी कैबिनेट में बड़े बदलाव की ज़रूरत है. इसमें नए और युवा चेहरों को शामिल करना होगा और यह बदलाव साफ दिखना भी चाहिए.

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धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेकर, भले ही मजबूरी में मोदी सरकार ने शायद अपनी राजनीतिक स्थिति संभालने और नई रणनीति बनाने के लिए थोड़ा समय खरीद लिया है, लेकिन यह समय शायद महीनों का नहीं, बल्कि कुछ हफ्तों का ही हो क्योंकि अब एक बार शुरुआत हो गई है, तो लोगों की हर बड़ी नाराज़गी खुलकर सामने आ सकती है. कुछ मुद्दे जंतर-मंतर तक भी पहुंच सकते हैं. पहले ही E20 जनता पार्टी बनने की तैयारी हो रही है. इसमें वे वाहन मालिक शामिल हैं जो मानते हैं कि E20 (एथेनॉल मिला पेट्रोल) उनकी गाड़ियों को नुकसान पहुंचा सकता है. जल्द ही किसान और दूसरे समूह भी इस तरह के आंदोलन में शामिल हो सकते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह समझते हुए कि जंतर-मंतर का आंदोलन जेन ज़ी (15 से 29 साल के युवा) और उनके इंस्टाग्राम पोस्ट से आगे बढ़ा, खुद भी इंस्टाग्राम पर सक्रियता बढ़ाई है. इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन उन्हें यह नहीं मान लेना चाहिए कि सिर्फ इंस्टाग्राम पर आने से सरकार को लेकर लोगों की सोच बदल जाएगी. वजह यह है कि प्रधानमंत्री खुद अपनी उम्र को बार-बार सामने ला रहे हैं और हो सकता है कि यह तरीका जेन ज़ी पर असरदार न हो.

तो सरकार को आखिर करना क्या चाहिए?

सबसे पहली और सबसे ज़रूरी बात यह है कि सरकार सिर्फ ऊपर से फैसले लेने की बजाय युवाओं से बातचीत करे. जेन ज़ी की नाराज़गी किसी एक मुद्दे को लेकर नहीं है. उनकी नाराज़गी इस बात से है कि सत्ता में बैठे लोग यह नहीं सुनते कि वे क्या सोचते हैं, ज़िंदगी से क्या चाहते हैं और किन मुद्दों को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं. बेशक, भविष्य और रोज़गार उनके लिए बड़ा मुद्दा है, लेकिन बात सिर्फ वहीं खत्म नहीं होती. वे चाहते हैं कि उनकी बात सुनी जाए. पहली बार अपनी ताकत दिखाने के बाद अब जेन ज़ी फिर से चुपचाप पढ़ाई में लौटने वाला नहीं है.

मोदी सरकार की समस्या यह है कि ऊपर से लिए गए अच्छे इरादों वाले फैसले भी ज़मीन पर लोगों को अच्छे नहीं लगते. खासकर युवाओं को, जो सिर्फ आदेश मानने के आदी नहीं हैं, ऐसे फैसले समाधान की बजाय थोपे गए फैसले लग सकते हैं. सरकार को युवाओं और दूसरे सामाजिक समूहों की बात सुनने की आदत डालनी होगी. पहले उनकी राय सुने, फिर फैसला करे. सिर्फ यह मान लेना कि सरकार की नीयत अच्छी है, किसी फैसले को सही साबित करने के लिए काफी नहीं है. E20 इसका उदाहरण है. कम से कम सरकार को E20 के साथ दूसरा विकल्प भी देना चाहिए, चाहे 100 प्रतिशत पेट्रोल की कीमत ज्यादा ही क्यों न हो. हो सकता है कि आम वाहन मालिक जंतर-मंतर पर चक्का जाम न करें, लेकिन बड़े वाहन मालिक और टैक्सी ऑपरेटर ऐसा कर सकते हैं. इसलिए सरकार को अभी से इस संभावित विरोध को समझना चाहिए और E20 को लेकर सवाल उठाने वालों से बातचीत करनी चाहिए. यह सही है कि दो तरह का ईंधन उपलब्ध कराने में समय लगेगा, लेकिन यहां सबसे ज़रूरी बात लोगों की बात सुनी जाना है.

दूसरी बात, यह एक तरह से टैक्स देने वालों का विरोध भी है. देश के ज्यादातर लोग आयकर नहीं देते, लेकिन वे जीएसटी के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से टैक्स जरूर देते हैं. इसके अलावा लोग राज्य और नगर निकायों के कई अधिकारियों को रिश्वत के रूप में भी एक तरह का “प्राइवेट टैक्स” देते हैं. चाहे वह ट्रैफिक चालान का मामला हो, जन्म या मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाना हो या अस्पताल और दूसरी सरकारी सेवाएं लेना. अब मिडिल-क्लास की परिभाषा सिर्फ आय के आधार पर नहीं होनी चाहिए. जो लोग प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, उच्च शिक्षा लेना चाहते हैं या पैकेट वाला सामान खरीदते हैं, उन्हें भी मिडिल-क्लास का हिस्सा माना जाना चाहिए. यानी जो लोग उपभोक्ता वर्ग का हिस्सा बन रहे हैं, वे भी बड़े मध्यम वर्ग का हिस्सा हैं, भले ही उनकी आय बहुत ज्यादा न हो.

तीसरी बात, जैसा कि संतोष देसाई ने आज (27 जुलाई 2026) टाइम्स ऑफ इंडिया में अपने लेख में लिखा है, जेन ज़ी ने सिर्फ मोदी सरकार को ही शासन करते देखा है क्योंकि लंबे समय से वही सत्ता में है और लगातार चुनाव भी जीतती रही है. इसलिए जेन ज़ी अपनी ज्यादातर समस्याओं के लिए सबसे ज्यादा जवाबदेही भी मोदी सरकार से ही मांगेगा, भले ही उन समस्याओं के लिए केंद्र सरकार सीधे जिम्मेदार न हो. मोदी सरकार को राज्यों को ज्यादा अधिकार देने की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए और राज्यों को भी स्थानीय निकायों को ज्यादा अधिकार देने चाहिए क्योंकि लोगों का सबसे ज्यादा संपर्क इन्हीं संस्थाओं से होता है. जल्द ही राज्य सरकारों पर भी जनता का दबाव बढ़ने लगेगा. यह संदेश सिर्फ मोदी सरकार के लिए नहीं है, बल्कि सभी राज्य सरकारों और नगर निकायों के लिए भी है क्योंकि इनमें से कोई भी लोगों को अच्छी गुणवत्ता वाली नागरिक सेवाएं नहीं दे रहा है. ये सभी सरकारें जनता के गुस्से का सामना कर सकती हैं, लेकिन केंद्र और कई राज्यों में सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत होने की वजह से बीजेपी पर सबसे ज्यादा दबाव पड़ेगा.

यह बात भी बहुत कुछ बताती है कि सीजेपी के नाम में “जनता” शब्द है, E20 आंदोलन के संगठन के नाम में भी “जनता” है, और भारतीय जनता पार्टी के नाम में भी “जनता” शामिल है. इससे साफ है कि राजनीतिक निशाना किसे बनाया जा रहा है.

चौथी बात, सीजेपी के आंदोलन में खुलकर जाति का मुद्दा नहीं दिखा, लेकिन नीट विवाद और रोज़गार के कम अवसरों को लेकर प्रदर्शन कर रहे कई छात्र शिक्षा और नौकरियों में लगातार बढ़ते आरक्षण को लेकर भी चिंतित थे, लेकिन जो भी मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की कोशिश करेगा, उसे राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ेगा. इससे जातीय टकराव भी हो सकता है. यही स्थिति बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है क्योंकि उसकी राजनीति अलग-अलग जातियों के हिंदू वोटों को एकजुट रखने पर टिकी है. अगर जाति के आधार पर टकराव बढ़ता है, तो 2029 का चुनाव बीजेपी के लिए मुश्किल हो सकता है, खासकर तब जब उसके खिलाफ अल्पसंख्यक वोट पहले से ही एकजुट हैं.

पांचवीं बात, अब सभी राजनीतिक दलों को बेहतर शासन और अच्छी नागरिक सेवाओं की मांग को गंभीरता से लेना होगा. अब तक सरकारें जन धन-आधार-मोबाइल (JAM) व्यवस्था के जरिए मुफ्त योजनाएं (फ्रीबीज़) देकर चुनाव जीतने की कोशिश करती रही हैं. यह माना जा सकता है कि सही समय पर दी गई कोई मुफ्त योजना कुछ अतिरिक्त वोट दिला सकती है, लेकिन आने वाले चुनाव सिर्फ फ्रीबी के दम पर नहीं जीते जाएंगे. अब लोगों को मुफ्त योजनाओं के साथ अच्छी सेवाएं भी चाहिए. अगर नीट जैसा मुद्दा बड़ा राजनीतिक संकट पैदा कर सकता है, तो फिर कूड़े के ढेर, ट्रैफिक जाम और खराब स्वास्थ्य सेवाएं भी ऐसा क्यों नहीं कर सकतीं?

छठी बात, न्यायपालिका और मीडिया को भी यह नहीं मानना चाहिए कि वे जनता की जांच-परख से बाहर हैं. जंतर-मंतर के प्रदर्शन के दौरान कई पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार किया गया और कुछ के साथ धक्का-मुक्की भी हुई. अभी तक न्यायपालिका सीधे निशाने पर नहीं आई है, लेकिन जंतर-मंतर पर मौजूद छात्रों में अदालतों के प्रति भी ज्यादा सम्मान नहीं दिखा. दरअसल, “कॉकरोच” शब्द भी भारत के मुख्य न्यायाधीश की एक हल्की-फुल्की टिप्पणी से ही चर्चा में आया था. तो फिर मोदी सरकार या किसी भी सरकार को क्या करना चाहिए?

1. सरकार को बड़े सुधार शुरू करने चाहिए और इसके लिए सिर्फ विशेषज्ञों से नहीं, बल्कि जेन ज़ी के प्रतिनिधियों से भी बातचीत करनी चाहिए. इसका मतलब सिर्फ सीजेपी से बात करना नहीं है, बल्कि दूसरे युवा नेताओं और संगठनों से भी बात करनी चाहिए, जो युवाओं की सोच और ज़रूरतों को समझते हैं. दूसरे राजनीतिक दलों और नागरिक संगठनों को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए.

2. कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास, नौकरशाही, न्यायपालिका और सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक सुधारों के लिए समितियां बनाई जानी चाहिए और व्यापक चर्चा होनी चाहिए. लेख के मुताबिक, राजनीतिक व्यवस्था में सुधार सबसे ज़रूरी है क्योंकि यही भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी वजह है. न्यायपालिका को भी समझना चाहिए कि जिस तरह सरकार से जवाबदेही मांगी जाती है, उसी तरह न्यायपालिका भी राज्य की सबसे कमजोर संस्थाओं में से एक मानी जाती है. नौकरशाही की स्थिति भी ऐसी ही है.

ये सुधार एक दिन में नहीं होंगे, लेकिन अगर नरेंद्र मोदी समझदारी से काम लें, तो वे न्यायपालिका और नौकरशाही में भी बदलाव की शुरुआत कर सकते हैं.

3. मोदी कैबिनेट में बड़े स्तर पर बदलाव की ज़रूरत है. कैबिनेट में नए और युवा चेहरों को जगह मिलनी चाहिए और यह बदलाव साफ दिखाई भी देना चाहिए. कुछ मंत्री, जैसे अश्विनी वैष्णव, पर काम का बहुत ज्यादा बोझ है, जबकि कुछ अन्य मंत्रियों की छवि पर सवाल उठ रहे हैं. नितिन गडकरी को अच्छा काम करने वाला मंत्री माना जाता है, लेकिन E20 के मुद्दे पर वे वाहन मालिकों की चिंताओं को लेकर संवेदनशील नहीं दिखे. लेख के मुताबिक, उन्हें इस्तीफा देने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन वे और पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी मिलकर प्रभावित लोगों के साथ एक समिति बना सकते हैं. यह समिति पूरे E20 प्लान की फिर से समीक्षा करे. इसमें यह विकल्प भी देखा जा सकता है कि धीरे-धीरे E20 और 100 प्रतिशत पेट्रोल को अलग-अलग उपलब्ध कराया जाए, भले ही 100 प्रतिशत पेट्रोल महंगा हो. आगे बढ़ने का सबसे अच्छा तरीका बातचीत और सलाह-मशविरा है.

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद भी मोदी सरकार ने दो मौके गंवा दिए. पहला, सरकार ने परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में एक समिति बनाई, लेकिन इसमें जेन ज़ी के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जा सकता था. दूसरा, सरकार ने प्रह्लाद जोशी को नया मानव संसाधन विकास मंत्री बनाया, लेकिन इससे बदलाव का संदेश नहीं गया. अगर मंत्रालय में, कम से कम राज्य मंत्री के स्तर पर, किसी युवा चेहरे को जिम्मेदारी दी जाती, तो ज्यादा बेहतर होता.

आखिर में, सीजेपी का आंदोलन सिर्फ नीट या धर्मेंद्र प्रधान के बारे में नहीं है. यह पूरे सरकारी तंत्र से बेहतर शासन और बेहतर कामकाज की मांग का आंदोलन है. लेख के मुताबिक, इस समय सिर्फ मोदी सरकार ही नहीं, बल्कि पूरा सिस्टम परीक्षा की स्थिति में है. आने वाले कुछ वर्षों में नरेंद्र मोदी इन चुनौतियों से कैसे निपटते हैं, इससे तय होगा कि वे 2029 के चुनाव को प्रभावित कर पाएंगे या बढ़ते असंतोष की लहर उन्हें पीछे छोड़ देगी. भारत एक बार फिर बड़े पैमाने पर असंतोष के दौर की दहलीज पर खड़ा है.

लेकिन यह सिर्फ खतरा नहीं है. अगर नरेंद्र मोदी इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करते हैं, तो उनकी विरासत सिर्फ बनी नहीं रहेगी, बल्कि और मजबूत होगी. सबसे ज़रूरी बात यह है कि सरकार को हुक्म चलाने वाली व्यवस्था से निकलकर बातचीत और सलाह लेकर फैसले करने वाली व्यवस्था की ओर बढ़ना होगा.

आर.जगन्नाथन स्वराज्य पत्रिका के संपादक और पूर्व संपादकीय निदेशक हैं. उनका एक्स हैंडल @TheJaggi है. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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