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Saturday, 19 September, 2026
होमदेशएक ही सबूत, दो नतीजे: निठारी मामलों में सुरेंद्र कोली की सज़ा से बरी होने तक का सफ़र

एक ही सबूत, दो नतीजे: निठारी मामलों में सुरेंद्र कोली की सज़ा से बरी होने तक का सफ़र

2006 में गिरफ़्तार किए गए कोली को 2014 में फांसी दिए जाने में बस कुछ ही घंटे बचे थे, तभी सुप्रीम कोर्ट ने आधी रात को सुनवाई करके दखल दिया. 2025 में एक क्यूरेटिव याचिका के ज़रिए उन्हें बरी कर दिया गया.

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नई दिल्ली: हरिद्वार में अपनी चाय की दुकान में लटका हुआ मिला, सुरेंद्र कोली एक ऐसा नाम रहा है जो इंसानी मांस खाने, बलात्कार, हत्या और निठारी हत्याकांड से जुड़ा रहा है. दिसंबर 2006 से सितंबर 2026 तक, कोली की ज़िंदगी के दो दशक देश की आपराधिक न्याय व्यवस्था से होकर एक असाधारण सफ़र में गुज़रे.

नोएडा का ‘दरिंदा’ कहलाने वाला कोली दिसंबर 2006 में गिरफ़्तार हुआ, फिर उसे फांसी की सज़ा सुनाई गई, 2014 में वह फांसी से कुछ ही घंटे दूर था, और आखिर में 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने क्यूरेटिव पिटीशन के ज़रिए उसे बरी कर दिया.

उसकी कथित आत्महत्या की जाँच के आदेश दे दिए गए हैं, और खबरों के मुताबिक उसके परिवार को सूचना दे दी गई है. यह सुप्रीम कोर्ट के उसे इस मामले में बरी करने के करीब 10 महीने बाद हुआ है, जबकि वह करीब दो दशक तक फांसी की सज़ा पर रहा था.

2005-2006 के बीच, नोएडा के निठारी इलाके से 50 से ज़्यादा जवान लड़कियाँ और औरतें गायब हो गई थीं, और उनके माँ-बाप बार-बार गुमशुदगी की रिपोर्ट लेकर पुलिस के पास गए. नोएडा के सेक्टर 31 में उस नाले के बाहर से खोपड़ियाँ, दुपट्टे और इंसानी अवशेष मिले, जहाँ कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर डी-5 में रहता था.

कोली वहाँ घरेलू नौकर के तौर पर काम करता था. पंढेर ने वह डुप्लेक्स फरवरी 2004 में खरीदा था, और कोली को उसी साल जुलाई में नौकरी पर रखा था.

जब डी-5 के बाहर एक 20 साल की लड़की की माँ ने अपनी बेटी के कपड़े और चप्पलें पहचानीं, जो तीन महीने पहले लापता हुई थी, तो उसने शिकायत दर्ज कराई. नोएडा पुलिस ने पंढेर और कोली के खिलाफ़ एक और मामले में केस दर्ज किया और दिसंबर 2006 में दोनों को निठारी इलाके के कई बच्चों को अगवा करने, उनके साथ बलात्कार करने और उनकी हत्या करने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया.

उन्हें 29 दिसंबर को गिरफ़्तार किया गया था. पंढेर और कोली के खिलाफ़ एक और मामला एक दंपति की शिकायत पर दर्ज हुआ, जिन्होंने 20 जुलाई 2005 को अपनी बेटी की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाई थी, जो तब 14 साल की थी. बाद में डीएनए टेस्ट से पक्का हुआ कि उनकी बेटी भी पीड़ितों में से एक थी.

डी-5 के बाहर के नाले से इंसानी अवशेष और दूसरा ‘आपत्तिजनक’ सामान मिलने के एक महीने से भी कम वक़्त में मामला सीबीआई को सौंप दिया गया, जिसने पंढेर और कोली दोनों को अपनी हिरासत में ले लिया.

निठारी के एक मामले में दाखिल अपनी चार्जशीट में सीबीआई ने 2007 में आरोप लगाया कि कोली में शवों के साथ यौन संबंध बनाने और इंसानी मांस खाने की प्रवृत्ति थी. सीबीआई ने पंढेर और कोली के खिलाफ़ कुल 19 मामले दर्ज किए. सबूतों की कमी बताते हुए उसने तीन मामलों में क्लोज़र रिपोर्ट दाखिल की.

इलाहाबाद हाई कोर्ट

गाज़ियाबाद की एक निचली अदालत ने 13 फरवरी 2009 को दोनों को फांसी की सज़ा सुनाई. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 11 सितंबर 2009 को पंढेर को बरी कर दिया, लेकिन कोली की सज़ा को बरकरार रखा.

हाई कोर्ट ने 2009 में रिम्पा हलदर के बलात्कार और हत्या के एक मामले में कोली की फांसी की सज़ा को बरकरार रखा. सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में उसकी फांसी की सज़ा पर मुहर लगा दी.

हाई कोर्ट की एक दूसरी बेंच ने सबूतों की कमी का हवाला देते हुए सुरिंदर कोली को 12 मामलों में और उसके मालिक मोनिंदर पंढेर को दो मामलों में बरी कर दिया. ‘विक्टिम ए’ मामले के फ़ैसले में हाई कोर्ट कोली के उस इकबालिया बयान पर बहुत ज़्यादा टिका है, जो उसने पुलिस हिरासत में दिया था, और जिसके बारे में कोर्ट कहता है कि वह जाँच एजेंसियों ने उसे ‘सिखाया’ था.

अपने फ़ैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के केस में कई कमियां निकालीं. उसने न सिर्फ़ इस बात की तरफ़ इशारा किया कि पुलिस के यौन मकसद और इंसानी मांस खाने के दावों के समर्थन में फोरेंसिक सबूत नहीं थे, बल्कि अपराध में इस्तेमाल किए गए बताए गए हथियारों पर भी शक जताया.

हाई कोर्ट ने देखा कि पीड़िता के कपड़ों पर मिला वीर्य और खून कोली की रज़ाई से लिए गए नमूनों से मेल नहीं खाता था. उसने यह भी कहा कि सात लोगों की फोरेंसिक टीम डी-5 गई थी, फिर भी बाथरूम के सिंक में खून के एक धब्बे और अनजान स्रोत के एक पाइप को छोड़कर, घर में कोई और जैविक या फोरेंसिक सामग्री नहीं मिली.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फ़ैसले में यह भी कहा कि बिना धड़ के हाथ-पैर और खोपड़ियाँ मिलना हत्याओं के पीछे यौन मकसद के दावों को साबित करने के लिए काफ़ी नहीं है. इससे कोली को हलदर मामले में अपनी सज़ा पर सवाल उठाने का मौका मिल गया.

उसने फ़ौरन सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल की, और कोर्ट से कहा कि हलदर मामले में फांसी का आदेश देने वाले उसके 2011 और 2014 के फ़ैसलों की कमी को ठीक किया जाए.

एक ही सबूत से सुप्रीम कोर्ट की मंज़ूरी वाले दो उलटे नतीजे निकलने का यह साफ़ विरोधाभास 2025 तक सुलझा नहीं था, जब तत्कालीन चीफ जस्टिस बी.आर. गवई की अगुवाई वाली क्यूरेटिव बेंच ने कोली की सज़ा रद्द कर दी और कहा कि “जब सबूत साबित न हो पाएं, तो सज़ा को रद्द करना ही एकमात्र कानूनी नतीजा है, चाहे मामला कितने ही भयानक अपराधों का क्यों न हो”.

दोनों फ़ैसले अलग नज़र आते हैं: एक में दोष की पुष्टि की गई है, तो दूसरे में गहरे शक को अपनाया गया है.

साथ मिलकर वे आपराधिक न्याय के अलग-अलग विचारों से बने न्यायिक तर्क का एक चौंकाने वाला ब्योरा बनाते हैं. इन दोनों फ़ैसलों को साथ पढ़ने पर वे भारत के मृत्युदंड के कानून के लिए एक चेतावनी भरी कहानी बन जाते हैं.

फांसी से कुछ घंटों से बच निकला

2014 में मेरठ जेल में मौत कोली से कुछ ही घंटे दूर थी, जब पहले मामले में सुप्रीम कोर्ट उसकी अपील, रिव्यू और दया याचिका खारिज कर चुका था. डेथ वारंट भेज दिया गया था, और उसे 8 सितंबर की सुबह फांसी दी जानी थी.

लेकिन 7 सितंबर की रात, वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, और रात करीब 1 बजे जस्टिस ए.आर. दवे और एच.एल. दत्तू की एक आपातकालीन बेंच बैठाई गई.

कोर्ट ने आधी रात के बाद उसकी फांसी पर रोक लगा दी और सुबह-सुबह मेरठ में संदेश भेज दिया गया, जिससे आखिरकार उसकी फांसी रुक गई.

यह सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फ़ैसले के सिर्फ़ पाँच दिन बाद हुआ, जिसमें कहा गया था कि मौत की सज़ा पाए दोषियों की सभी रिव्यू पिटीशनों की सुनवाई तीन जजों की बेंच को खुली अदालत में करनी होगी, न कि जजों के निजी चैंबरों में सर्कुलेशन के ज़रिए जल्दी-जल्दी निपटा देना. इसलिए अब सुप्रीम कोर्ट को कोली की अर्ज़ी का फ़ैसला भी उसी तरह करना था.

जनवरी 2015 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उसकी दया याचिका पर फ़ैसला होने में हुई देरी की वजह से उसकी फांसी की सज़ा को उम्रकैद में बदल दिया.

एक आज़ाद इंसान

सुप्रीम कोर्ट से बरी होने के बाद नोएडा जेल अधिकारियों ने उसे 12 नवंबर 2025 को रिहा कर दिया. वह मास्क पहने, नज़रें नीचे किए जेल से बाहर निकला, उसके वकील उसे बचा रहे थे और मीडिया उस पर सवाल चिल्ला रहा था.

जेल अधिकारियों ने कोली को शांत और चुप रहने वाला बताया. उनके मुताबिक वह ज़्यादातर अपने में ही रहता था, और सोमवार को सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला सुनकर, जिसने उसे आज़ाद किया, भी उसने ज़्यादा कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.

सुप्रीम कोर्ट में उसके वकीलों में से एक, एडवोकेट पायोशी रॉय, ने तब दिप्रिंट से कहा था कि “वह और उसका परिवार दोनों पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं, और इसमें मीडिया ने बड़ी भूमिका निभाई. शुरुआती सालों में उसे बलात्कारी से लेकर नरभक्षी और ‘नोएडा का दरिंदा’ तक, हर नाम से पुकारा गया.”

रॉय ने दिप्रिंट से कहा था कि राहत मिलने के बावजूद “यह कोई खुशहाल अंत वाली कहानी नहीं है. उन सबमें गहरी नाउम्मीदी है. उसने अपनी जिरह खुद की, अपना केस खुद लड़ा, इसी पल के लिए.”

‘किसने किया’ का सवाल तब खुला छोड़ दिया गया, क्योंकि देश की सबसे बड़ी अदालत ने लड़कियों और औरतों की हत्या के मामलों के मुख्य आरोपी को बरी कर दिया. जो लड़कियाँ और औरतें लापता हुईं और मारी गईं, उनके परिवारों को अब तक कोई सुकून नहीं मिला है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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