Wednesday, 29 June, 2022
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अयोध्या में ‘विध्वंस’ से काशी में निर्माण तक, BJP ने क्यों बदली अपनी रणनीति

बीजेपी ने काशी को सुंदर और भव्य बनाकर लगभग वही लक्ष्य हासिल कर लिया, जो उसने अयोध्या में खून-खराबे और तोड़-फोड़ के जरिए हासिल किया था.

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नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा नियुक्त किया गया राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट इन दिनों राम मंदिर के निर्माण में लगा है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अयोध्या विवाद का समाधान हो गया है लेकिन जैसा कि बीजेपी और विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े नेता कहते हैं, ‘अयोध्या तो झांकी है, काशी-मथुरा बाकी है ‘, तो अब फोकस काशी और मथुरा पर होगा. खासकर काशी को लेकर इन सर्दियों में माहौल गर्माया हुआ है.

दरअसल, काशी विश्वनाथ धाम या काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के उद्घाटन के साथ ही हिंदुत्व परिवार की काशी योजना का पहला चरण संपन्न हो चुका है. काशी परियोजना पर जिस तरह से काम हुआ, वह संघ परिवार की रणनीति का एक नया अध्याय है क्योंकि इसे एक नए अंदाज में किया गया. ये संघ की स्थापित कार्यप्रणाली से भी अलग है.

बीजेपी की केंद्र और राज्य सरकार के साझा उद्यम से काशी यानी बनारस को इस कदर बदल दिया गया है, जिसे एक शहर का पुनर्जन्म ही कहा जा सकता है. ये पूरे शहर में नहीं बल्कि शहर के उस भाग में हुआ, जहां काशी विश्वनाथ मंदिर स्थित है.

अयोध्या की ही तरह, संघ और बीजेपी के लिए काशी भी एक राजनीतिक मुद्दा है जिसका वह अपने राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करती रही है और शायद आगे भी ऐसा करेगी. यहां पर दो धार्मिक इमारतें- काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद आसपास खड़ी हैं और इसे लेकर विवाद चल रहा है.


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क्या है काशी परियोजना और क्या है उसका मतलब?

बाबरी मस्जिद गिराई जा चुकी है. ज्ञानवापी मस्जिद अपनी जगह खड़ी है लेकिन काशी विश्वनाथ धाम की नई संरचनाओं के बीच अब वो इतनी छोटी नजर आती है कि उसे खो गया मान लिया जा सकता है. मस्जिद को अनदेखा और लगभग अदृश्य बनाने की बीजेपी की योजना पूरी हो चुकी है.

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काशी विश्वनाथ धाम व्यापक काशी विश्वनाथ कॉरिडोर प्रोजेक्ट का हिस्सा है, उद्घाटन के बाद तीन साल से भी कम समय में इसका ज्यादातर काम पूरा हो चुका है. इस काम को सरकार ने सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर किया, वरना शहर के बीच में 400 के आसपास जायदाद का अधिग्रहण करके इस काम को पूरा करना आसान नहीं था.

इस परियोजना में पर्यटक सुविधा केंद्र, वैदिक केंद्र, मुमुक्षु भवन, सिटी म्यूजियम, दर्शक दीर्घा, फूड कोर्ट आदि हैं और इसका कुल क्षेत्रफल 2 लाख वर्ग फुट है. इसका विस्तार कितना बड़ा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पुराना काशी विश्वनाथ मंदिर सिर्फ 3,000 वर्ग फीट में बना है. काशी विश्वनाथ धाम में एक समय में 2 लाख तक लोग जमा हो सकते हैं.

यह दिलचस्प है कि काशी विश्वनाथ धाम के लिए ज्ञानवापी मस्जिद का इंतजाम करने वाली कमेटी ने अपनी 1700 वर्गफुट जमीन दी. इसके बदले में ज्ञानवापी मस्जिद को मेन रोड पर 1000 वर्गफुट जमीन दी गई. जमीन का ये लेनदेन आपसी सहमति से एक ऐसे समय में हुआ जब दोनों के बीच जमीन को लेकर कानूनी विवाद चल रहा है.

ज्ञानवापी मस्जिद की जगह फिर से मंदिर बनाने की मांग को लेकर एक मुकदमा 1991 में दायर किया गया था. तर्क ये दिया गया कि मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी. स्थानीय अदालत ने पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को सत्य का पता लगाने का आदेश दिया. ये मामला अभी हाई कोर्ट में है और कोर्ट का फैसला स्थगित है.


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अयोध्या वाली रणनीति काशी में क्यों नहीं?

अयोध्या में इसी तरह के विवाद में बीजेपी और आरएसएस ने टकराव का रास्ता चुना था. इस रणनीति का निष्कर्ष बाबरी मस्जिद के विध्वंस में हुआ. ये आंदोलन 1980 के दशक में शुरू हुआ और इस क्रम में देश भर में कई दंगे हुए और सैकड़ों लोग मारे गए. आखिरकार 6 दिसंबर 1992 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश और बीजेपी के वचन के बावजूद मस्जिद गिरा दी गई

महत्वपूर्ण बात ये है कि बीजेपी को उस समय इस घटना का कोई राजनीतिक लाभ नहीं मिला, जिसकी उसे उम्मीद रही होगी. बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद बीजेपी की सभी राज्य सरकारों को गिरा दिया गया और वहां राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया. अगले साल यानी 1993 में जब इन पांच राज्यों में चुनाव हुए तो बीजेपी यूपी, मध्य प्रदेश, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश में चुनाव हार गई और राजस्थान में मुश्किल से उसकी सरकार बनी.

कहना मुश्किल है, क्या बीजेपी ने उस घटना और उसके राजनीतिक असर को देखते हुए ही काशी को लेकर टकराव का रास्ता नहीं चुना. बहरहाल ये तय है कि अयोध्या से उलट काशी में बीजेपी ने काशी को सुंदर और भव्य बनाकर लगभग वही लक्ष्य हासिल कर लिया, जो उसने अयोध्या में खून-खराबे और तोड़-फोड़ के जरिए हासिल किया था.

बीजेपी ने संभवत: दो कारणों से काशी में, अयोध्या की तरह विध्वंस का रास्ता नहीं चुना. एक, बीजेपी इस समय केंद्र और राज्य में सत्ता में है. सत्ता में रहते हुए उसके लिए लंबित मामले में कोर्ट की अनदेखी आसान नहीं है. अयोध्या में उसने जिस तरह सुप्रीम कोर्ट की मर्यादा को तार-तार कर दिया, वैसा वह सत्ता में रहकर नहीं कर सकती. सत्ता से जुड़ी हुई जवाबदेही किसी को भी जिम्मेदार बना दे सकती है. और दो, बीजेपी के पास इस बार दूसरा रास्ता मौजूद था.

बीजेपी 1992 में अयोध्या में निर्माण का रास्ता नहीं चुन सकती थी क्योंकि उसे अपनी राजनीति को गर्म करना था. और फिर केंद्र में उसकी सत्ता भी नहीं थी. काशी में उसने निर्माण के जरिए ज्ञानवापी मस्जिद को छोटा और लगभग अदृश्य बना दिया. काशी की कामयाबी को बीजेपी और नरेंद्र मोदी जमकर भुनाएगी.


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हिंदुत्व की राजनीति में काशी

काशी में नरेंद्र मोदी ने विराट हिंदुत्व के प्रोजेक्ट को भी आगे बढ़ाने की कोशिश की है. हिंदुत्व को समावेशी और समरस दिखाने के लिए उन्होंने न सिर्फ काशी विश्वनाथ धाम बनाने वाले मजदूरों के साथ बैठकर तस्वीर खिंचाई, बल्कि उन पर फूल भी बरसाए और उनके साथ एक ही पंक्ति में बैठकर खाना भी खाया. ये कोई धर्म या आस्था का निजी मामला नहीं था. ये सब राष्ट्रीय चैनलों पर लाइव दिखाया गया और सरकार की ओर से ही ये बंदोबस्त किया गया.

काशी से नरेंद्र मोदी जो प्रतीक देश को दिखाना चाह रहे थे, वह महत्वपूर्ण है. काशी हिंदू धर्म का एक प्रमुख केंद्र और सनातन धर्म का नर्व सेंटर यानी स्नायु केंद्र भी है. यहां की विद्वत परिषद हिंदू धर्म की दिशा तय करने में भूमिका निभाती है. यहां का विश्वनाथ मंदिर प्रमुख शैव तीर्थ है और 12 ज्योतिर्लिंगों में ये सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है.

साठ साल पहले तक, इस मंदिर में अनुसूचित जाति के लोगों का प्रवेश निषेध था. गांधी ने इस बारे में विस्तार से लिखा था और इस भेदभाव की कड़ी भर्त्सना की थी. दलितों का यहां मंदिर प्रवेश 1957 में ही संभव हो पाया जबकि इससे सात साल पहले भारतीय संविधान छुआछूत का निषेध कर चुका था.

आरएसएस जाति और वर्ण का भेद तो बनाए रखना चाहता है लेकिन वह विभिन्न जातियों के बीच समरसता भी चाहता है ताकि साझा दुश्मन के मुकाबले विशाल गोलबंदी बन सके. सनातन हिंदू के दलित द्वेष के मुकाबले, आरएसएस का राजनीतिक हिंदुत्व दलितों को दलित बनाए रखते हुए साथ लेकर चलना चाहता है.

काशी में समरसता का संदेश महत्वपूर्ण है. नरेंद्र मोदी के लिए काशी महत्वपूर्ण है. काशी बीजेपी की राजनीति में कितना अहम है, इसका अंदाजा इस बात से लगाइए कि 2014 और 2019 में नरेंद्र मोदी बनारस से ही सांसद हैं.

(लेखक पहले इंडिया टुडे हिंदी पत्रिका में मैनेजिंग एडिटर रह चुके हैं और इन्होंने मीडिया और सोशियोलॉजी पर किताबें भी लिखी हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


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