परिसीमन को लेकर काफी हंगामे वाली बहस जारी है. सरकार इस मुद्दे से सीधे निपटने के लिए संसद में सीटों की संख्या को आबादी के हिसाब से बढ़ाने की तैयारी कर रही है, तो इसके जवाब में विपक्ष जनसंख्या के स्वरूप, चुनाव क्षेत्रों के नए सिरे से तय होने और दूसरे नतीजों को लेकर अपनी आशंकाएं खुलकर उठा रहा है. इस हंगामे में इस मुद्दे के इस बुनियादी सवाल की अनदेखी की जा रही है कि परिसीमन एक विचार के रूप में क्यों जरूरी है. परिसीमन एक संवैधानिक जिम्मेदारी तो है ही, लेकिन इसके अलावा इसका आर्थिक महत्व क्या है?
भारत में शासन के मौजूदा ढांचे में सुधार की ज़रूरत है. भारत के आर्थिक भूगोल से जुड़ा प्रतिनिधित्व बहुत ज़रूरी है. यह टिकाऊ आर्थिक सफलता के लिए जरूरी सक्रिय और जवाबदेह शासन की बुनियादी शर्त है. जब राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संबंध आर्थिक मूल्य बनाने वाले स्रोत से व्यवस्थित रूप से टूट जाता है, तब सार्वजनिक पूंजी का लगातार गलत इस्तेमाल होने लगता है.
भारत के शहरी क्षेत्र, खासकर बड़े शहर, सामूहिक अर्थव्यवस्था और उत्पादकता में बढ़ोतरी के मुख्य इंजन हैं, लेकिन चुनावी नक्शे में उन्हें बहुत कम प्रतिनिधित्व मिला है. उदाहरण के लिए, उम्मीद है कि भारत की शहरी आबादी, जो 2014 में 41 करोड़ थी, 2050 में 81.4 करोड़ हो जाएगी. माना जाता है कि 2050 तक भारत की शहरी आबादी में 41.6 करोड़ की बढ़ोतरी हो जाएगी, जितनी आबादी किसी और देश की नहीं होगी. भारत की कुल आबादी में शहरी आबादी का हिस्सा 37 प्रतिशत है, फिर भी करीब 30-38 लाख मतदाताओं वाले मल्कजगिरि, उत्तरी बेंगलूरू, दिल्ली-एनसीआर जैसे सबसे ज्यादा आबादी वाले शहरी चुनाव क्षेत्रों के पास संसद में केवल एक वोट है और इनसे काफी छोटे तथा केवल 50 हजार मतदाताओं वाले लक्षद्वीप जैसे चुनाव क्षेत्रों के पास भी संसद में एक वोट है. यानी शहरी मतदाताओं को ढांचे के स्तर पर कम महत्व मिला हुआ है.
इसके परिणामस्वरूप शहरों के आर्थिक मुद्दों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता और राजनीतिक नेता उन्हें चुनावी नजरिए से कम महत्व देते हैं. इसके अलावा, क्योंकि शहरी आबादी ज्यादा शिक्षित होती है और उत्पादकता को सीधे प्रभावित करने वाले घर, परिवहन और नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति जैसे मामलों पर ज्यादा जवाबदेही की मांग करती है, इसलिए उसकी राजनीतिक आवाज़ को ज्यादा मजबूत करने से भारत की आर्थिक कहानी में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है.
जिस दूसरे महत्वपूर्ण आर्थिक पहलू में बदलाव ज़रूरी है, वह है शासन के विकेंद्रीकरण की ज़रूरत को ज्यादा महत्व देना. इसमें कोई शक नहीं है कि परिसीमन से देश के ज्यादा आबादी वाले इलाकों को कुछ ज्यादा राजनीतिक महत्व मिलेगा और विकेंद्रीकृत शासन व्यवस्था भी ज्यादा प्रभावी तरीके से लागू होगी. प्रति व्यक्ति प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ने से स्थानीय मुद्दों पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकेगा.
आर्थिक वृद्धि के लिए प्रतिनिधित्व का महत्व
अमेरिका, जापान जैसे कई विकसित देशों ने बड़ी आबादी वाले क्षेत्रों के साथ अधिकार रखने वाली क्षेत्रीय इकाइयों को जोड़ रखा है. ये इकाइयां स्थानीय सार्वजनिक काम करती हैं, पूंजी को आकर्षित करने के लिए आपस में मुकाबला करती हैं और समाज द्वारा उठाए गए मुद्दों पर ज्यादा ध्यान देकर बेहतर बिजनेस गवर्नेंस की व्यवस्था करती हैं. इससे कारोबार करने में आसानी बढ़ सकती है, खासकर काफी बड़ी आबादी वाले चुनाव क्षेत्रों में.
अनुभव के आधार पर किए गए अध्ययनों से साफ है कि शासन का स्तर प्रांतीय और केंद्रीय स्तरों पर प्रति व्यक्ति सार्वजनिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा होता है. राजनीतिक स्थिरता से भी देश से जुड़े जोखिम तय होते हैं (बेकर्ट एवं अन्य; ‘सॉवरेन-स्प्रेड्स लिटरेचर’). लंबे समय के निवेश को बढ़ावा देने और आर्थिक वृद्धि का इस्तेमाल ज्यादा लोगों के फायदे के लिए करने का मकसद जिला स्तर से लेकर केंद्र सरकार तक भरोसेमंद और प्रभावी शासन के जरिए ही हासिल किया जा सकता है. यह विदेशी निवेशकों के लिए देश में निवेश के जोखिम को कम करता है. यह राजनीतिक नेताओं को ज्यादा जवाबदेह भी बनाता है और आखिर में बेहतर राजनीतिक वर्ग तैयार कर सकता है. इस तरह, यह देश में निवेश करने वालों के लिए लंबे समय के जोखिम बीमा की प्रीमियम को कम कर सकता है.
अंत में, केंद्र सरकार के स्तर पर कुल असर बेहतर ही होगा और यह ऐसा डेटा सिस्टम बना सकता है, जो बेहतर वित्तीय योजना और राज्यों के साथ बेहतर तालमेल की गुंजाइश बना सकता है. उदाहरण के लिए सवाल किया जा सकता है कि क्या हमारे लिए यह बेहतर होगा कि हम आज की महंगाई का आकलन उन चीज़ों के आधार पर करें, जिनका इस्तेमाल 1970 के दशक में किया जाता था? इसी तरह, यह भी पूछा जा सकता है कि 2026 में चुनावी प्रतिनिधित्व (जो डेटा के आधार पर सार्वजनिक नीति बनाने की बुनियाद है) के लिए 1970 की जनगणना के आधार पर तय किए गए राजनीतिक प्रतिनिधित्व के आंकड़ों का इस्तेमाल कितना सही होगा?
प्रति व्यक्ति ज्यादा प्रतिनिधित्व के साथ-साथ बेहतर शासन का नतीजा यह होगा कि संसाधनों के बंटवारे, जनकल्याण के लक्ष्यों को तय करने और योजना बनाने के मामलों में आबादी और सीमाओं आदि के ज्यादा सही डेटा का इस्तेमाल होगा. बेहतर डेटा के कारण लोगों तक फंड पहुंचने में होने वाली गड़बड़ी और असंतुलन में कमी आएगी. इसलिए, इन सबका कुल असर यह होगा कि राज्यों और केंद्र की वित्तीय योजना और तालमेल में सुधार आएगा, क्योंकि लोगों की इच्छाओं का ज्यादा प्रभावी तरीके से प्रतिनिधित्व होगा.
अर्थशास्त्री सरकारों को जिन कई ढांचागत सुधारों को लागू करने का सुझाव देते रहे हैं, उन सुधारों को देश की शासन व्यवस्था के खंभों को नए सिरे से तैयार करके लागू किया जा सकता है. यह परिसीमन की प्रक्रिया में पारदर्शिता और सुधारों के लिए एक महत्वपूर्ण मौका देता है, ताकि शासन में ढांचागत सुधारों को योजनाबद्ध तरीके से लागू किया जाए, न कि चुपचाप या कानून बनाने की जद्दोजहद के जरिए. यह ऐसा महत्वपूर्ण मौका है, जब पूरे देश में बड़े पैमाने पर शासन को आसान बनाकर आर्थिक वृद्धि को तेज किया जा सकता है.
आम सहमति पर टिकी प्रक्रिया
ये सुधार तो महत्वपूर्ण हैं ही, लेकिन जरूरी यह है कि यह आम सहमति पर आधारित प्रक्रिया हो, जिसे ज्यादातर राजनीतिक दलों का समर्थन हासिल हो. चुनौतियां कई हैं, जिनमें उत्तर-दक्षिण का बंटवारा, आबादी के आधार पर प्रतिनिधित्व, प्रभावित राज्यों की ओर से आपत्तियां आदि शामिल हैं. इन मुद्दों का समाधान बातचीत और समझदारी से और देश के बड़े लक्ष्य के लिए मिलकर काम करने की भावना से किया जाना चाहिए.
इस प्रक्रिया को इसलिए नहीं टालना चाहिए कि यह मुद्दा काफी जटिल है और कड़े फैसले लेने पड़ेंगे. यह दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देश की उम्मीदों के साथ अन्याय होगा. इस प्रक्रिया के महत्व पर ही सवाल उठाने की जगह बहस इस बात पर होनी चाहिए कि परिसीमन की व्यवस्था को सबसे प्रभावी और सबको साथ लेकर चलने वाला कैसे बनाया जा सकता है. आम सहमति पर आधारित परिसीमन प्रक्रिया विकसित भारत की मजबूत नींव बन सकती है.
श्रीराम बालासुब्रमण्यम एक अर्थशास्त्री और धर्मनॉमिक्स के बेस्ट-सेलिंग लेखक हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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