पिछले एक महीने में, प्रदर्शनकारियों ने बार-बार कहा है कि क्रिसमस और उससे जुड़ी परंपराएं गंदी पश्चिमी चीज़ें हैं, जिन्हें हमें ठुकरा देना चाहिए और छोड़ देना चाहिए.
कम से कम एक अहम बात में प्रदर्शनकारी सही हैं. पश्चिमी परंपरा में क्रिसमस प्यार और सबके प्रति सद्भाव का समय होता है, लेकिन भारत में हमने दिखा दिया है कि हम में से कई लोगों के लिए क्रिसमस असल में नफरत और हिंसा का समय है. अच्छा हो या बुरा, यह तेजी से एक भारतीय परंपरा बनती जा रही है.
बस अखबार पढ़ लीजिए या इंटरनेट पर खबरें देख लीजिए. हर दिन गुस्से, नफरत और खून-खराबे की नई खबरें आती हैं. यहां पिछले पखवाड़े में छपी खबरों से लिए गए कुछ उदाहरण हैं.
देहरादून में, 24 साल के छात्र एंजल चकमा और उनके भाई माइकल पर एक समूह ने चाकू से हमला किया. एंजल की चोटों से मौत हो गई. उनके भाई ने कहा कि उन्हें उनकी पूर्वोत्तर पहचान को लेकर नस्लवादी गालियां दी गईं. माइकल के अनुसार, एंजल के आखिरी शब्दों में से एक थे—“मैं एक भारतीय हूं”, जबकि उन्हें ‘चिंक’ और उससे भी बदतर कहा जा रहा था.
तमिलनाडु में, 17 साल के कुछ लड़कों के एक समूह ने एक प्रवासी मजदूर पर माचेते (तेज़ हथियार) से हमला किया. उन्होंने हमले का वीडियो बनाया और फिर उसे सोशल मीडिया पर तमिल गाने के साथ डाल दिया.
बरेली में, 25 लोगों के एक स्वयंभू चौकसी समूह ने एक छात्र की जन्मदिन पार्टी में घुसकर मेहमानों पर हमला किया. इन लोगों को पार्टी में मौजूद दो मुसलमानों पर आपत्ति थी और उन्होंने लव जिहाद की शिकायत की.
और फिर, ज़ाहिर है, क्रिसमस मनाने का भारतीय तरीका भी सामने आया: ईसाइयों पर हमला करके.
बेंगलुरु में ‘कार्यकर्ताओं’ ने क्रिसमस के दिन चर्च प्रेयर्स में बाधा डाली. दिल्ली में, सांता क्लॉज की टोपी पहनने पर महिलाओं और बच्चों के एक समूह को निशाना बनाया गया. यहां तक कि केरल में भी, जो बहुलता की परंपरा के लिए जाना जाता है, कैरोल गाने वालों पर हमले हुए. इसके अलावा, क्रिसमस का सामान बेचने वाली दुकानों पर भी हमले हुए. डर और धमकी के इस माहौल की वजह से, जो लोग आमतौर पर क्रिसमस कार्यक्रम आयोजित करते हैं (लक्ज़री होटल भी शामिल), उन्हें इन्हें रद्द करना पड़ा.
सिर्फ राजनीति नहीं
पूरी हिंसा को सीधे-सीधे राजनीति का नतीजा मान लेना आसान होगा और हां, इसमें से कुछ निश्चित तौर पर अल्पसंख्यक-विरोधी भावना से जुड़ा था. यूपी जैसे राज्यों में मुसलमानों को निशाना बनाने वाले गुंडे राजनीतिक माहौल से हौसला पाते हैं और उन्हें भरोसा होता है कि पुलिस उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं करेगी. बरेली मामले में, पुलिस ने पहले पीड़ितों को ही दोषी ठहराया. सोशल मीडिया पर हंगामा होने के बाद ही हमलावरों के खिलाफ कार्रवाई की गई.
देहरादून हत्या मामले में, प्रशासन ने कोई खास अच्छा काम नहीं किया. पुलिस का कहना है कि माइकल झूठ बोल रहा है और हमले में कोई नस्लवादी पहलू नहीं था. सबसे दुखद बात यह रही कि चाकूबाजी के कई दिन बाद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आखिरकार एंजल के परिवार को फोन कर दुख जताया. बेशक, उन्होंने यह कॉल स्पीकर पर की और उसे फिल्माने की व्यवस्था की, ताकि वीडियो मीडिया को जारी किया जा सके.
क्रिसमस पर हुए हमले तब तक समझ से बाहर लगते हैं, जब तक आप हमलावरों के इरादों को बहुत नकारात्मक नज़र से न देखें. ईसाई संख्या में इतने कम हैं कि वे हिंदुत्व की संगठित ताकतों के लिए कोई खतरा नहीं बनते और भारत में क्रिसमस कोई बहुत धार्मिक त्योहार भी नहीं है. हिंदू भी इसकी खुशियों का उतना ही आनंद लेते हैं, जितना ईसाई.
तो फिर क्रिसमस को निशाना क्यों बनाया जाए? सिर्फ राजनीतिक नज़रिए से भी देखें तो, उस समय सांता क्लॉज को सताना समझ में नहीं आता, जब प्रधानमंत्री खुद ईसाई समुदाय के समर्थन के लिए क्रिसमस चर्च सर्वस में शामिल हो रहे हों.
एकमात्र समझ में आने वाली वजह यह है कि ये हमले हिंदुत्व के चरमपंथियों द्वारा किए जा रहे हैं, जो अंतरराष्ट्रीय प्रचार चाहते हैं और खुद को महत्वपूर्ण और चर्चित महसूस करना चाहते हैं और वाकई, उन्हें वही मिला जो वे चाहते थे: दुनिया भर की सुर्खियां.
हिंसा को राजनीति से जोड़ने की कोशिश करना स्वाभाविक है. राहुल गांधी ने ट्वीट किया, “नफरत रातों-रात पैदा नहीं होती. सालों से इसे रोजाना—खासकर हमारे युवाओं को, ज़हरीले कंटेंट और गैर-जिम्मेदार कहानियों के जरिए पिलाया जा रहा है और इसे सत्ता में बैठी भाजपा के नफरत फैलाने वाले नेतृत्व द्वारा सामान्य बनाया जा रहा है.”
ध्यान में आने की ज़रूरत
इस सोच में कुछ सच्चाई है, लेकिन यह मान लेना गलती होगी कि केंद्र सरकार को इस हिंसा से फायदा होता है या वह इसे समर्थन देती है. ईसाइयों पर हमले न सिर्फ ज्यादातर ईसाई देशों वाले पश्चिम में नरेंद्र मोदी की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि एंजल की हत्या के बाद पूरे पूर्वोत्तर में जो गुस्सा फैला है, वह भी बीजेपी को नुकसान पहुंचा सकता है, जो उस इलाके में एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनना चाहती है. (शायद इसी वजह से धामी से शोक जताने के लिए फोन करवाया गया, हालांकि, उनकी साफ दिखती बनावटी संवेदना ने इसे एक पीआर आपदा बना दिया.)
हां, ऊंची जाति के उत्तर भारतीय पुरुषों में पहचान की राजनीति बढ़ी है और इससे उनमें उन लोगों के प्रति तिरस्कार पैदा होता है, जो उनके जैसे नहीं हैं: मुसलमान, ईसाई, पूर्वोत्तर के लोग आदि.
लेकिन बढ़ती हिंसा को समझाने के लिए यह वजह काफी नहीं है. हमें भारत में पुलिस व्यवस्था के टूटने को भी देखना होगा. लोगों को लगता है कि वे कुछ भी करके बच सकते हैं और ज्यादातर मामलों में वे सही होते हैं: बरेली और देहरादून में पुलिस के व्यवहार को देख लीजिए. हिंसा करने वाले लोग पुलिस से नहीं डरते. उन्हें पता है कि वे दूसरों को परेशान कर सकते हैं, दुकानों पर हमला कर सकते हैं या यहां तक कि हत्या भी कर सकते हैं और फिर भी पकड़े नहीं जाएंगे.
और कुछ हद तक यह लोगों की उस चाह से भी निकलता है, जिसमें वे चाहते हैं कि लोग उन्हें नोटिस करें. क्रिसमस विरोधी प्रदर्शनकारी सुर्खियां चाहते थे और माचेते (तेज़ हथियार) लेकर हमला करने वाले किशोर सोशल मीडिया पर मशहूर होना चाहते थे.
आप कह सकते हैं कि ऐसे समाज में कुछ गड़बड़ है, जहां लोग मशहूर होने की चाह में सही और गलत के बीच फर्क नहीं कर पाते, लेकिन क्या यह कोई हैरानी की बात है? क्या पहले से ही हमारे समाज में कुछ बहुत गलत नहीं है, जहां हत्या और बलात्कार के दोषी कुलदीप सेंगर के समर्थन में रैलियां और प्रदर्शन किए जाते हैं?
हमारे समाज के बारे में यह क्या बताता है कि ये प्रदर्शन बिना किसी रोक-टोक के चलते रहते हैं, लेकिन सेंगर की दुखी पीड़िता को न्याय मांगने के ‘अपराध’ में पुलिस उठाकर ले जाती है?
एक ऐसा समाज, जहां प्रदूषण के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले लोग एक महीने तक जेल में रहते हैं, जबकि सरकार खुशी-खुशी और खुलेआम एक्यूआई के आंकड़ों में हेरफेर करती है?
यह हिंसा कहीं ज्यादा गहरी विफलताओं का लक्षण है—एक ऐसे समाज की, जिसने अपनी नैतिक दिशा खो दी है और जहां राजनीति झूठ और लालच पर टिकी है. यही आज के भारत का असली संकट है.
(वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)
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