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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ । गेटी
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हिंदी पट्टी के तीन बड़े राज्य- मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़- जो भाजपा के हाथ से निकल रहे हैं वहां ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के भाजपा के नारे को धक्का लगा है.

पिछले 70 सालों में बहुत कम ऐसे स्लोगन हुए हैं जिनका हमारे लोकतांत्रिक प्रयोगों पर निर्णायक असर रहा है. 2014 में नरेंद्र मोदी जैसे अच्छे प्रचारक ने अपने श्रोताओं को एक और सशक्त नारा दिया ‘कांग्रेस मुक्त भारत’. न तो कांग्रेस न राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे गंभीरता से लिया.

पर बड़ी संख्या में मतदाताओं को ये नारा भा गया, जिसने कांग्रेस को 44 लोकसभा सीटों तक सिमटा दिया. 100 साल पुरानी पार्टी के लिए ये सबसे निचला स्तर रहा.

कांग्रेस का पतन जारी रहा और एक समय ऐसा आया कि कांग्रेस देश के 6 प्रतिशत से भी कम आबादी का प्रतिनिधित्व कर रही थी. और उसका शासन बस कर्नाटक और मिज़ोरम तक सिमट गया. दूसरी ओर भाजपा को महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल और असम में खुला मैदान मिला. जिन राज्यों में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा या जहां उन्हें सहयोगी पार्टियों की मदद लेनी पड़ी, वे राज्य थे पंजाब, उडीशा, बिहार और पश्चिम बंगाल.


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और यही पेंच है. कई राज्यों में जहां कांग्रेस कमज़ोर है या पार्टी बिलकुल बेहाल है वहां कोई भाजपा सरकार नहीं हैं. ऐसे राज्य हैं पश्चिम बंगाल, तामिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश जहां कांग्रेस अब कई सालों से कुछ भी नहीं कर पाई है. और आश्चर्यजनक तौर से ये वो राज्य हैं जहां भाजपा की भी पहुंच नगण्य रही है. हाल के विधानसभा चुनावों में भाजपा मिज़ोरम और तेलंगाना में बस एक सीट जीत पायी.

इससे भाजपा को क्या राजनीतिक सीख मिली? चुनावी गणित ने दिखा दिया है कि भाजपा के चुनाव जीतने के आसार वहां बन जाते हैं जहां कांग्रेस शक्तिशाली है या जहां उसकी भाजपा से सीधे टक्कर थी. जहां तक कांग्रेस का सवाल है, उसकी जीत के चांस वहां सबसे ज्यादा हैं जहां भाजपा का शासन है. उसको तेलंगाना में क्षेत्रीय दल टीआरएस से जहां उसकी सीधी टक्कर थी, उसको न के बराबर समर्थन मिला और मिज़ोरम में उसको क्षेत्रीय दल एमएमएफ के हाथों हार मिली.

भाजपा के लिए भी कांग्रेस से जीत पाना क्षेत्रीय दलों से ज्यादा आसान है- मसलन टीआरएस, टीडीपी, एआईएडीएमके या बीजेडी. आपको ये विचित्र लगे पर दोनों भाजपा और कांग्रेस का फायदा एक दूसरे के सामने में होता है. और दोनों दल जब क्षेत्रीय दलों का सामना करते हैं तो वे बहुत खराब प्रदर्शन करते हैं.

अब एनडीए और यूपीए दोनों को 2019 चुनावों में ज्यादा साथी दलों की ज़रूरत पड़ेगी. भाजपा को एक बड़ा एनडीए चाहिए होगी. आज उसके तीन ही सहयोगी हैं.


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कांग्रेस मुक्त भारत का मतलब होगा कि भाजपा को क्षेत्रीय दलों का सामना करना पड़ेगा – जिनका क्षेत्रीय स्वरूप और सशक्त नेतृत्व होगा. असलियत का आयना अगर आप देखें तो पायेंगे कि स्थानीय नेतृत्व को हराने और क्षेत्रीय दल से भिड़ने में भाजपा के चांस बहुत कम हैं. और यही कहानी लगभग कांग्रेस के साथ भी है.

तो फिर क्या राह हो? क्या भाजपा को अपने कांग्रेस मुक्त भारत के स्लोगन और रणनीति पर पुनर्विचार करना चाहिए? भाजपा के रणनीतिकारों को या तो स्लोगन बदलना चाहिए या फिर उसके शब्दों में फेर करना चाहिए जो कांग्रेस से मुक्ति से बेहतर हो. चाहे ये स्लोगन कैची हो पर ये अपने लिए ही नुकसानदायक हैं.

(लेखक ऑर्गेनाइज़र के पूर्व संपादक हैं.)

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें


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