रॉबर्ट वाड्रा की फाइल फोटो | पीटीआई
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यह कोई पहली बार नहीं है जब कांग्रेस के प्रथम परिवार के दामाद रॉबर्ट वाड्रा खबरों में हैं, खास कर गलत कारणों से. वह 2014 के चुनावों से पहले भी भाजपा के निशाने पर रहे प्रमुख लोगों में से थे.

एक महत्वपूर्ण अंतर इस बार ये है कि वाड्रा ऐसे समय खबरों में हैं जब 2019 के लोकसभा चुनावों से पूर्व उनकी पत्नी प्रियंका गांधी वाड्रा ने राजनीति के अखाड़े में कदम अभी रखा ही है.

प्रियंका के उत्तर प्रदेश (पूर्व) का प्रभारी महासचिव नियुक्त किए जाने के महज कुछ हफ्तों के भीतर, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कथित मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में उनके पति से इसी सप्ताह बुधवार और गुरुवार को गहन पूछताछ की है.

वास्तव में कांग्रेस अध्यक्ष के बहनोई के उच्च सुरक्षा व्यवस्था वाले ईडी परिसर में प्रवेश करने के सिर्फ साढ़े चार घंटे पहले कांग्रेस के एक अन्य शीर्ष नेता और पूर्व वित्त मंत्री के पुत्र कार्ति चिदंबरम से आईएनएक्स मीडिया मामले में पूछताछ की गई थी.

जैसा कि अपेक्षित था, रॉबर्ट वाड्रा ने सारे आरोपों से इनकार किया और कांग्रेस की तरफ से उनकी पत्नी प्रियंका ने कहा कि वह अपने परिवार के साथ हैं.

ईडी द्वारा कार्ति चिदंबरम और रॉबर्ट वाड्रा से पूछताछ ऐसे समय की गई है जब एक अन्य हाईप्रोफाइल आर्थिक अपराधी विजय माल्या के प्रत्यर्पण को ब्रितानी गृह मंत्री की स्वीकृति मिल गई है. इन घटनाक्रमों के चलते सोशल मीडिया और न्यूज़ चैनलों पर पिछले कुछ हफ्तों से भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचाररोधी कार्रवाइयां छाई रही हैं.

2014 और भ्रष्टाचार विरोधी भावनाएं

2014 में चुनाव से पहले का माहौल अन्ना हज़ारे की अगुआई में चलाए गए एक व्यापक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के कारण उत्तेजनापूर्ण बन गया था. भाजपा के आक्रामक चुनाव अभियान, तत्कालीन सरकार और निर्णायक कदम उठाने में नाकाम दिखते प्रधानमंत्री से मोहभंग तथा सरकार की नीतिगत अक्षमता के कारण माहौल और भी गरम हो गया था.

कांग्रेस अध्यक्ष ने पिछले साल स्वीकार भी किया था कि ‘भ्रष्टाचार का मुद्दा’ 2014 के चुनाव में पार्टी की पराजय के प्रमुख कारणों में एक था.

मलेशिया में एक आयोजन में उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस पार्टी में अंदरूनी झगड़े, कांग्रेस पार्टी में पीढ़ीगत संघर्ष, पुराना दृष्टिकोण, नया दृष्टिकोण… और सब परस्पर टकरा गए. हम एक चुनाव लड़ रहे थे (2014 का आम चुनाव), पर हमारे यहां ये आंतरिक संघर्ष चल रहे थे… हमारे सामने भ्रष्टाचार के मुद्दे भी थे. और ये सब एक साथ मौजूद थे.’

धारणा की लड़ाई

हाल के विधानसभा चुनावों में, भाजपा और कांग्रेस ने एक-दूसरे पर, खास कर मध्य प्रदेश में, भ्रष्टाचार के आरोप लगाए. पर, एक मुद्दे के रूप में भ्रष्टाचार किसी एक पार्टी के पक्ष में परिणामों को नहीं ले जा पाया. दोनों को लगभग बराबर की संख्या में सीटें मिलीं. राजस्थान में भी, मुकाबला नजदीकी रहा और भाजपा ने कांग्रेस के 2013 के प्रदर्शन की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया.

इसलिए, क्या 2019 में भ्रष्टाचार एक अहम चुनावी मुद्दा रहेगा या 2014 की तरह एकमात्र चुनावी मुद्दा? क्या ‘वाड्रा के खिलाफ़ कार्रवाई करने में इतनी देरी क्यों’ का सवाल भाजपा को परेशान करेगा?

इस बात में संदेह नहीं कि नरेंद्र मोदी ने रणनीतिक रूप से कांग्रेस के भ्रष्टाचार के मुद्दे को चुनावी क्रियाकलापों के केंद्र में ला दिया है. भाजपा को भ्रष्टाचार, खास कर शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार, के आरोपों से सुरक्षित माना जाता है. इस तरह की छवि और धारणा निश्चय ही चुनाव अभियान में भाजपा को बढ़त दिला सकेगी. वाड्रा से ईडी की पूछताछ संबंधी सार्वजनिक प्रदर्शन और कांग्रेस के प्रथम परिवार के भ्रष्टाचार से मालामाल होने संबंधी आम धारणा का आने वाले महीनों में काफी असर होगा.

प्रियंका गांधी वाड्रा के अपने पति को दिल्ली में ईडी कार्यालय तक छोड़ने की तस्वीरें वायरल हो गईं. वह चुनाव अभियान की मुद्रा में हैं, और अपनी दादी को जनता पार्टी द्वारा परेशान किए जाने का स्मरण करा रही हैं.

हालांकि, यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस ‘प्रतिशोध की राजनीति’ का शिकार होने की बात कर भ्रष्टाचार के मुद्दे से ध्यान बंटाने की रणनीति को किस तरह अंजाम देती है. भाजपा के नीतिकार यदि ‘अबकी बार, तीन सौ पार’ के लक्ष्य को पाना चाहते हैं, तो उन्हें भी भ्रष्टाचार के मुद्दे को कम से कम 2014 के स्तर तक ले जाना होगा. फिलहाल, यह लक्ष्य नामुमकिन सा दिखता है.

(लेखक ‘ऑर्गनाइज़र’ के पूर्व संपादक हैं)

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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