यह ऐसी खबर है, जो 2026 में भी हो सकती थी.एक मंदिर समिति घोटाले में फंस गई. रात के अंधेरे में दो लोगों की हत्या हो गई. भगवान के लिए रखे गए गहने गायब होकर किसी निजी व्यक्ति के पास पहुंच गए. आधी रात को जांच अधिकारी यह पता लगाने पहुंचे कि मंदिर का खजाना आखिर कहां गया, लेकिन यह घटना 2026 की नहीं है. यह करीब एक हज़ार साल पहले तमिलनाडु के समुद्री तट पर स्थित एक मंदिर में हुई थी. जांच करने वाले अधिकारी किसी आधुनिक एजेंसी के नहीं, बल्कि चोल राजा के अधिकारी थे और पूरी घटना आज भी पत्थर पर खुदे एक शिलालेख में दर्ज है. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जब आखिरकार दोषियों को सजा मिली, तो वे बाहर से आए चोर या धर्म विरोधी लोग नहीं थे. वे उसी मंदिर के पुजारी थे.
हम अक्सर यह मान लेते हैं कि प्राचीन भारत के मंदिर पूरी तरह धार्मिक और पवित्र स्थान थे. हम सोचते हैं कि मंदिरों की संपत्ति पवित्र थी, लोगों ने अच्छे कामों के लिए दान दिया था और उसका ईमानदारी से इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन आज देश के सबसे अमीर मंदिर ट्रस्टों में से एक अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट भी जांच के दायरे में है. इस ट्रस्ट पर चढ़ावे और गहनों के गायब होने तथा ज़मीन को उसकी वास्तविक कीमत से कई गुना ज्यादा दाम पर खरीदने के आरोपों की जांच चल रही है.
कुछ समय पहले ईशा फाउंडेशन के संस्थापक और स्वयंभू धर्मगुरु जग्गी वासुदेव ने “फ्री तमिलनाडु टेम्पल्स” अभियान शुरू किया था. बाद में आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक रवि शंकर ने भी इस अभियान का समर्थन किया. इस अभियान का कहना था कि सरकार के नियंत्रण में रहने से मंदिरों की स्थिति खराब होती है और उनका प्रबंधन श्रद्धालुओं के हाथ में होना चाहिए. हम यह मानना पसंद करते हैं कि धार्मिक संस्थाएं भ्रष्टाचार और घोटालों जैसी चीजों से ऊपर होती हैं, लेकिन मध्यकाल के ऐतिहासिक सबूत हमें ठीक इसका उल्टा बताते हैं.
मंदिर और उनकी संपत्ति
यह समझने के लिए हमें यह देखना होगा कि करीब 1100 ईस्वी में दक्षिण भारत का एक बड़ा मंदिर वास्तव में कैसा होता था. उस समय तक कावेरी घाटी में बहुत तेजी से बड़े-बड़े मंदिर बन चुके थे. इन मंदिरों के चारों ओर ऊंची-ऊंची दीवारें और विशाल गोपुरम (मंदिर के प्रवेश द्वार के ऊंचे टावर) बने होते थे. अक्सर मंदिरों के आसपास बाजार और रहने के लिए बस्तियां भी विकसित हो जाती थीं. इन मंदिरों के आसपास सैकड़ों एकड़ उपजाऊ खेती की जमीन होती थी. नहरों, झाड़ियों और पेड़ों के बीच यह जमीन अलग-अलग खेतों में बंटी होती थी. एक ही मंदिर के पास दर्जनों गांवों में जमीन हो सकती थी. जरूरी नहीं कि वे गांव मंदिर के बिल्कुल पास ही हों. इन मंदिरों में दान देने के लिए लोग कई-कई दिनों या हफ्तों की यात्रा करके आते थे. वे मंदिरों में सोना, पशु, जमीन, गहने और कांस्य (ब्रॉन्ज) की मूर्तियां दान करते थे. मंदिरों को मिलने वाले बड़े दान की ज़रूरत भी होती थी. इसी धन से मंदिरों के अलग-अलग हिस्सों में पूजा करने वाले ब्राह्मण पुजारियों को भुगतान किया जाता था, कपूर जैसी महंगी पूजा सामग्री बाहर से मंगाई जाती थी और बड़ी संख्या में काम करने वाले कर्मचारियों का खर्च उठाया जाता था. यहां तक कि एक छोटा मंदिर भी अपने पास जमीन रखता था, लोगों को कर्ज देता था और वहां दर्जनों लोग काम करते थे.
मंदिरों में इतनी बड़ी मात्रा में धन, ज़मीन और लोगों का एक जगह होना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक और आर्थिक हितों को भी अपनी ओर खींचता था. 10वीं सदी के आखिर में कांचीपुरम से जारी मद्रास म्यूजियम कॉपर प्लेट्स में एक ऐसी व्यवस्था का उल्लेख मिलता है, जिसमें उलगालांडा पेरुमल मंदिर ने स्थानीय बुनकरों और कपास उगाने वाले गांवों को सोना उधार दिया था. (South Indian Inscriptions, Volume III, 128) इसका हिसाब-किताब बुनकर रखते थे और हर साल शहर के वरिष्ठ व्यापारी उसकी जांच करते थे. इस पूरी व्यवस्था को चोल राजा उत्तम (लगभग 973–985 ईस्वी) की मंजूरी मिली हुई थी. यह अपने समय का अपेक्षाकृत शुरुआती और कुछ अलग उदाहरण था, क्योंकि इसका संबंध कपड़ा उत्पादन से था. ज्यादातर मंदिरों के शिलालेख जमीन से जुड़े दान पर ही केंद्रित हैं. इतिहासकार जेम्स हाइट्ज़मैन ने अपनी किताब Gifts of Power में मध्यकालीन तमिल मंदिरों का अध्ययन किया. उन्होंने पाया कि “काणी (kāṇi)“, यानी जमीन के निजी स्वामित्व और पैतृक अधिकार के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द, 980 ईस्वी से पहले बहुत कम मिलता है, लेकिन इसके बाद यह शब्द तेजी से बढ़ने लगा. पूरे चोल काल में जैसे-जैसे मंदिरों का विस्तार हुआ, वैसे-वैसे जमीन के मालिकाना हक और किराए से जुड़े शब्द भी बढ़ते गए.
तोहफे में मिली ज़मीन का विचार मन में ऐसी तस्वीर बना सकता है कि ज़मीन का एक टुकड़ा किसी भक्त किसान के हाथ से निकलकर मंदिर के पवित्र मैनेजरों और उनके वफादार कर्मचारियों के पास चला गया हो, लेकिन व्यवहार में ऐसा हमेशा नहीं होता था. जेम्स हाइट्ज़मैन बताते हैं कि “ज़मीन का दान” अक्सर ज़मीन देने का नहीं, बल्कि उस ज़मीन से मिलने वाली आय (राजस्व) का एक हिस्सा मंदिर को देने का तरीका होता था. यानी ज़मीन वही रहती थी, लेकिन उसकी कमाई का अधिकार मंदिर को दे दिया जाता था. 12वीं सदी के ज़मीन के कारोबारियों की चालाकी भी आज के प्रॉपर्टी कारोबारियों जैसी ही थी. शिलालेखों का अध्ययन करने वाले विद्वान नोबोरू कराशिमा ने अपनी किताब Ancient to Medieval: South Indian Society in Transition में लिखा है कि कई शिलालेखों में ऐसे खरीदारों का ज़िक्र मिलता है, जो सूखे, बाढ़ या ज्यादा टैक्स की वजह से बर्बाद हो चुके गांवों में ज़मीन खरीदने पहुंच जाते थे. अक्सर यह ज़मीन बड़े सरकारी नीलामियों (पेरुविलै) में खरीदी जाती थी. इन नीलामियों का नाम किसी राजा के नाम पर रखा जाता था और इन्हें शाही अधिकारी कराते थे.
जब ऐसी खरीदी गई ज़मीन मंदिर को दान दी जाती थी, तो उसे “देवदान (Devadāna)” कहा जाता था, यानी “भगवान को दी गई ज़मीन”. राजा ऐसी जमीन को एकमुश्त रकम मिलने के बदले टैक्स से मुक्त घोषित कर देता था. कुछ मामलों में ज़मीन का टैक्स राजा की जगह मंदिर को दिया जाता था, लेकिन कई शिलालेखों में यह भी लिखा है कि देवदान की ज़मीन “कुडी-निंगा (kudi-ninga)” होती थी, यानी उस ज़मीन पर खेती करने वाले किसान वहीं बने रहते थे. सरल शब्दों में कहें तो दान देने वाला व्यक्ति पहले सस्ती ज़मीन खरीदता था, फिर राजा की जगह मंदिर को टैक्स देता था. इसके बदले उसे मंदिर से सम्मान भी मिलता था. इसके बाद वह ज़मीन पर भूमिहीन किसानों से खेती करवाता था, जबकि फसल का ज्यादातर हिस्सा खुद रखता था. साथ ही, जब ज़मीन की कीमत बढ़ती थी, तो उसे बेचने का अधिकार भी उसी के पास रहता था.
मंदिरों के शिलालेख बताते हैं कि ये संस्थाएं सिर्फ जमीन का दान लेने वाली नहीं थीं. वे खुद भी ज़मीन खरीदती थीं. कई मामलों में मंदिर किसी पूरे इलाके के सबसे बड़े कृषि भूमि मालिक थे और आज भी कई जगह हैं. नोबोरू कराशिमा ने अपनी किताब History and Society in South India में श्रीरंगम द्वीप पर स्थित जम्बुकेश्वरम के शिव मंदिर का अध्ययन किया. उन्होंने पाया कि 12वीं और 13वीं सदी में मंदिर के प्रबंधकों ने भगवान के नाम पर गांवों की बड़ी-बड़ी ज़मीनें सीधे खरीदी थीं. एक मामले में 39 अलग-अलग लोगों ने पांच अलग-अलग सौदों के जरिए मंदिर को जमीन बेची थी. यह वही ज़मीन थी, जिसे उन्होंने पहले दूसरे लोगों से खरीद रखा था. (Annual Records of South Indian Epigraphy (ARE) 1937–38, Nos. 32–36) अगर इन ऐतिहासिक घटनाओं की समानता आज के मंदिरों की ज़मीन से जुड़े विवादों से दिखाई देती है, तो यह सिर्फ एक संयोग माना जाएगा.
सरकारी हस्तक्षेप और किसानों को बेदखल करना
“कुडी-निंगा (kuḍi-ninga)” मंदिरों की देवदान ज़मीन का एक प्रकार था. इसमें ज़मीन का मालिक बदल जाता था, उससे मुनाफा कमाया जाता था, लेकिन उस ज़मीन पर खेती करने वाले किसान वहीं रहते थे. बस फर्क इतना होता था कि फसल का मुख्य हिस्सा अब पहले वाले मालिक की जगह किसी और को मिलता था, लेकिन देवदान ज़मीन का एक दूसरा प्रकार भी था, जो कहीं ज्यादा चिंताजनक था. इसे “कुडी-नीक्की (kuḍi-nīkki)” कहा जाता था.
इस व्यवस्था में किसानों को उनकी ज़मीन से निकाल दिया जाता था. इतिहासकार नोबोरू कराशिमा को इसके कई उदाहरण कोल्लिडम नदी के किनारे स्थित किलपालुवुर में मिले. वहां सेना से जुड़े शक्तिशाली लोगों ने बड़ी मात्रा में ज़मीन अपने कब्ज़े में कर ली और बड़ी संख्या में किसानों को वहां से हटा दिया गया. स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि 12वीं सदी के कई चोल राजाओं को बेदखल किए गए किसानों को फिर से उनकी जमीन के अधिकार लौटाने की कोशिश करनी पड़ी. उन्होंने “राजकुलवर (rajakulavar)“, यानी बड़े और प्रभावशाली जमींदार परिवारों को सरकारी नीलामी में ज़मीन खरीदने पर भी रोक लगा दी. (ARE 1926, Nos. 259, 257), लेकिन बाद के शिलालेख बताते हैं कि इन कोशिशों का ज्यादा फायदा नहीं हुआ. जो किसान वापस अपनी ज़मीन पर लौटे, उन्होंने कुछ समय बाद फिर वही ज़मीन हथियारबंद ताकतवर लोगों को दे दी. यह साफ नहीं है कि उन्होंने ऐसा अपनी इच्छा से किया था या दबाव में.
जिस घटना का ज़िक्र इस लेख की शुरुआत में किया गया था—आज के मयिलाडुथुरई जिले के सायावनम मंदिर में 12वीं सदी का घोटाला—वह भी राजा के हस्तक्षेप का एक और उदाहरण है. (ARE 1911, No. 267). आधी रात को हुई एक अचानक जांच में पता चला कि शिव-ब्राह्मण, यानी मंदिर के कुछ पुजारी, भगवान के गहने चोरी करने में शामिल थे. सज़ा के तौर पर उन पर 180 सोने के सिक्कों का जुर्माना लगाया गया. यह रकम मंदिर की सिर्फ 20.5 दिनों की आय के बराबर थी. चोल काल के शिलालेखों में ऐसे कई और उदाहरण मिलते हैं, जहां शाही अधिकारियों ने मंदिरों के मामलों में हस्तक्षेप किया. उन्होंने गलत हिसाब-किताब रखने वाले पुजारियों और मंदिर प्रबंधन समितियों पर जुर्माना लगाया. कई मामलों में मंदिर के खजाने में मौजूद संपत्ति का हिसाब पत्थरों पर दर्ज दान के रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता था. इससे साफ होता है कि मध्यकाल के मंदिर ऐसे स्थान नहीं थे, जिन्हें पूरी तरह अपने हाल पर छोड़ दिया गया हो.
तो क्या राजा ही इस पूरी व्यवस्था में संतुलन बनाए रखने वाली सबसे बड़ी ताकत थे? यह सोच आकर्षक ज़रूर लगती है, लेकिन घटनाओं का क्रम कुछ और कहानी बताता है. जैसा पहले बताया गया, कई गांवों को भारी सरकारी टैक्स के कारण अपनी सामुदायिक जमीन बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा. अक्सर इन ज़मीनों की नीलामी शाही अधिकारी करवाते थे और उनका नाम भी राजा के नाम पर रखा जाता था. जब सामुदायिक ज़मीन निजी संपत्ति बन गई, तो उसी के बाद शाही अधिकारी तय करते थे कि उस जमीन को टैक्स से छूट मिलेगी या नहीं. यही अधिकारी यह भी तय करते थे कि उस ज़मीन को “कुडी-निंगा (किसान बने रहेंगे)” या “कुडी-नीक्की (किसानों को हटाया जाएगा)” की श्रेणी में रखा जाएगा. दरअसल, इतिहासकार जेम्स हाइट्ज़मैन ने तिरुविदैमरुदुर और तिरुकोयिलुर के मंदिरों के शिलालेखों का अध्ययन किया. उन्होंने पाया कि टैक्स से मुक्त मंदिर की ज़मीन दान करने वालों में सबसे बड़ी संख्या उन अमीर लोगों की थी, जिन्हें राजदरबार की ओर से विशेष सम्मान और उपाधियां मिली हुई थीं.
घोटाले और समाज का हस्तक्षेप
असल में, मध्यकाल के सबसे अमीर लोगों ने राजा की टैक्स व्यवस्था और मंदिरों को दान देकर मिलने वाले सम्मान का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया. उनका एक पसंदीदा तरीका यह था कि गांव की सामान्य, टैक्स देने वाली सामुदायिक ज़मीन को धीरे-धीरे पवित्र, टैक्स से मुक्त और निजी नियंत्रण वाली मंदिर की ज़मीन में बदल दिया जाए. विडंबना यह थी कि इस काम में शाही अधिकारी भी उनकी मदद करते थे, क्योंकि उन्हें भी इस व्यवस्था से फायदा मिलता था. इसका नतीजा यह हुआ कि एक तरफ चोल साम्राज्य की टैक्स से होने वाली आमदनी लगातार कम होती गई. दूसरी तरफ भव्य और सुंदर मंदिर बनते गए, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान भूमिहीन किसानों को उठाना पड़ा. इतिहासकार नोबोरू कराशिमा लिखते हैं कि 13वीं सदी की शुरुआत तक खेती-किसानी का इतना बड़ा संकट पैदा हो गया था कि कई परिवार दिवालिया होने लगे. लोग अपनी मजबूरी में खुद को गुलामी में बेचने लगे. इसी दौरान पांड्य और होयसला सेनाओं ने चोल राज्य पर हमला किया और पूरा साम्राज्य अशांति में डूब गया. छोटे मंदिरों को इस संकट का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ. जबकि जम्बुकेश्वरम जैसे बड़े और स्थापित मंदिरों ने और भी ज्यादा ज़मीन अपने नियंत्रण में कर ली.
चोल इतिहास के सबसे बड़े विद्वानों में से एक के. ए. नीलकंठ शास्त्री ने तंजावुर के पास शिवपुरम में हुए एक बहुत बड़े घोटाले का ज़िक्र किया है. (The Cōḷas, ARE 1927, No. 279). 13वीं सदी के उस अशांत दौर में दो ब्राह्मण पुजारियों ने मंदिर पर कब्ज़ा कर लिया. उन्होंने कर्नाटक से भाड़े के सैनिक बुलाए. माना जाता है कि ये सैनिक शायद होयसला सेना के बचे हुए लोग थे. इन सैनिकों की मदद से उन्होंने आसपास के गांवों से 50 हज़ार सोने के सिक्के जबरन वसूले. (अगर सिर्फ सोने की कीमत के हिसाब से देखें, तो आज इसकी कीमत लगभग 100 से 200 करोड़ रुपये के बीच होगी.) उन्होंने मंदिर का धन भी चुराया. राजा को टैक्स देने से इनकार कर दिया. यहां तक कि देवी के लिए रखा गया एक हार अपनी रखैल (प्रेमिका) को दे दिया. आखिरकार आसपास के गांवों की सभा इस पूरे मामले से नाराज़ हो गई और उसने खुद कार्रवाई की. गांव की सभा ने पुजारियों पर भगवान शिव और राजा, दोनों के साथ विश्वासघात करने का आरोप लगाया. इसके बाद उन पुजारियों की सारी संपत्ति जब्त कर ली गई. दिलचस्प बात यह है कि 1970 के दशक में भी शिवपुरम का मंदिर एक और घोटाले की वजह से चर्चा में आया था. उस समय ज़मीन से निकली नटराज की एक प्राचीन कांस्य प्रतिमा को नकली प्रतिमा से बदल दिया गया था.
चोल साम्राज्य के पतन के बाद मंदिरों की पूजा-पाठ और सेवाएं फिर से शुरू कराने के लिए कई जगह लोगों ने मिलकर काम किया. यह काम कभी पारंपरिक गांव सभाओं ने किया, तो कभी अलग-अलग जातियों के कई समूहों की बड़ी क्षेत्रीय सभाओं ने मिलकर किया, लेकिन लंबे समय में ज़मीन के मालिकाना हक में जो बदलाव हो चुके थे, उन्हें वापस नहीं बदला जा सका. समय के साथ मंदिरों में अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि के लोगों का संरक्षण बढ़ा. फिर भी, ज्यादातर मामलों में ज़मीन के बड़े मालिकों का प्रभाव सबसे ज्यादा बना रहा.
इतिहास हमें यह नहीं बताता कि मंदिरों के मामलों में सरकारी अधिकारी मंदिर समिति से बेहतर थे. बल्कि इतिहास यह दिखाता है कि सरकारी अधिकारी, मंदिर समितियां और उस समय के कई सबसे अमीर लोग—सभी का मंदिरों से आर्थिक फायदा जुड़ा हुआ था. आज मंदिरों की स्वायत्तता (Autonomy) को लेकर होने वाली बहसों में अक्सर इसी महत्वपूर्ण बात को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. भगवान अपने भक्तों के दिलों में पूर्ण और निष्कलंक हो सकते हैं, लेकिन यह पूर्णता हमेशा उनके राजनीतिक संरक्षकों या मंदिरों में चढ़ावे का प्रबंधन करने वालों तक नहीं पहुंचती.
अनिरुद्ध कनिसेट्टि एक पब्लिक हिस्टोरियन हैं. वे ‘लॉर्ड्स ऑफ अर्थ एंड सी: ए हिस्ट्री ऑफ द चोल एम्पायर’ और अवार्ड-विनिंग ‘लॉर्ड्स ऑफ द डेक्कन’ के लेखक हैं और इकोज़ ऑफ इंडिया और युद्ध पॉडकास्ट को होस्ट करते हैं. उनका एक्स हैंडल @anirbuddha है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
यह आर्टिकल ‘थिंकिंग मेडिवल’ सीरीज़ का हिस्सा है जो भारत की मध्ययुगीन संस्कृति, राजनीति और इतिहास की गहराई से पड़ताल करता है.
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