अमेरिका-इजरायल के जो हवाई हमले ईरान के राजनीतिक/सैन्य नेतृत्व का खात्मा और उसकी सैन्य ताकत को पंगु बनाकर वहां सत्ता परिवर्तन के मकसद से शुरू किए गए वे कच्चे तेल को लेकर कहीं ज्यादा खतरनाक जंग में तब्दील हो गए हैं. यह दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए घातक साबित हो सकती है. कच्चे तेल की कीमत 40-50 फीसदी की उछाल लेकर प्रति बैरल 119 डॉलर पर पहुंच गई है.
ईरान ने इस प्रक्रिया की शुरुआत जंग के क्षेत्र और स्तर को इस तरह विस्तार देकर कर दी है कि पूरा क्षेत्र इसकी गिरफ्त में आ गया है, जिसमें ज्यादा ज़ोर खाड़ी देशों पर पड़ रहा है. इन देशों को मिसाइलों और ड्रोनों की मार इज़रायल से ज्यादा झेलनी पड़ी है. ईरान ने ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ में तेल के 17 टैंकर और मालवाहक जहाजों को निशाना बनाकर इसे ‘खतरनाक जगह’ बना दिया है और लगभग पूरी तरह से बंद कर दिया है.
गतिरोध को खत्म करने के लिए अमेरिका ने खर्ग द्वीप पर हवाई और मिसाइल हमले किए, जहां से ईरान अपने कच्चे तेल का 90 फीसदी हिस्सा निर्यात करता है, लेकिन उसने वहां के तेल टर्मिनल पर हमला करने से परहेज किया. लेकिन ईरान ने फुजैराह बंदरगाह के तेल टर्मिनल पर जवाबी हमला कर दिया. यह बंदरगाह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बाइपास करता है. अब तक दोनों पक्ष जंग को बेकाबू होने से रोकने के लिए तेल और गैस के भंडारों पर नियंत्रित हमले करते रहे हैं. जंग का बेकाबू होना क्षेत्रीय तथा दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए भयानक नतीजे ला सकता है. लेकिन बुधवार को जब इजरायल ने फारस की खाड़ी में ईरान की 70 फीसदी गैस का उत्पादन करने वाले साउथ पार्स गैसफील्ड को निशाना बनाया तब जंग में बड़ी तेजी आ गई. ईरान ने इसका जवाब क़तर की आमदनी के मुख्य स्रोत रास लाफ़्फ़ान गैसफील्ड पर हमला करके दिया.
इस युद्ध का यह विरोधाभास साफ होकर उभरता जा रहा है: अमेरिका और इजरायल ने सामरिक दृष्टि से वर्चस्व तो कायम कर लिया है लेकिन विनाश झेलते हुए कमजोर पड़ने के बावजूद ईरान इस युद्ध के रणनीतिक माहौल को स्वरूप दे रहा है. दोनों पक्षों ने राजनीतिक और सैन्य लक्ष्यों को संशोधित या पुनः परिभाषित करने के लिए रणनीति की समीक्षा की है. अब देखना यह है कि प्रतिद्वंद्वियों के भावी राजनीतिक और सैन्य लक्ष्य क्या हो सकते हैं, और जंग आगे किस दिशा में जा सकता है?
अमेरिका-इजरायल की रणनीतिक दुविधा
अमेरिका-इजरायल अपनी शुरुआती चाल में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई समेत शीर्ष राजनीतिक तथा सैन्य नेतृत्व का खात्मा करने में सफल रहे. इसके बाद से वे ईरान की जवाब देने की सैन्य क्षमता और ताकत को सैन्य लक्ष्यों के मुताबिक काफी कमजोर करते गए हैं. ईरान की एयर डिफेंस सिस्टम को नष्ट कर दिया गया है, और हवाई जंग में बढ़त हासिल की गई है. राजनीतिक तथा सैन्य कमांड एवं कंट्रोल, डिफेंस उद्योग, और आंतरिक सुरक्षा इन्फ्रास्ट्रक्चर को या तो नष्ट कर दिया गया है या बुरी तरह कमजोर कर दिया गया है.
अमेरिका-इजरायल ने दावा किया कि ईरान की प्रमुख जवाबी ताकत, मिसाइलों तथा ड्रोनों के हमलों की संख्या में 28 फरवरी के बाद से 90 फीसदी की कमी आई है. लेकिन पिछले तीन दिनों से इन हमलों में वृद्धि हुई है और शुरुआती तीन दिनों के चरम दौर की तुलना में मिसाइलों से हमलों की संख्या औसतन 20 फीसदी, और ड्रोनों से हमलों की संख्या औसतन 45 फीसदी रह गई हैं. इजरायल डिफेंस फोर्सेस का अनुमान है कि ईरान के करीब 450-500 मिसाइल लांचर में से 70 फीसदी लांचर या तो नष्ट किए जा चुके हैं या जंग लड़ने के लायक नहीं रह गए हैं. ईरान की पारंपरिक नौसेना को कुलमिलाकर नष्ट किया जा चुका है. यानी उसके पास अब पर्याप्त मिसाइलों के साथ 135-150 मिसाइल लांचर रह गए हैं. इसी तरह, आकलन किया गया है कि उसकी केवल 30 फीसदी ड्रोन शक्ति साबुत बची रह गई है.
ईरान की हुकूमत की संघर्ष क्षमता के कारण निरंतरता बनी हुई है और सत्ता पर उसकी पकड़ के कारण सत्ता परिवर्तन के राजनीतिक लक्ष्य को लेकर अस्पष्टता पैदा हुई है. नया लक्ष्य यह बन गया है कि सैन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर को कमजोर किया जाए; और जीत की घोषणा करने की, और उसी हुकूमत अथवा उसके अधिक स्वीकार्य अवतार के साथ वार्ताओं के जरिए अपनी शर्तों पर शांति कायम करवाने की क्षमता बनाई जाए.
लेकिन ईरान ने असंभव शर्तें प्रस्तुत कर दी—सभी अमेरिकी अड्डों को हटाया जाए और युद्ध का मुआवजा दिया जाए— और उसने वार्ता से इनकार कर दिया है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने के कारण इस युद्ध से जल्द बाहर निकलने का विकल्प लगभग खत्म हो गया है.
होर्मुज को कार्गो और टैंकरों के लिए केवल नौसैनिक शक्ति के बूते खुला नहीं रखा जा सकता. ईरान की बची हुई ड्रोन और मिसाइल क्षमता, और समुद्र के अंदर उड़ने वाले ड्रोनों, छोटी पनडुब्बियों तथा फिदायीन नौकाओं के रूप में विषम समुद्री ताकत असहनीय नुकसान पहुंचा सकती है. सैन्य दृष्टि से होर्मुज की सुरक्षा के लिए इस क्षेत्र के द्वीपों की प्रत्यक्ष सुरक्षा, प्रभावी एयर डिफेंस, गैर-पारंपरिक समुद्री खतरों को नष्ट करने के लिए निरंतर नौसैनिक ऑपरेशन जारी रखना जरूरी है. इसके साथ ही नौसेना की स्थायी मौजूदगी भी जरूरी होगी.
उपरोक्त बातों के मद्देनजर संशोधित राजनीतिक-सैन्य लक्ष्य यह होगा—ईरान और खासकर इसके समुद्रतटीय क्षेत्र और होर्मुज में द्वीपों पर इसकी बची हुई सैन्य क्षमता, खासकर इसकी मिसाइल तथा ड्रोन शक्ति का विनाश. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की प्रत्यक्ष सुरक्षा के लिए इसमें स्थित द्वीपों को कब्जे में लेने के लिए सीमित जमीनी ऑपरेशन चलाए जा सकते हैं.
ईरान में सत्ता परिवर्तन करवाने के मूल राजनीतिक लक्ष्य का साया पृष्ठभूमि में हावी रहेगा और नेतृत्व के खात्मे के लिए हमले जारी रह सकते हैं.
मेरा ख्याल है कि अमेरिका ईरान की जमीन पर कोई बड़ी सैन्य कार्रवाई शायद ही करेगा. खर्ग द्वीप को कब्जे में लेने या तेल भंडार को निशाना बनाने के लालच को भी खाड़ी देशों में तेल के भंडारों पर ईरान के जवाबी हमलों के डर से दरकिनार किया जाएगा. लेकिन एनर्जी को लेकर जंग में बेकाबू तेजी आने पर, और जीत का ऐलान करने की प्रतीकात्मक कार्रवाई की खातिर खर्ग को कब्जे लिया जा सकता है.
ईरान में 60 फीसदी परिष्कृत यूरेनियम के 440-450 किलोग्राम के भंडार के सही स्थान का पता लगने पर उसे कब्जे में लेने के लिए स्पेशल फोर्सेस द्वारा ऑपरेशन किया जा सकता है.
संशोधित लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अभी और तीन सप्ताह तक निरंतर सैन्य कार्रवाई जारी रह सकती है और उसके बाद स्थिति की एक और समीक्षा की जा सकती है.
ईरान की रणनीति
ईरान का राजनीतिक-सैन्य लक्ष्य था—अपने यहां की हुकूमत को कायम रखना और अमेरिका-इजरायल को रणनीतिक शिकस्त देने के लिए इस जंग को फारस खाड़ी के पूरे क्षेत्र में फैलाकर उन्हें थका डालना, और वैश्विक आर्थिक संकट पैदा करने के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करना.
युद्ध के तीन सप्ताह पूरे होने पर मैं बेहिचक यह कह सकता हूं कि ईरान अपनी रणनीति को लागू करने में पूरी तरह सफल रहा है. मजहब पर आधारित हुकूमत अपने नेताओं के खात्मे के बाद भी न केवल कायम रही है बल्कि इसने मारे गए सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के बेटे मोज्तबा खामेनेई को अपना नया सुप्रीम लीडर चुनकर लगातार बनाए रखी है. इसने राज्यसत्ता पर अपनी मजबूत पकड़ भी बना रखी है और लोगों में बाहरी दुश्मन के खिलाफ राष्ट्रवादी भावना को भी जगाने में कुछ हद तक सफलता पाई है.
ईरान ने जवाबी हमला करने की अपनी प्रमुख ताकत, मिसाइलों और ड्रोनों का काफी प्रभावी इस्तेमाल किया है. इसने इजरायल, अमेरिकी सैनिक अड्डों और खाड़ी के सभी देशों को सफलतापूर्वक निशाना बनाया है. रडार और संचार केंद्रों के रूप में अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम्स को नष्ट करने या नुकसान पहुंचाने में भी कुछ बड़ी कामयाबियां हासिल की हैं. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करके समुद्री जहाजों की आवाजाही को भी इसने सफलतापूर्वक निशाना बनाया है. अगर इसके तेल उत्पादन के इन्फ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया गया तो दूसरों के इस इन्फ्रास्ट्रक्चर पर सोचे-समझे जवाबी हमले करने के इरादे और क्षमता का संकेत देने के लिए भी इसने मिसाइलों और ड्रोनों का इस्तेमाल किया है.
मिसाइलों और ड्रोनों के हमलों से कुल नुकसान अपेक्षाकृत मामूली हुआ है, क्योंकि 90 फीसदी मिसाइलों और ड्रोनों को बीच में ही नष्ट कर दिया गया. लेकिन युद्ध पूरे क्षेत्र में फैल गया और इसने दुनिया को 20 फीसदी तेल से वंचित करके वैश्विक आर्थिक संकट पैदा कर दिया. गौर करने वाली बात यह है कि ईरान ने अपना तेल निर्यात जारी रखा और मित्र देशों के तेल टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही की भी व्यवस्था की.
ईरान ने युद्धविराम और वार्ता की सभी पेशकश को अपनी अटल शर्तें रखकर खारिज कर दिया है. शहादत के शिया आदर्श से प्रेरित होकर यह तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद अपनी रणनीति पर कायम रहेगा. अगर तेल के इसके इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खतरा हुआ तो अंतिम उपाय के तौर पर यह इस क्षेत्र में तेल के इन्फ्रास्ट्रक्चर को सीधा निशाना बनाने के लिए भी तैयार रहेगा. मौजूदा हुकूमत लड़ते हुए मिट जाने को तैयार है. जवाबी कार्रवाई करने की इसकी ताकत पूरी तरह नष्ट कर दी गई तब यह अमेरिका को रणनीतिक सफलता से वंचित करने के लिए विषम युद्ध को लंबा खींचने की कोशिश करेगी.
इसकी अपनी रणनीति को जारी रखने का दारोमदार मिसाइलों और ड्रोनों की बची हुई ताकत पर और होर्मुज को बंद रखने के इसके गैर-पारंपरिक समुद्री संसाधनों पर ही है. लेकिन यह एक अज्ञात पहलू है क्योंकि मिसाइलों और ड्रोनों की बची हुई इसकी ताकत, और इनका उत्पादन करने की इसकी क्षमता को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. अमेरिका-इजरायल के निरंतर हवाई हमलों का ज़ोर इस बची हुई ताकत को निशाना बनाने पर ही रहेगा. हो सकता है, ईरान ने भंडार बनाए रखने के लिए मिसाइलों और ड्रोनों से हमलों को जानबूझकर कमी की हो. इजरायल के ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ के बाद आठ महीने में ईरान ने मिसाइलों और ड्रोनों की अपनी पुरानी ताकत फिर से हासिल कर ली थी.
ईरान के पास 60 फीसदी तक परिष्कृत यूरेनियम का 440-450 किलो का भंडार मौजूद है. यूरेनियम को परिष्कृत करने के इसके इन्फ्रास्ट्रक्चर को तो नष्ट कर दिया गया है लेकिन यह आशंका बनी रहेगी कि वह भविष्य में 8-10 अपरिष्कृत परमाणु बम तैयार कर सकता है.
पूर्वानुमान
अगले तीन सप्ताह में अमेरिका और इजरायल की तरफ से अब तक के सबसे जोरदार हमले किए जा सकते हैं जिनका लक्ष्य ईरान की मिसाइलों और ड्रोनों की बची हुई ताकत और उत्पादन क्षमता को नष्ट करना होगा. होर्मुज को खुलवाने के लिए मजबूत समुद्री तथा जमीनी सैन्य ऑपरेशंस शुरू किए जा सकते हैं. ईरान में सत्ता परिवर्तन की अंतिम कोशिश करते हुए अमेरिका-इजरायल उसके नेताओं का खात्मा करना भी जारी रख सकते हैं.
ईरान की मौजूदा हुकूमत शिया परंपरा का पालन करते हुए इस उम्मीद में अंतिम दम तक लड़ती रह सकती है कि वह फ़ीनिक्स पक्षी की तरह खाक में से भी दोबारा जन्म ले सकती है. अमेरिका जमीनी चढ़ाई नहीं करेगा यह सोचना एक मुगालता ही हो सकता है. ज्यादा शक्तिशाली मिसाइल और ड्रोन के निर्माण में ज्यादा समय नहीं लगेगा. इस बीच विषम युद्ध दूसरे साधनों के साथ जारी रहेगा.
अमेरिका और इजरायल इस युद्ध में अकेले हैं. अगले कुछ सप्ताहों में, वे ईरान की बची हुई ताकत को नष्ट करके या और कमजोर करके और होर्मुज को खुलवाकर अपने सैन्य लक्ष्य शायद हासिल कर लें. इस क्षेत्र में अब अमेरिका की ज्यादा बड़े पैमाने पर स्थायी सैन्य तैनाती निश्चित है. जीत का ऐलान किया जा सकता है. लेकिन यह मुमकिन नहीं दिखता है कि ईरान हार मान लेगा. ऐसे में यही कहा जा सकता है कि अमेरिका की रणनीतिक हार तो पहले से ही तय थी.
लेफ्टिनेंट जनरल एच एस पनाग PVSM, AVSM (रिटायर्ड) ने भारतीय सेना में 40 साल तक सेवा की. वह नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड के GOC इन C थे. रिटायरमेंट के बाद, वह आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के सदस्य थे. विचार निजी हैं.
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