एक हैरान करने वाले घटनाक्रम में, सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज (CAPF) के अधिकारियों की ओर से दायर एक अवमानना याचिका, जिसे सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच के सामने सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया था, सुनवाई वाले दिन ही केस की सूची से हटा दी गई.
न तो बेंच को और न ही अवमानना मामले के याचिकाकर्ताओं को याचिका हटाए जाने या न्यायिक आदेश के उल्लंघन की कोई जानकारी थी.
जस्टिस उज्जल भुइयां और अतुल एस चांदुरकर की बेंच को नॉन-फंक्शनल फाइनेंशियल अपग्रेड (NFFU) मामले की सुनवाई करनी थी. इस मामले का असर करीब 25,000 से 30,000 सेवारत और रिटायर्ड CAPF अधिकारियों पर पड़ता है. बेंच ने रजिस्ट्री को आखिरी समय में याचिका हटाए जाने के कारण बताने का आदेश दिया. याचिकाकर्ताओं की ओर से इस मुद्दे को उठाए जाने के बाद यह आदेश दिया गया, जिससे पहले के न्यायिक आदेश को भी पलट दिया गया.
हैरानी की बात यह है कि इसके बाद रात करीब 8 बजे एक प्रशासनिक आदेश जारी किया गया. इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की ओर से एक स्पेशल बेंच बनाने की बात कही गई, जो अवमानना याचिका और सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन) एक्ट, 2026 को चुनौती देने वाली याचिका, दोनों की सुनवाई करेगी. इस स्पेशल बेंच की अध्यक्षता जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस भुइयां को करनी थी. इसके बाद इस मामले को 30 सितंबर के लिए सूचीबद्ध किया गया.
स्पेशल बेंच के सामने सुनवाई के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि उन्होंने 23 सितंबर को मुख्य न्यायाधीश के सामने यह बात रखी थी कि अवमानना याचिका और CAPF एक्ट को चुनौती देने वाली याचिका को एक साथ करके एक ही बेंच के सामने सूचीबद्ध किया जा सकता है. ASG ने यह भी कहा कि वह याचिकाकर्ताओं को इसकी जानकारी देना भूल गईं.
क्या दिलचस्प है
अलग-अलग चरणों में चल रहे दो मामलों को एक साथ करने के लिए ASG की ओर से यह बात रखना और इस तरह स्पेशल बेंच बनाने का आदेश कई सवाल खड़े करता है.
पहली बात, नियम और सामान्य शिष्टाचार के मुताबिक जब भी किसी चल रहे मामले को लेकर कोर्ट में कोई बात रखी जाती है, तो दूसरे पक्ष को पहले से इसकी जानकारी दी जानी चाहिए. ASG ने जब यह बात कोर्ट में रखी, तब ऐसा नहीं किया. इसके बाद भी उन्होंने याचिकाकर्ताओं और बेंच, दोनों को इसकी जानकारी नहीं दी. 30 सितंबर को स्पेशल बेंच के सामने मामला सूचीबद्ध होने तक भी उन्हें इसकी जानकारी नहीं दी गई. कम से कम इतना कहना तो बनता है कि यह हैरान करने वाला है. इसके बाद स्वाभाविक सवाल उठता है कि क्या यह सच में हुई गलती थी या जानबूझकर की गई चूक.
दूसरी बात, सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026 को चुनौती देने वाली याचिका पर पहले जस्टिस मिश्रा की बेंच सुनवाई कर चुकी थी. दलीलें पूरी होने के बाद इसे 18 नवंबर 2026 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया था. फिर एसजी ने इसे पहले से सुनवाई के एडवांस स्टेज में पहुंच चुकी अवमानना याचिका के साथ जोड़ना क्यों और कैसे उचित समझा? अगर एसजी ने सीजेआई की बेंच के सामने यह बात रखने से पहले याचिकाकर्ताओं को जानकारी दी होती, तो उनके वकीलों को इस प्रस्ताव के गलत होने की बात समझाने का मौका मिलता.
दरअसल, स्पेशल बेंच ने भी इन दोनों मामलों के बीच इस अंतर को नोट किया है. उसने अभी दोनों मामलों को एक साथ करने से इनकार किया है. बेंच पहले यह समझना चाहती है कि दोनों मामलों में कानूनी मुद्दे कितने एक जैसे हैं और क्या इन्हें एक साथ किया जा सकता है.
तीसरी बात, यह भी हैरान करने वाली है कि रजिस्ट्री ने सीजेआई के स्पेशल बेंच बनाने के आदेश पर तब तक कोई कार्रवाई नहीं की, जब तक मामले को 29 सितंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं कर दिया गया. आदेश और सुनवाई की तारीख के बीच करीब छह दिन थे. इसलिए रजिस्ट्री को पारदर्शिता के लिए सभी संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक करने चाहिए. इसमें 23 सितंबर को CJI की अदालत में ASG की ओर से की गई बात की ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग भी शामिल होनी चाहिए. इन्हें याचिकाकर्ताओं के साथ भी साझा किया जाना चाहिए, ताकि किसी भी तरह की आशंका को दूर किया जा सके.
जैसा कि कई वरिष्ठ वकीलों ने कहा है, यह पूरा घटनाक्रम रजिस्ट्री के कामकाज की अच्छी तस्वीर पेश नहीं करता. इससे ‘मास्टर ऑफ द रोस्टर’ व्यवस्था को लेकर हो रही आलोचना भी और बढ़ गई है. इस व्यवस्था के तहत मामलों में बेंच में आखिरी समय में बदलाव किए जाते हैं.
एक ऐसा चक्र जिससे निकलना मुश्किल है
CAPF अधिकारियों का NFFU मामला करीब 17 साल के संघर्ष के बाद भी एक ऐसे चक्र में फंसा हुआ दिखाई देता है, जिससे निकलना मुश्किल है. पहले अधिकारियों ने संबंधित अधिकारियों के सामने अपनी मांगें रखीं और उसके बाद कानूनी लड़ाई शुरू की, जो अब खुद 15 साल पुरानी हो चुकी है.
सरकार न्यायिक आदेशों को लागू करने से लगातार इनकार करती रही है. 2015 के दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को सरकार ने चुनौती दी थी. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी CAPF अधिकारियों के पक्ष में फैसला दिया. लेकिन इस फैसले को ऐसे समझा गया और लागू किया गया कि सिर्फ सीमित NFFU दिया गया. इसके दायरे से 98 प्रतिशत से ज्यादा कैडर अधिकारी बाहर रह गए. इसके बाद अधिकारियों ने एक और याचिका दायर की.
मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट का विस्तार से दिया गया और मजबूत तर्क वाला आदेश CAPF अधिकारियों के पक्ष में इस मामले को अंतिम रूप दे सकता था. लेकिन जैसा कि कहावत है, मंजिल तक पहुंचने से पहले कई अड़चनें आती हैं. CAPF अधिकारियों की खुशी ज्यादा समय तक नहीं रही. CAPF (General Administration) Act, 2026 के पास होने के बाद यह खुशी खत्म हो गई. इस कानून ने प्रभावी रूप से सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बेअसर कर दिया.
इस साल की शुरुआत में पूर्व केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) कर्मियों का संघ की ओर से आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिप्रिंट के पत्रकार मयंक कुमार ने मुझसे पूछा कि सरकार IPS अधिकारियों के पक्ष में क्यों दिखाई दे रही है? मैंने जवाब दिया कि, “ऐसा इसलिए है क्योंकि एक मजबूत IPS लॉबी है, जो CAPF का नेतृत्व करती है और इन बलों के मुद्दों को राजनीतिक नेतृत्व के सामने सही तरीके से नहीं रखती.”
2 सितंबर को अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान जस्टिस भुइयां ने भी मेरी बात को दोहराया. उन्होंने कहा, “….इन शब्दों का इस्तेमाल करने के लिए माफ कीजिए, वहां एक मजबूत लॉबी है…CRPF, ITBP, BSF, ये पूरी तरह दबे हुए हैं…” उन्होंने इसके अलावा भी कई बातें कहीं.
सिस्टम में मजबूत पकड़ रखने वाली IPS लॉबी अब तक CAPF अधिकारियों की उम्मीदों को रोकने में सफल रही है. किसी के मन में यह सवाल आना स्वाभाविक है कि क्या सुप्रीम कोर्ट में 29 सितंबर को हुई घटनाएं IPS लॉबी की किसी चाल का नतीजा हैं.
यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि CAPF अधिकारियों की परेशानियां आखिर कब खत्म होंगी और उन्हें उनका सही हक कब मिलेगा.
संजीव कृष्ण सूद बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (BSF) के पूर्व एडिशनल डायरेक्टर जनरल हैं. उनका एक्स हैंडल @sood_2 है. यह लेख उनके निजी विचार है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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