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Saturday, 13 July, 2024
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संसद के विशेष सत्र में आपको सुनाई जाएंगी 3 कहानियां, लेकिन तीनों झूठी होंगी

संकट के मौजूदा लम्हे को `लोकतंत्र का संकट` या फिर `लोकतंत्र पर अधिनायकवादी कब्जा` कहने की जगह `लोकतंत्र का कब्जा` का नाम देना ठीक होगा.

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वह जो सरकारी कहानी सुनाई जा रही है आइए, उस पर कुछ पलों के लिए यकीन कर लें. खुद को भरमाये रखने के लिए ही सही आइए, ये भी मान लेते हैं कि संसद का जो पांच दिन का विशेष सत्र बुलाया गया है उसमें सचमुच ही संविधान-सभा से लेकर अब तक के 75 सालों की उपलब्धियों, अनुभवों, स्मृतियों और सीख-सबक पर चर्चा की जाएगी. और, चूंकि हम ‘कथा-श्रवण’ के लिए अपने दिल को राजी कर चुके हैं तो ये भी मान लें कि हमारे सभी माननीय सांसद विद्वान हैं और समवेत रूप से सत्य के अनुसंधान में लगे हैं.

तो फिर, भारत के संसदीय लोकतंत्र की 75 सालों की यात्रा की क्या कहानी बनकर उभरती है? मेरे ख्याल से हमें संसद के विशेष सत्र में तीन अलग-अलग कहानियां सुनने को मिल सकती हैं. तीनों ही कहानियां झूठ और गुमराह करने वाली होंगी जबकि हमारी जरूरत तो खुद को कहीं ज्यादा सच्ची और सक्षम बनाने वाली कहानी सुनाने की है. आखिर, मनुष्य कथा-परोस और कथा-खोर प्राणी होता है. हम जैसी कहानियां बनाते और सुनाते हैं, हम वैसे ही होते जाते हैं. कहानियां हमारे ऊपर अतीत का असहनीय बोझ लाद सकती हैं या फिर वे हमें एक बेहतर भविष्य का उपहार दे सकती हैं.

तीन झूठी कहानियां

आइए, पहली कहानी सुनते हैं जिसमें देर आयद-दुरुस्त आयद के भाव से बताया जायेगा कि हमारे लोकतंत्र को आखिरकार इस मुकाम तक तो आना ही था. विचित्र और बेढंगी जान पड़ती यही कहानी संसद के हमारे इस विशेष सत्र की सबसे पुरजोर कहानी होने जा रही है. इसमें बताया जाएगा कि लोकतंत्र की जन्मभूमि भारत में लोकतंत्र अंग्रेजीपरस्त अभिजन के प्रदूषित पश्चिमी आचार-विचार से कुछ दशकों तक गुमराही का शिकार हुआ. यह लोकतंत्र का विदेशी और बहुत सिकुड़ा-सिमटा संस्करण था, जिसका इस्तेमाल लोगों ने अपनी आवाज और तहजीब को बुलंद करने में किया. सच्चे लोकतंत्र का नव-प्रभात तो दरअसल 2014 में हुआ जब बहुसंख्यकों को वो जगह मिली, जिसके वे लोकतंत्र में हकदार थे. भारत का आखिरकार, `भाग्यवधू` से मधुर-मिलन हुआ- देश को एक नया नाम, नया स्वप्न और संसद का नया भवन मिला.

आप ये भी मानकर चल सकते हैं कि संसद के विशेष सत्र में भारत में लोकतंत्र की इस सरकारी इतिहास-कथा की काट करते हुए दो कथाएं और सुनायी जाएंगी. प्रत्याख्यान की ऐसी पहली कथा दरअसल सरकारी इतिहास-कथा की प्रतिच्छवि होगी. उसमें बताया जाएगा कि: भारत में लोकतंत्र लगातार ऊंचाइयां चढ़ता गया और फिर आया 2014 का वक्त जब लोकतंत्र की विकास-यात्रा अचानक ही बेपटरी हो गई. इस कथा में कहा जाएगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आकस्मिक उभार और सत्तारोहण दरअसल लोकतंत्र के नाम पर एक अधिनायकवादी तख्तापलट था. भले ही इस कथा को ऐसे मुक्कामार लहजे में ना सुनाया जाता हो लेकिन ये देखकर हैरत होती है कि आखिर हमारे अभिजन `क्या से क्या हो गया` की टेक वाली इस कहानी को किस आसानी से हजम कर लेते हैं.

सरकारी लोकतंत्र-कथा का प्रत्याख्यान रचती ऐसी दूसरी कहानी आमूल-चूल परिवर्तन की चाह रखने वालों के बीच लोकप्रिय है और इस कहानी में है कि भारत में लोकतंत्र को पतन के गर्त में जाना ही था. कहानी के इस संस्करण में बताया जाएगा कि लोकतंत्र भारत में भले ही दिखावे की चीज न रहा हो फिर भी भारत में लोकतंत्र का होना बड़ी नाजुक सी उपलब्धि रही. ऐसी कहानी सुनाने वाले लोकतंत्र के अनिवार्य पतन के अलग-अलग कारण बताते हैं. कारण के रूप में कभी ये बताया जाता है कि भारत में अलोकतांत्रिक संस्कृति का चलन है तो कभी ऊंच-नीच की संस्थागत जाति-व्यवस्था को इसका कारण बताया जाता या फिर कभी भारतीय तर्ज के पूंजीवाद को. लेकिन लोकतंत्र के अनिवार्य पतन की कथा सुनाने वाले ये सभी लोग आपस में इस एक बात पर सहमत दिखते हैं कि इस बुलबुले को एक ना एक दिन फूटना ही था.

इन कहानियों के साथ दिक्कत सिर्फ ये ही नहीं कि वे झूठी हैं, बल्कि ये भी है कि ये कहानियां हमें कोई राह नहीं दिखाती. इतिहास के इस निर्णायक मोड़ पर इन कहानियों का तकाजा है कि हम बस बैठे रहें और जो मंजर सामने है उस पर खुशी में ताली बजायें या फिर निराशा में हाथ मलें.


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भारत का लोकतंत्र : एक आग का दरिया है और डूबकर जाना है

ऊपर की तीनों कहानियां भारतीय लोकतंत्र की सफलता और असफलता को समझने-समझाने में नाकाम हैं. भारतीय लोकतंत्र ने उस सिद्धांत को थोथा साबित कर दिया है जो हमें पश्चिम से विरासत में मिला था. पश्चिम से विरासत में मिला ये सिद्धांत हमें बताता था कि किसी जमीन पर लोकतंत्र के पैर जमने की कुछ पूर्व शर्तें हुआ करती हैं, जिनमें एक ये है कि लोग एक हद तक समृद्ध हों, पढ़े-लिखे हों. इस शर्त के हिसाब से तो भारत में लोकतंत्र कभी रहा ही नहीं. पश्चिम से मिली समझ के हिसाब से लोकतंत्र के लिए मुकाबले का मैदान बहुदलीय होना चाहिए और सत्ता इस मुकाबले में कभी इस दल तो कभी उस दल के हाथ आते रहनी चाहिए. अगर ऐसा है तो फिर भारतीय लोकतंत्र के उन शुरुआती दशकों को जब कांग्रेस प्रणाली का बोलबाला था, लोकतांत्रिक कहा ही नहीं जा सकता. अगर हम विरासत में हासिल इस युरोपीय समझ पर यकीन करके चलें कि किसी राष्ट्र की सांस्कृतिक सीमा-रेखा और राजनीतिक सीमा-रेखा एकमेक होनी चाहिए तो फिर गहरी विविधिताओं से भरी धरती भारत को आजादी के पहले दशक से ज्यादा वक्त तक कायम ही नहीं रहना था. अगर हम ये मानकर चलें कि लोकतंत्र के लिए संस्थाई इंतजाम चुस्त-दुरुस्त होने चाहिए तो फिर भारत को आपातकाल के धक्के से कभी उबरना ही नहीं था. और, एक बात ये भी कि जब लोकतंत्र ही भारत की बेहतरी का एकमात्र विकल्प होकर उभरा और उसे अप्रत्याशित आर्थिक वृद्धि दर का सहारा भी हासिल हो गया है तो फिर आज हमारा लोकतंत्र जिन संकटों के दौर से गुजर रहा है वैसे संकट सामने आने ही नहीं चाहिए थे.

सीधी-सरल कहानियों के जरिए ये बात समझ में नहीं आ सकती कि गंभीर चुनौतियों के बावजूद भारतीय लोकतंत्र क्यों धराशायी नहीं हुआ. भारत-चीन युद्ध के बाद 1960 के मध्यवर्ती दशकों में या फिर जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद जब लगातार अकाल पड़ा, भारतीय लोकतंत्र ढह चुका होता. आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक गतिविधियां ठप हो गई थीं, लेकिन इंदिरा गांधी का अति-आत्मविश्वास और निर्णय की चूक कहिए कि उन्होंने 1977 में चुनाव करवा दिए. 1990 के आस-पास कांग्रेस के आकस्मिक पतन के बीच मंडल और मंदिर मुद्दे की धमक भी गंभीर चुनौती का अवसर हो सकता था. इन तमाम मौकों की तुलना में 2014 का साल भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था के पतन के लिहाज से सबसे असंभावी मोड़ माना जायेगा.

`लोकतंत्र का कब्जा`का नाम देना ठीक

आइए, फिर ये मानकर चलें कि संसद के विशेष सत्र में हमें एक अलग कहानी सुनायी जाएगी. कई परतों वाली कहीं ज्यादा सच्ची इस जटिल कहानी के सहारे बताया जाएगा कि हमारे लोकतंत्र के साथ क्या घटनाएं हुईं. संकट के मौजूदा लम्हे को `लोकतंत्र का संकट` या फिर `लोकतंत्र पर अधिनायकवादी कब्जा` कहने की जगह `लोकतंत्र का कब्जा` का नाम देना ठीक होगा और ऐसा कहते हुए याद रखना होगा कि इस कब्जे में लोकतंत्र ही शिकारी और शिकार दोनों है. शिकार हुआ है शासन का वैधानिक और संविधान-सम्मत रूप यानी लोकतंत्र और शिकार करने का जो तरीका अपनाया गया, वह भी लोकतांत्रिक है (कम से कम ऐसा प्रतीत होता है) यानी एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के जरिए बहुमत हासिल करके लोकतंत्र को शिकार बनाया गया. मतलब ये कि लोकतंत्र की औपचारिक क्रियाविधियों का इस्तेमाल करके लोकतंत्र की आत्मा का विध्वंस किया गया.

इस विध्वंस को लोकतंत्र की सुचिंतित यात्रा में आकस्मिक रूप से पेश आई दुर्घटना नहीं माना जा सकता और न ही ये कह सकते हैं कि लोकतंत्र के पतन की अनिवार्य प्रक्रिया का यह अंतिम क्षण है. लोकतंत्र के कब्जे के इस मुकाम की स्थितियां को स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के इतिहास ने गढ़ा है, लेकिन हमारा आज के इस मुकाम पर पहुंचना अपरिहार्य कतई नहीं कहा जा सकता. बेशक, आज की स्थितियां किन्हीं शर्तों से निर्धारित हैं लेकिन उन्हें आकस्मिक या सांयोगिक नहीं माना जा सकता. मोदी ने वही किया जो ज्यादातर राजनेता करते हैं, यानी बड़ी मुश्किल जान पड़ते अवसर को अपने पक्ष में मोड़ना और उसे निजी विजय में बदल देना. साथ ही, ये बात भी सच है कि लोकतंत्र पर ये कब्जा भारतीय लोकतंत्र की चिनाई-बुनाई की कुछ कमजोरियों के बगैर संभव न था.

आइए, कल्पना करें कि संसद की नई इमारत में बैठे हमारे सांसदों के भीतर एक नये विवेक का स्फुरण होगा (शायद ऐसा इमारत के पूर्ण वास्तु के कारण हो!). और, हमारे सांसद कहें कि: 75 साल की हमारी यात्रा, हमारी अपनी है. इन सालों में हम यूरोपीय अनुभवों को दोहरा या जी नहीं रहे थे. और हां, प्राचीन भारत के गणतंत्रों की जो यात्रा अधूरी रह गई थी, हमारी यह यात्रा उसे फिर से शुरू करने का उद्यम भी नहीं थी. लोकतंत्र की हमारी यात्रा किसी पूर्व-निश्चित मंजिल तक पहुंचने की यात्रा नहीं थी, न ही यह यात्रा जानी-पहचानी राह पर चलने की कोई कोशिश थी कि हमें शुरुआत और आखिर का मुकाम पता हो. रहबरी के लिए हमारे साथ संविधान वर्णित कुछ मान-मूल्य थे. ये मान-मूल्य हमारी सभ्यतागत विरासत की ज्ञानराशि से बने प्रकाश-स्तंभ की तरह हैं. इस यात्रा में हम बढ़ते गये और झाड़-झंखाड़ हटाकर एक-एक कदम बढ़ाते गये, हमने इसी तरह अब तक की राह तैयार की है. राह में हम कई खतरनाक मोड़ों से बचते-बचाते गुजरे और ऐसा भी हुआ कि राह चलते हमारे ऊपर हमारा आलस हावी हो गया, जहां फिसलन कम थी हमारे पैर वहां भी रपट गये. इस यात्रा में कई मर्तबे हमने खुद को निराश किया और देश को नीचा दिखाया. हम स्वीकार करते हैं कि लोकतंत्र का कब्जा हुआ है तो इसके जिम्मेदार हम ही हैं. और, हम भारत के लोग, संकल्प लेते हैं कि संप्रभु, समाजवादी, सेक्युलर और लोकतांत्रिक भारतीय गणराज्य फिर से हासिल करके रहेंगे.

क्या आपको अविश्वसनीय लग रही ये बात? मुझे नहीं लग रही. मैंने अभी-अभी `जवान`फिल्म देखी है और सपने के भीतर छिपे सच को पढ़ना सीख रहा हूं.

(इस लेख में आये कुछ विचार मैंने अपनी किताब ‘मेकिंग सेंस ऑफ इंडियन डेमोक्रेसी’ की भूमिका से लिये हैं)

(योगेंद्र यादव जय किसान आंदोलन और स्वराज इंडिया के संस्थापकों में से एक हैं और राजनीतिक विश्लेषक हैं. उनका ट्विटर हैंडल @_YogendraYadav है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)

(संपादन: इन्द्रजीत)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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