scorecardresearch
Friday, 11 September, 2026
होममत-विमत9/11 के 25 साल बाद भी हम पूरे धर्म को दोष देने और उसका बचाव करने में ही उलझे हैं

9/11 के 25 साल बाद भी हम पूरे धर्म को दोष देने और उसका बचाव करने में ही उलझे हैं

समुदाय के अंदर मैंने जो देखा, वह निराश करने वाला था—बिना सोचे-समझे बचाव करने वाला रवैया. कोई भी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं था. कोई भी आत्ममंथन करने के लिए तैयार नहीं दिखा.

Text Size:

आज 9/11 की 25वीं बरसी है. मुझे आज भी याद है कि एक टीनेजर के तौर पर मैंने इसे टीवी पर देखा था और खबरों में हर जगह वही तस्वीरें दिखाई जा रही थीं. उस समय जिसने भी इस घटना को होते हुए देखा होगा, वह समझ सकता है कि यह कितना अवास्तविक और चौंकाने वाला लगा था—शायद उस एहसास को उन्हीं लोगों के साथ साझा करना आसान है, जो इसे याद करते हैं, बजाय इसके कि उसे शब्दों में बताया जाए.

उस समय मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि एक हमला हमारे आसपास की इतनी चीज़ों को बदल देगा—भू-राजनीति, युद्ध, अर्थव्यवस्थाएं और समाज. मुझे इस बात का तो और भी कम अंदाज़ा था कि आने वाले वर्षों में एक मुस्लिम के रूप में मेरी अपनी पहचान और दुनिया भर में मुस्लिम पहचान को जिस तरह देखा और उस पर चर्चा की जाती है, वह भी इसके साथ बदल जाएगी.

पीछे मुड़कर देखती हूं तो खुद को दो ऐसी चर्चाओं के बीच फंसा पाती हूं, जो तब से और तेज़ हो गई हैं. एक सोच मुसलमानों को सामूहिक रूप से एक खतरे के तौर पर देखती है. दूसरी सोच, जो मुस्लिम समुदाय के कुछ हिस्सों में है, कभी-कभी धर्म, कट्टरपंथ या सुधार से जुड़े मुश्किल सवालों को ऐसे हमलों के रूप में देखती है, जिन्हें बस खारिज कर देना चाहिए.

मैं इनमें से किसी के साथ भी कभी कम्फर्टेबल नहीं रही.

लेकिन दिलचस्प बात यह है कि उस समय एक भारतीय मुस्लिम के तौर पर मुझे याद नहीं कि 9/11 का असर तुरंत मेरी अपनी भारतीय मुस्लिम पहचान से जुड़ा हुआ लगा हो. खबरों में आने वाले नाम तालिबान और अल-कायदा एक दूर की राजनीतिक धुंध की तरह हमारे सामने से गुजरते थे. वे ऐसे लोग थे, जो नाम के तौर पर हमारे साथ एक धर्म साझा करते थे, लेकिन इसके अलावा बहुत कुछ साझा नहीं था. यह कहीं और हो रहा था और इसमें ऐसे लोग शामिल थे जो हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से बहुत दूर लगते थे.

एक अलग तरह का बोझ

मेरे आसपास के ज्यादातर आम मुसलमानों के लिए भू-राजनीति की बातें जल्द ही रोजमर्रा की ज्यादा ज़रूरी चिंताओं के सामने पीछे छूट गईं — काम, परिवार, जुमा की नमाज के लिए समय पर पहुंचना, बिरयानी में नमक ठीक है या नहीं और परिवार का पेट भरने के लिए रोज की जद्दोजहद.

मैं खुद को लकी मानती हूं कि मेरा जन्म और परवरिश एक डिफेंस सोसाइटी में हुए क्योंकि मेरे पिता भारतीय नौसेना में काम करते थे. यह ऐसा माहौल था जहां मेरी धार्मिक पहचान की ज्यादा अहमियत नहीं थी, लेकिन बाद में जब मैं आम नागरिकों के बीच रहने लगी, तो मुझे थोड़ा फर्क महसूस होने लगा. “आप लोग मुस्लिम नहीं लगते” जैसी बातें इतनी आम हो गईं कि मुझे याद है, एक बार मेरी बहन ने चिढ़कर जवाब दिया था, “तो मुसलमानों के सींग होते हैं क्या?”

मुझे यह भी समझ आया कि भारत में मुसलमानों को एक और मुश्किल का सामना करना पड़ता है: पाकिस्तान. इसके अलावा, समुदाय के एक बड़े हिस्से की खराब सामाजिक-आर्थिक स्थिति की वजह से कुछ खास तरह की धारणाएं भी बनी हुई थीं. ज्यादातर मामलों में, मेरा मानना था कि ऐसी धारणाएं रखने वाले लोग सिर्फ पक्षपाती थे, लेकिन इसके लिए मैं समुदाय के कुछ लोगों को भी जिम्मेदार मानती थी, क्योंकि वे इन धारणाओं को बढ़ावा देते थे.

भारत-पाकिस्तान के क्रिकेट मैचों के दौरान मैं कुछ मुसलमानों के पाकिस्तान की जीत का जश्न मनाने की शिकायतें सुनती थी. ऐसे लोग मौजूद थे, हालांकि, मुझे कभी नहीं लगा कि वे बहुसंख्यक लोगों के आसपास भी थे और बतौर युवा मेरे मन में सीधा सवाल आता था: अगर आप भारत के बजाय पाकिस्तान का समर्थन करते हैं, तो फिर भारत में क्यों रह रहे हैं, खासकर तब जब आपके लोगों के पास दूसरा देश चुनने का विकल्प था?

फिर भी, यह बोझ मुझे सिर्फ अपने लिए अलग नहीं लगता था. भारत में मुसलमान होने का मतलब एक धारणा या पहचान का बोझ उठाना था, लेकिन हमारे इतने विविध और भीड़भाड़ वाले देश में लगभग हर व्यक्ति पर जाति, क्षेत्र या बोली के आधार पर कोई न कोई पहचान चिपकी हुई थी. मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि जन्म से ही मुझे पीड़ित होने की पहचान मिली है. मुझे लगा कि मैं एक बराबर की नागरिक हूं और ऐसी दुनिया में अपनी ज़िंदगी जी रही हूं, जहां भेदभाव एक आम खरपतवार की तरह था, जो मेरे अपने समुदाय की चारदीवारी के अंदर भी उग रहा था. असली ज़िंदगी इन सभी भेदभावों के बीच की जगहों में चलती थी. हम साथ कारोबार करते थे, साथ खाना खाते थे, एक-दूसरे की खुशियां मनाने के लिए एक-दूसरे के घर जाते थे और लंबे समय तक चलने वाली दोस्तियां बनाते थे. बाकी भारत की तरह हमने भी इन मतभेदों के साथ जीना सीख लिया था. हम अपने जीवन को एक साथ रहने की खूबसूरत, लेकिन उलझी हुई सच्चाई के बीच बैलेंस करते थे.

लेकिन 9/11 के बाद के वर्षों में कुछ बदलना शुरू हुआ. मुझे याद है कि लोगों में यह समझने की दिलचस्पी और शायद चिंता बढ़ने लगी थी कि क्या इस्लाम और मुसलमान खुद किसी तरह का खतरा हैं. आतंकवाद को अब सिर्फ सुरक्षा की समस्या नहीं माना जा रहा था, जिसे सेना, खुफिया एजेंसियों या पुलिस को संभालना है. डराने वाली बात यह थी कि देखने में बिल्कुल आम लगने वाला कोई व्यक्ति अचानक ऐसे आम नागरिकों पर हमला कर सकता था, जिनके पास अपनी रक्षा करने का कोई तरीका नहीं था और जब ऐसे और हमले और घटनाएं होने लगीं, तो लोगों का यह पूछना स्वाभाविक था: यह कहां से आता है? क्या इसकी वजह राजनीतिक है, धार्मिक है, विचारधारात्मक है, या इन तीनों का कोई तालमेल है?

एक मुस्लिम के तौर पर धर्म को लेकर मेरे अपने भी बहुत से सवाल थे. बचपन से ही मेरी आदत थी कि मैं सवाल के जवाब में दूसरा सवाल पूछती थी और कभी-कभी अपने परिवार के बीच भी अपनी बात जोर से रखती थी, लेकिन मैंने इस्लाम को कभी निर्दोष लोगों के खिलाफ हिंसा से जुड़ा हुआ नहीं समझा था. इस्लामी इतिहास में जिन युद्धों के बारे में हम पढ़ते थे, वे मेरी नज़र में एक पुरानी दुनिया का हिस्सा थे, जहां राजा, राज्य और साम्राज्य अक्सर एक-दूसरे से लड़ते रहते थे. अब हम उस दुनिया में नहीं रहते. हमारे पास लोकतंत्र—जम्हूरियत—था और अपने तरीके से जीने, काम करने, नमाज पढ़ने और अपनी जीवनशैली का पालन करने की आज़ादी थी.

दोष देने और बचाव करने के बीच खींचतान

मेरे लिए, मुस्लिम होने का मतलब अपने ही मन से संघर्ष करना, सही रास्ते पर बने रहने की कोशिश करना, अपना ईमान बनाए रखना, सही काम करना और गलत काम से बचना था. यह राजनीतिक होने से पहले निजी था.

लेकिन धीरे-धीरे मुझे ऐसी टिप्पणियां, पोस्ट और लेख देखने को मिलने लगे, जिनमें खुद इस्लाम को लेकर ज्यादा कठिन सवाल पूछे जा रहे थे. ऐसे सवालों से मेरा सामना बड़े होने के दौरान बहुत कम हुआ था और पहली बार मैंने खुद को सिर्फ यह सोचते हुए नहीं पाया कि मेरे लिए इस्लाम का क्या मतलब है, बल्कि इस बात का भी सामना करना पड़ा कि दूसरे लोग इस्लाम का क्या मतलब मानने लगे थे.

मैंने सोशल मीडिया से ‘तकिया’ जैसे शब्द सीखे, जिन्हें एक मुस्लिम होने के बावजूद मैंने बड़े होते समय कभी सुना तक नहीं था. बहुत सी धारणाएं और रूढ़ियां थीं, लेकिन धीरे-धीरे उनमें से कुछ हद पार करने लगीं. अब बात यह नहीं रह गई थी कि भारतीय मुसलमानों को यह या वह समस्या है और हमें उस पर काम करना चाहिए. बात ऐसे वाक्यों तक पहुंच गई कि दुनिया भर के सभी मुसलमान ऐसे ही हैं. अच्छी बात यह थी कि ज्यादातर मैंने यह सब सोशल मीडिया पर ही देखा, लेकिन मैंने कुछ सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को भारतीय मुसलमानों को अमानवीय दिखाने और उन्हें हर किसी के लिए खतरे के तौर पर पेश करने के लिए लगभग हर मौके का इस्तेमाल करके बड़ा करियर बनाते हुए भी देखा.

लेकिन समुदाय के अंदर मैंने जो देखा, वह भी निराश करने वाला था—बिना सोचे-समझे बचाव करने वाला रवैया. कोई भी किसी चीज़ के बारे में बात करना या जिम्मेदारी लेना नहीं चाहता था. कोई भी आत्ममंथन करने के लिए तैयार नहीं दिखता था और अगर कोई ऐसे सवाल उठाता भी था, तो उसकी आवाज़ को तुरंत दबा दिया जाता था. मैं हमेशा सोचती: अगर लोगों को अपने ईमान और अपने धर्म पर इतना भरोसा है, तो हम खुलकर और ईमानदारी से बातचीत क्यों नहीं कर सकते और मुश्किल मुद्दों का सामना क्यों नहीं कर सकते?

मेरे लिए सबसे ज्यादा दुख की बात यह थी कि किसी इस्लामी आतंकी हमले के बाद कुछ मुसलमान इस बात को लेकर ज्यादा चिंतित दिखाई देते थे कि इससे इस्लाम का नाम खराब होगा, बजाय इसके कि वे उन लोगों की चिंता करें जो वास्तव में मारे गए थे. यह पहली चिंता क्यों होनी चाहिए?

कुछ पीड़ित मुसलमान थे और कुछ गैर-मुसलमान. ऐसे मुस्लिम युवा भी थे, जिन्हें इस तरह के बेहद गंभीर अपराध करने के लिए कट्टरपंथी बनाया जा रहा था. इससे उनकी अपनी ज़िंदगी और निर्दोष लोगों की ज़िंदगी बर्बाद हो रही थी और फिर लाखों आम मुसलमानों को भी इन घटनाओं का असर झेलना पड़ा. फिर भी हमारे धार्मिक और सामुदायिक नेता अक्सर या तो सिर्फ यह दोहराने में ज्यादा दिलचस्पी लेते दिखे कि “यह इस्लाम नहीं है” या तुरंत मुस्लिमों के पीड़ित होने की बात करने लगे.

मुझे नहीं लगता कि “यह इस्लाम नहीं है” कहना गलत है, लेकिन इसके बाद एक और सवाल तो होना ही चाहिए: फिर क्या हो रहा है और क्यों? अगर युवा मुसलमानों को हमारे धर्म की भाषा का इस्तेमाल करके कट्टरपंथी बनाया जा रहा है, तो क्या हमें सबसे पहले इसे समझने और इसका सामना करने के लिए तैयार नहीं होना चाहिए?

हम अब भी समुदाय के अंदर यह मानने या खुलकर इस पर चर्चा करने के लिए तैयार नहीं हैं कि इस्लाम की कई व्याख्याएं हैं और चरमपंथी संगठन भी अपने काम को सही ठहराने के लिए धार्मिक ग्रंथों और इतिहास की अपनी-अपनी व्याख्याएं तैयार करते हैं. यह लगभग विडंबना है कि एक आतंकी संगठन दूसरे आतंकी संगठन को गैर-इस्लामी मान सकता है और यहां तक कि उसके खिलाफ फतवा भी जारी कर सकता है. किसी न किसी तरह हर कोई यही मानता है कि सिर्फ उसकी अपनी व्याख्या ही सही है.

लेकिन अगर हम मानते हैं कि अलग-अलग व्याख्याएं मौजूद हैं, तो हमें एक और बात भी माननी होगी: असहमति के लिए जगह होनी चाहिए. जो व्यक्ति धर्म की ऐसी व्याख्या करता है जो आपसे अलग है, या आपकी व्याख्या को बिल्कुल नहीं मानने का फैसला करता है, उसे भी आपके जितना ही जीने का अधिकार है. इसका जवाब यह नहीं हो सकता कि असहमत लोगों को चुप करा दिया जाए, सजा दी जाए या खत्म कर दिया जाए.

मेरे लिए, समय, परिस्थितियों और उस दुनिया की असलियत को ध्यान में रखने वाली व्याख्या आगे बढ़ने के रास्ते का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें हम रहते हैं.

9/11 के 25 साल बाद भी हम उन लोगों के बीच फंसे हुए हैं, जो पूरे धर्म को दोष देना चाहते हैं और उन लोगों के बीच भी, जो मानते हैं कि धर्म का बचाव करने का मतलब है उसके नाम पर किए गए किसी भी काम को लेकर मुश्किल सवाल पूछने से इनकार करना. सामूहिक दोष को खारिज करने का मतलब आत्ममंथन को खारिज करना नहीं है. बाहर से किया गया अमानवीय व्यवहार और अंदर से किया गया इनकार, दोनों ही हमें आगे नहीं ले जाएंगे.

आमना बेगम अंसारी एक कॉलमिस्ट, राइटर और टीवी न्यूज़ पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय अमाना एंड खालिद’ नाम का एक वीकली यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: ज़ायरा वसीम ने स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रमों को ‘बेमतलब’ बताया, मुस्लिम मूल्य देशभक्ति के खिलाफ नहीं


 

share & View comments