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Saturday, 12 September, 2026
होमइंडियन लिबरल्स मैटरराज्य की आर्थिक शक्ति बढ़ती गई तो व्यक्ति की स्वतंत्रता घटेगी — ए. डी. श्रॉफ

राज्य की आर्थिक शक्ति बढ़ती गई तो व्यक्ति की स्वतंत्रता घटेगी — ए. डी. श्रॉफ

ए.डी. श्रॉफ ने 1956 में लिखा था कि सिर्फ़ मिक्स्ड इकॉनमी का कॉन्सेप्ट ही स्टेट और फ्री एंटरप्राइज के बीच ज़रूरी पावर बैलेंस देता है.

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हमारे लक्ष्य के रूप में समाजवादी समाज की घोषणा, नियोजन की गति बढ़ाने और आर्थिक शक्ति के राज्य के हाथों में लगातार केंद्रित होने के साथ, स्वतंत्र उद्यम और लोकतंत्र के संबंध का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है. कुछ समय पहले प्रधानमंत्री ने कलकत्ता में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि लोकतंत्र को निजी उद्यम के बराबर मानना उचित नहीं है. उनके बारे में यह भी कहा गया कि अंततः लोकतंत्र और निर्बाध निजी उद्यम एक-दूसरे के अनुकूल नहीं हैं. इसके विपरीत, देश में एक बड़ा वर्ग मानता है कि कल्याणकारी राज्य के नाम पर राज्य पूंजीवाद की ओर बढ़ता वर्तमान रुझान मनुष्य को उतना ही राज्य का गुलाम बना सकता है, जितना कोई सर्वसत्तावादी राज्य. उनका तर्क है कि लोकतंत्र, स्वतंत्र उद्यम का राजनीतिक आधार है और स्वतंत्र उद्यम में हर कमी के साथ लोकतंत्र भी अपने अंत की ओर बढ़ता है.

यह महज इतिहास का संयोग नहीं है कि लोकतंत्र स्वतंत्र उद्यम की व्यवस्था के साथ-साथ विकसित और मजबूत हुआ है. दुर्भाग्य से, मार्क्सवाद की उस विचारधारा ने, जो साधनों और लक्ष्यों को एक ही मानती है, इन मुद्दों को उलझा दिया है. कल का विधर्म आज की रूढ़ि बन गया है. इसलिए स्वतंत्र उद्यम और लोकतंत्र के प्रश्न को उनके वास्तविक संदर्भ में नए सिरे से समझना आवश्यक है.

किसी भी आर्थिक इतिहास के विद्यार्थी के लिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि आज हमारे देश में और अन्य देशों में स्वतंत्र उद्यम की वकालत पुराने पड़ चुके ‘लेसे-फेयर’ यानी पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता के सिद्धांत के आधार पर नहीं की जाती. इसलिए आज के समय में ‘बेलगाम निजी उद्यम’ की बात करना मुद्दे को उलझाना और उसके आवश्यक ऐतिहासिक संदर्भ को नजरअंदाज करना है. लेसे-फेयर अब बीते युग की बात है. लोकतांत्रिक आदर्शों की गतिशील शक्ति की यह बड़ी उपलब्धि है कि उसने सामाजिक न्याय और समानता के प्रति एक नई चेतना पैदा की है. राज्य की गतिविधियों का क्षेत्र काफी बढ़ गया है. आर्थिक क्षेत्र में आज राज्य के पास बहुत अधिक शक्ति है. वह कच्चे माल की आपूर्ति से लेकर उत्पादन की मात्रा तक की प्रक्रियाओं को नियंत्रित और विनियमित कर सकता है. आयात-निर्यात संबंधी नियमों के माध्यम से वह देश के आंतरिक और बाहरी व्यापार को काफी हद तक प्रभावित करता है. कर व्यवस्था के शक्तिशाली साधन से वह ऐसी मौद्रिक और राजकोषीय नीतियां अपनाता है, जिनसे वितरित होने वाले मुनाफे को कम किया जा सकता है और लाभांश की सीमा तय की जा सकती है.

श्रम संबंधी व्यापक कानून नियोक्ताओं और कर्मचारियों के संबंधों को नियंत्रित करते हैं और श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करते हैं. इसके अलावा, आधुनिक राज्य जब बुनियादी और रणनीतिक उद्योगों तथा कुछ आवश्यक सेवाओं के क्षेत्र में प्रवेश करता है, तो उसके पास इतनी व्यापक शक्ति आ जाती है कि वह समाज के स्वतंत्र उद्यम वाले क्षेत्र के सामने एक संतुलन कायम कर सकता है.

इस तरह एक मिश्रित अर्थव्यवस्था विकसित हुई है, जिसमें स्वतंत्र उद्यम और राज्य उद्यम दोनों की अपनी महत्वपूर्ण और स्वायत्त भूमिकाएं हैं. वे एक-दूसरे के साथ काम करते हुए लोगों की जरूरतों को पूरा करते हैं. इस व्यवस्था में भी स्वामित्व का अधिकार अनेक तरीकों से सीमित और नियंत्रित है. इसलिए उत्पादन के साधनों का स्वामित्व अब किसी को पूर्ण शक्ति नहीं देता.

इसी पृष्ठभूमि में सामाजिक रूप से नियंत्रित स्वतंत्र उद्यम और लोकतंत्र के आपसी संबंध को समझना चाहिए.

आधुनिक दुनिया में दोनों दृष्टिकोण असफल सिद्ध हुए हैं. साम्यवादी देशों में मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांतों का पालन करते हुए सारी आर्थिक शक्ति राज्य को सौंप दी गई है. परिणाम यह हुआ कि ‘स्वतंत्र और समान लोगों के समाज’ के बजाय हमें सर्वसत्तावादी तानाशाही देखने को मिली.

लोकतांत्रिक देशों, जैसे ब्रिटेन, में भी सामूहिक स्वामित्व का प्रयोग लोगों में कोई विशेष विश्वास पैदा नहीं कर सका. केवल स्वामित्व बदल देने से यह सुनिश्चित नहीं होता कि कोई उद्योग समाजवादी ढंग से चलाया जाएगा. इसके विपरीत, इससे राजनीतिक हाथों में आर्थिक शक्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण और बढ़ती नौकरशाही के कारण नई समस्याएं पैदा हुई हैं. व्यवहार में इन दोनों ने लोकतंत्र पर गंभीर प्रतिबंध लगाए हैं.

ऐसी अर्थव्यवस्था, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र लगातार अपने काम का दायरा बढ़ाता जाता है, स्वाभाविक रूप से नियंत्रण और नियमों की एक पूरी व्यवस्था को जन्म देती है. इसके साथ-साथ लोगों को एक निश्चित ढर्रे में चलाने की प्रक्रिया भी तेज होती जाती है.

नई स्वार्थी शक्तियां और हित-समूह पैदा होते हैं, जो इस व्यवस्था को बनाए रखने और उसका विस्तार करने में अपना हित देखते हैं. समय के साथ यह व्यवस्था सत्तारूढ़ दल और नौकरशाही में असहिष्णुता पैदा करती है. सरकार और योजनाकारों द्वारा लिए गए निर्णयों को राष्ट्रीय निर्णय मान लिया जाता है और अल्पमत की असहमति, चाहे वह कितनी भी उचित क्यों न हो, संदेह की नजर से देखी जाने लगती है. ईमानदार आलोचना को भी ‘अवफादारी’ या ‘देश-विरोधी गतिविधि’ कहा जा सकता है. स्वतंत्रता का यह निषेध लोकतंत्र का पूर्ण निषेध है.

ऐसे खतरे का उपाय क्या है? ऊपर बताए गए मिश्रित अर्थव्यवस्था के विचार में ही राज्य और स्वतंत्र उद्यम के बीच तथा स्वतंत्र उद्यम के भीतर मौजूद विभिन्न शक्तियों के बीच आवश्यक संतुलन बनाने की क्षमता है.

यह आवश्यक है कि राज्य और स्वतंत्र उद्यम अर्थव्यवस्था में एक साथ काम करें और साझा उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक-दूसरे के बीच संतुलन बनाए रखें. साथ ही, स्वतंत्र उद्यम को काम करने की पूरी गुंजाइश दी जानी चाहिए, ताकि वह नए रास्ते तलाश सके और आत्म-अभिव्यक्ति तथा सेवा के लगातार बढ़ते अवसर पैदा कर सके.

लोकतांत्रिक राज्य द्वारा बनाए गए व्यापक नियमों के भीतर स्वतंत्र उद्यम विभिन्न शक्तियों के बीच आवश्यक संतुलन प्रदान करता है. एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था में उत्पादक, श्रमिक, उपभोक्ता और निवेशक मिलकर नियंत्रण और संतुलन की ऐसी व्यवस्था बनाते हैं, जिससे अर्थव्यवस्था सुचारु रूप से चलती है.

विक्रेताओं की शक्ति का मुकाबला खरीदारों की शक्ति करती है, ऋणदाताओं की शक्ति का मुकाबला ऋण लेने वालों की शक्ति करती है और नियोक्ताओं की शक्ति का मुकाबला ट्रेड यूनियनों की शक्ति करती है. कोई भी एक पक्ष लंबे समय तक किसी स्थिति पर हावी नहीं हो सकता, जब तक कि ऐसा समझौता न हो जाए जो सभी संबंधित पक्षों के हितों की रक्षा करे.

मुक्त बाजार की अर्थव्यवस्था राजनीतिक लोकतंत्र के बहुत करीब है. मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था जनता की इच्छा के आधार पर शासन का सबसे पूर्ण उदाहरण है. राजनीतिक लोकतंत्र में लोग समय-समय पर कुछ उम्मीदवारों या मुद्दों के पक्ष या विपक्ष में मतदान करते हैं. लेकिन मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था में वे हजारों वस्तुओं और सेवाओं के पक्ष या विपक्ष में लगातार मतदान करते हैं.

उनका यह मतदान केवल हां या ना में नहीं होता, बल्कि उनकी पसंद की छोटी-छोटी भिन्नताओं को भी व्यक्त करता है. ये पसंद केवल रोज नहीं, बल्कि हर घंटे बदल सकती हैं.

यह सही है कि कभी-कभी एकाधिकार और कार्टेल जैसी स्थितियां इस व्यवस्था के कामकाज को बिगाड़ देती हैं. वास्तव में, स्वतंत्र उद्यम और लाभ कमाने से जुड़ी जिन कई बुराइयों की चर्चा की जाती है, उनका बड़ा कारण एकाधिकार और उससे पैदा होने वाली संपत्ति तथा आय की भारी असमानता है.

मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था का समर्थन करने वाले, जैसे हाल ही में स्थापित फोरम ऑफ फ्री एंटरप्राइज, ने एकाधिकार के प्रश्न पर अपनी स्थिति बिल्कुल स्पष्ट कर दी है. उसके घोषणापत्र में कहा गया है कि किसी भी प्रकार का एकाधिकार, चाहे वह राज्य का हो या निजी क्षेत्र का, उचित नहीं है. यदि कोई एक संस्था सब कुछ अपने हाथ में लेने का अधिकार अपने लिए मान ले, तो इससे स्वतंत्र और लोकतांत्रिक सामाजिक व्यवस्था का नाजुक संतुलन बिगड़ जाएगा.

राज्य क्षेत्र में विकसित हो रही इस अस्वस्थ प्रवृत्ति के विपरीत, संयुक्त पूंजी वाली कंपनियों का विकास लोगों के सहयोगात्मक प्रयास का वास्तविक उदाहरण है. आधुनिक उद्योगों के विशाल आकार को देखते हुए कोई एक व्यक्ति या कंपनी अकेले इतने संसाधन जुटाकर ऐसा उद्योग शुरू नहीं कर सकती.

जब तक ऐसे उद्यमी अपनी साख और अपने काम के रिकॉर्ड के आधार पर सैकड़ों और हजारों छोटे निवेशकों की बचत को स्वतंत्र और स्वैच्छिक तरीके से एकत्र नहीं कर सकते, तब तक औद्योगिक प्रगति संभव नहीं होगी. उद्योग में निवेश करने वाला व्यक्ति समाज के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है और श्रमिक की तरह वह भी लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण तत्व है.

इसके अलावा, जिसे निजी क्षेत्र कहा जाता है, वह न तो छोटा है और न ही वास्तव में निजी. जैसा कि योजना आयोग ने सही रूप से बताया है, इसमें ‘पूरे देश में फैले लाखों छोटे उत्पादक’ शामिल हैं. यही छोटे लोग स्वयं उद्यमी, निवेशक, प्रबंधक, तकनीकी विशेषज्ञ, विक्रेता और मालिक की भूमिकाएं निभाते हैं.

इनके साथ लाखों छोटे दुकानदार, व्यापारी, कारीगर, शिल्पकार, कुशल श्रमिक और छोटे किसान भी आते हैं. ये सभी स्वतंत्र उद्यम की व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा और हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ हैं. इसी अर्थ में स्वतंत्र उद्यम और लोकतंत्र एक-दूसरे पर निर्भर हैं.

यदि लोकतंत्र का सार यह है कि अंतिम राजनीतिक संप्रभुता जनता के हाथों में हो, तो आर्थिक शक्ति भी व्यापक रूप से जनता के हाथों में होनी चाहिए. सार्वजनिक क्षेत्र को इस तरह लगातार बढ़ाना कि वह पूरी अर्थव्यवस्था पर हावी हो जाए, व्यक्तियों और समूहों की स्वतंत्रता और स्वायत्तता को कमजोर करेगा. और ये दोनों लोकतंत्र के पूर्ण और स्वतंत्र विकास के लिए आवश्यक हैं.

ऐसी अर्थव्यवस्था में, जो अपने बड़ी संख्या में नागरिकों को राज्य निगमों का कर्मचारी या उसके व्यापारिक निगमों का एजेंट बना देती है, व्यक्ति अपने आर्थिक अस्तित्व को खतरे में डाले बिना अपनी राजनीतिक राय व्यक्त नहीं कर सकता.

चाहे वह सहकारी खेती करने वाला किसान हो, राज्य के स्वामित्व वाले उद्योग की ट्रेड यूनियन से जुड़ा श्रमिक हो या राज्य द्वारा संचालित सेवा का कर्मचारी, उसे अंततः अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता खोनी पड़ेगी.

आज उन सभी लोगों के लिए समय आ गया है जो लोकतंत्र की बात करते हैं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व को स्वीकार करते हैं कि वे स्वतंत्र उद्यम को लोकतांत्रिक जीवन-व्यवस्था के लिए आवश्यक मानें.

स्वतंत्र उद्यम को कानूनों और प्रशासनिक प्रतिबंधों के ऐसे पूरे जाल में नहीं फंसाया जा सकता, जो उसके अस्तित्व को ही खत्म कर दे. यह सुनिश्चित करना उनका कर्तव्य है कि स्वतंत्रता वास्तव में बनी रहे और उसे पूरी तरह समाप्त न कर दिया जाए.

स्वतंत्र उद्यम को केवल राजनीतिक मजबूरी के कारण सहन नहीं किया जाना चाहिए, मानो वह किसी की कृपा पर जीवित हो और उसके सिर पर हमेशा खतरे की तलवार लटकती रहे. लोकतांत्रिक नियोजन में उसकी एक वैध और महत्वपूर्ण भूमिका है.

यदि इतिहास के अनुभव का कोई अर्थ है, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि जिस नए भारत का हम निर्माण कर रहे हैं, उसकी शक्ति लोकतंत्र और स्वतंत्रता की मजबूत नींव से आए, न कि कुछ लोगों के हाथों में नियंत्रण और शक्ति के केंद्रीकरण तथा लोगों को एक ही ढर्रे में चलाने वाली व्यवस्था से.

यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. यह लेख ‘फोरम ऑफ फ्री एंटरप्राइज़’ से लिया गया है, जो फरवरी 1956 में प्रकाशित हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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