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Saturday, 4 July, 2026
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लोकतंत्र, मौलिक अधिकार और संविधान: क्यों नागरिकों की आज़ादी पर कोई समझौता नहीं हो सकता: एन.ए. पालखीवाला

राजनीतिक स्वतंत्रता, मौलिक अधिकार, संपत्ति के अधिकार और संविधान की सर्वोच्चता पर आधारित यह लेख बताता है कि लोकतंत्र की असली ताकत सरकार नहीं, बल्कि संविधान द्वारा नागरिकों को दी गई सुरक्षा और न्यायपालिका की स्वतंत्रता है.

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भारत ने अपने संपूर्ण इतिहास में वास्तविक लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का अनुभव केवल पिछले 23 साल में ही किया है. अगर राजनीतिक विकास के संबंध में प्लेटो का सिद्धांत सही है, तो यह नवप्राप्त स्वतंत्रता तभी सुरक्षित रह सकती है जब इसकी निरंतर और सजग रक्षा की जाए; अन्यथा इसका स्थान तानाशाही ले सकती है. किसी ऐसे नवोदित गणराज्य में, जहां स्वतंत्रता लोगों के स्वभाव और संस्कारों का स्वाभाविक हिस्सा न बनी हो, वहां तानाशाही का खतरा उन लोकतंत्रों की तुलना में कहीं अधिक होता है जिनकी लोकतांत्रिक परंपरा सदियों पुरानी है.

राजनीतिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकार भारतीय संविधान की आधारशिला हैं. हमारा संविधान मूलतः सामान्य नागरिक को केंद्र में रखकर बनाया और गढ़ा गया है. इससे असंतुष्ट केवल वही लोग हो सकते हैं जो उन जड़ और अप्रासंगिक विचारधाराओं में विश्वास रखते हैं, जिनका परिणाम समाज को ऊपर उठाना नहीं, बल्कि सबको समान रूप से नीचे गिरा देना होता है.

भारतीय संविधान संपत्ति के न्यायपूर्ण वितरण में विश्वास रखता है. इसी कारण वह केवल संपत्ति के सृजन की अनुमति ही नहीं देता, बल्कि दूरदर्शी, साहसी और जोखिम उठाने वाले उद्यमी नागरिकों को प्रोत्साहित भी करता है कि वे अपनी प्रतिभा और क्षमता से राष्ट्र के विकास में योगदान दें. यही कारण है कि संविधान प्रत्येक नागरिक को संपत्ति अर्जित करने, उसका स्वामित्व रखने, उसका विनियोजन करने तथा अपनी पसंद का कोई भी व्यापार, व्यवसाय या पेशा अपनाने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है.

हमारे संविधान का मूल उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसकी गरिमा की रक्षा करना है. यह सुनिश्चित करना है कि मनुष्य के बुनियादी अधिकार राज्य की मनमानी या सत्ता में बैठे उन क्षणिक राजनीतिज्ञों की पहुंच से बाहर रहें, जिनकी अपरिपक्व और निरर्थक राजनीतिक बयानबाज़ी को अक्सर जनभावनाओं को भड़काने वाले खोखले नारों का आवरण पहनाकर प्रस्तुत किया जाता है.

आज जब विश्वभर में सरकारों की शक्तियां लगातार बढ़ती जा रही हैं, तब किसी भी लोकतंत्र के लिए यह अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि उसके नागरिकों के कुछ ऐसे मौलिक अधिकार हों जिन्हें सरकार न तो सीमित कर सके और न ही समाप्त कर सके.

न्यायमूर्ति फ्रैंकफर्टर के शब्दों में, मनुष्य का स्वभाव ऐसा है कि उसे दूसरों के अधिकार छीन लेने की असीमित शक्ति सौंपना कभी सुरक्षित नहीं हो सकता. सार्वजनिक जीवन में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिस पर इतना भरोसा किया जा सके कि उसे दूसरों पर असीमित अधिकार दे दिए जाएं. नागरिकों की सुरक्षा इस बात पर निर्भर नहीं करती कि शासक कितने उदार या संयमी होंगे; बल्कि इस पर निर्भर करती है कि उनकी शक्तियों पर संविधान द्वारा कितनी प्रभावी सीमाएं लगाई गई हैं. कम-से-कम हमारे संविधान की मूल भावना इसी विश्वास पर आधारित है.

भारत अनेक मतों, विचारधाराओं, धर्मों, भाषाओं और सांस्कृतिक विविधताओं का देश है. ऐसे देश में कुछ ऐसे मौलिक अधिकारों का होना, जिन्हें किसी भी परिस्थिति में छीना न जा सके, केवल उपयोगी ही नहीं बल्कि अनिवार्य है. इन्हीं अधिकारों को उचित ही संविधान की “अंतरात्मा” और “आत्मा” कहा गया है. व्यावहारिक दृष्टि से यही अधिकार संविधान को स्थिरता प्रदान करते हैं, उसे दृढ़ आधार देते हैं और उसे क्षणिक राजनीतिक परिवर्तनों से ऊपर उठाकर स्थायित्व का स्वरूप प्रदान करते हैं. भारत के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा समय रहा हो जब संविधान में संशोधन कर संसद को मौलिक अधिकारों को सीमित अथवा समाप्त करने की शक्ति देना आज जितना अनुचित और घातक होता. ऐसे समय में, जब देश के विभिन्न राज्यों में असुरक्षा की भावना बढ़ रही है और क्षेत्रीय, भाषाई, सांप्रदायिक तथा आर्थिक कट्टरताएँ निरंतर बलवती होती जा रही हैं, तब संसद को इन मौलिक अधिकारों से मनमाने ढंग से छेड़छाड़ करने का अधिकार देना केवल एक भूल नहीं, बल्कि उन मूलभूत स्वतंत्रताओं के साथ विश्वासघात होगा जिन पर हमारा लोकतंत्र टिका है.

समाजवादी लोकतंत्र में संपत्ति के अधिकार का प्रायः उपहास उड़ाया जाता है और उसे “सबसे कम न्यायोचित ठहराए जा सकने वाला अधिकार” कहा जाता है. किंतु यदि इस विषय पर थोड़ी गंभीरता से विचार किया जाए, तो स्पष्ट हो जाएगा कि किसी स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था और आर्थिक प्रगति की आकांक्षा रखने वाले राष्ट्र के लिए यह अधिकार अत्यंत आवश्यक है.

संपत्ति के मौलिक अधिकार को समाप्त करने का कोई भी प्रयास इसलिए भी अनुचित होगा क्योंकि वह मानव-स्वभाव के उन शाश्वत नियमों के विरुद्ध जाएगा जिन्हें बदला नहीं जा सकता. मैकियावेली ने कहा था कि मनुष्य अपने संबंधियों की मृत्यु को शायद क्षमा कर दे, पर अपनी संपत्ति की जब्ती को नहीं. यह मानव-स्वभाव का एक दुखद सत्य है कि सामान्यतः व्यक्ति अपने और अपने परिवार के लिए जिस समर्पण और परिश्रम से कार्य करता है, वैसा वह किसी और के लिए नहीं करता. जब तक मानव-स्वभाव का यह मूल गुण परिवर्तित नहीं हो जाता, तब तक संपत्ति के अधिकार का उन्मूलन विनाश के अतिरिक्त और कोई परिणाम नहीं ला सकता.

विश्व में ऐसा कोई भी लोकतांत्रिक देश नहीं है जहां कानून और संवैधानिक परंपराओं के स्तर पर संपत्ति के अधिकार का सम्मान न किया जाता हो. जहाँ कहीं विधि का शासन स्थापित है, वहां संपत्ति के अधिकार को संविधान द्वारा संरक्षित किया गया है. चाहे वह मैग्ना कार्टा हो, अमेरिका की स्वतंत्रता की घोषणा, फ्रांस की मानवाधिकार घोषणा हो अथवा जर्मनी का संविधान सभी ने इस अधिकार को मान्यता दी है. यहां तक कि सोवियत संघ जैसे साम्यवादी देशों में भी व्यक्ति के अपने श्रम से अर्जित निजी संपत्ति तथा उसे अपनी संतानों को उत्तराधिकार में देने के अधिकार को स्वीकार किया गया है.

हमारे संविधान में संपत्ति का अधिकार न तो निरंकुश है और न ही असीमित. यह लचीला और व्यावहारिक अधिकार है. संसद और विधानसभाओं को जनहित में इस पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाने का पूरा अधिकार प्राप्त है. जमींदारी उन्मूलन, भूमि सुधार तथा कृषि संबंधी कानूनों के विरुद्ध इस अधिकार का सहारा लिया ही नहीं जा सकता. संसद और विभिन्न राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित चौंसठ ऐसे अधिनियमों को संविधान ने वैध घोषित किया है, भले ही वे प्रत्यक्ष रूप से संपत्ति के अधिकार को प्रभावित करते हों. इतना ही नहीं, सरकार द्वारा दिए जाने वाले मुआवज़े की पर्याप्तता को भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती. वस्तुतः स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है, विश्व के किसी भी स्वतंत्र लोकतंत्र में संपत्ति का अधिकार शायद ही इतना सीमित और संकुचित हो जितना भारत में है. इसलिए इस अधिकार को और अधिक कमज़ोर करने की कोई आवश्यकता नहीं है.

जिन देशों में स्वतंत्रता लोगों के जीवन का स्वाभाविक संस्कार बन चुकी है, वहां शायद संपत्ति के संवैधानिक अधिकार के बिना भी काम चल सकता है. किंतु भारत जैसे देश में, जहां आर्थिक कट्टरता धीरे-धीरे राजनीतिक जीवन का अभिन्न अंग बनती जा रही है, वहां संपत्ति के अधिकार को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है.

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि संपत्ति का अधिकार अन्य सभी मौलिक अधिकारों का मौन संरक्षक है. अगर किसी समाचार-पत्र की संपत्ति बिना उचित मुआवज़े के सरकार द्वारा छीन ली जाए, तो उसके लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार कितना अर्थपूर्ण रह जाएगा? यदि किसी धार्मिक अल्पसंख्यक संस्था या किसी संगठन की संपत्ति सत्ता में बैठी सरकार की कृपा पर निर्भर हो जाए, तो संगठन बनाने या अपने धर्म का पालन करने के अधिकार का वास्तविक मूल्य ही क्या रह जाएगा?

चालाक और अवसरवादी राजनीतिज्ञों ने वर्षों से यह भ्रम फैलाया है कि देश की आर्थिक प्रगति और गरीबों के उत्थान के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा हमारा संविधान है. यह जनता के साथ किया गया सबसे बड़ा छल है.

वास्तविकता यह है कि देश की आर्थिक दुर्दशा, करोड़ों बेरोज़गारों की पीड़ा तथा उन असंख्य लोगों की बदहाली—जो रोजगार में होने के बावजूद रुपये के लगातार अवमूल्यन के कारण न्यूनतम जीवन-स्तर से भी नीचे जीवन बिताने को विवश हैं—इन सबके लिए संविधान नहीं, बल्कि केंद्र और अनेक राज्य सरकारों की जड़, अव्यावहारिक और विनाशकारी आर्थिक नीतियां उत्तरदायी हैं.

सच्चाई यह है कि जनकल्याण अथवा सामाजिक विकास की ऐसी एक भी ठोस और विवेकपूर्ण आर्थिक नीति नहीं है, जिसे संविधान का कोई प्रावधान लागू होने से रोकता हो या जिसके मार्ग में संविधान किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न करता हो.

प्रिवी पर्स मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का महत्व केवल पूर्व रियासतों के शासकों तक सीमित नहीं था; उसका वास्तविक महत्व भारत के सामान्य नागरिक के लिए कहीं अधिक था. इस मुकदमे का मूल प्रश्न न तो विशेषाधिकारों का था, न प्रिवी पर्स का, न सलामी की तोपों का और न ही उस मुद्रा का जिसकी कीमत स्वयं सरकार की नीतियों के कारण लगातार घटती जा रही थी. इस विवाद का वास्तविक केंद्र संविधान की पवित्रता और सार्वजनिक नैतिकता था. प्रश्न यह था कि क्या राजनीतिक सुविधा के लिए संविधान की आवाज़ को दबाया जा सकता है? क्या सत्ता के तात्कालिक लाभ के लिए उसके स्पष्ट आदेशों की बलि चढ़ाई जा सकती है? यदि कार्यपालिका केवल अपने निर्णय से प्रिवी पर्स की संवैधानिक गारंटी को निरस्त कर सकती है, तो फिर भारतीय सरकार द्वारा जारी प्रतिभूतियों से अधिक असुरक्षित निवेश संसार में कोई नहीं होगा.

देशभर में विधवाओं और अनाथों के लिए स्थापित अनेक धर्मार्थ न्यासों की पूंजी, लाखों कर्मचारियों के भविष्य निधि की राशि तथा असंख्य संस्थाओं की जमा पूंजी इन्हीं सरकारी प्रतिभूतियों में निवेशित है. यदि सरकार प्रिवी पर्स देने के अपने संवैधानिक दायित्व से मुकर सकती है, तो वही तर्क अपनाकर वह सरकारी प्रतिभूतियों पर मूलधन और ब्याज चुकाने के अपने दायित्व से भी मुकर सकती है. इसका कारण यह है कि संविधान ने इन दोनों दायित्वों की गारंटी देने के लिए लगभग समान शब्दों का प्रयोग किया है. अतः इस मुकदमे में दांव पर केवल कुछ पूर्व शासकों का आर्थिक हित नहीं था; दाँव पर था—राष्ट्र का सम्मान, उसकी संवैधानिक विश्वसनीयता और विश्व समुदाय की दृष्टि में उसकी वित्तीय ईमानदारी.

सामान्य नागरिक के दृष्टिकोण से इस निर्णय के महत्व को सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के निम्नलिखित अंशों से भली-भांति समझा जा सकता है—

“यदि संविधान के किसी भी प्रावधान का उल्लंघन, चाहे वह किसी लोकप्रिय उद्देश्य की पूर्ति के नाम पर ही क्यों न किया जाए, स्वीकार कर लिया जाए, तो वह अत्यंत खतरनाक उदाहरण सिद्ध होगा. संविधान के प्रति अनादर एक उदाहरण से दूसरे उदाहरण तक फैलता चला जाएगा और अंततः पूरा संविधान उपहास और तिरस्कार का विषय बन जाएगा. वाइमर संविधान के साथ ठीक यही हुआ था. इन मामलों में निर्णय के लिए जो मूल प्रश्न उपस्थित हुआ है, उसका महत्व प्रथम दृष्टि में दिखाई देने वाली सीमा से कहीं अधिक व्यापक है. यह प्रश्न कि क्या राष्ट्रपति पूर्व शासकों की मान्यता समाप्त कर सकते हैं, वास्तव में गौण है. भविष्य के हमारे लोकतंत्र के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या इस देश की कार्यपालिका संविधान के स्पष्ट आदेशों की अवहेलना कर सकती है और अपनी इच्छा से संसद द्वारा बनाए गए कानूनों को निष्प्रभावी बना सकती है. यदि यह स्वीकार कर लिया जाए कि उसे ऐसा करने का अधिकार है, तो हमें यह मानने का अपना अब तक का विश्वास त्यागना होगा कि इस देश में शासन कानूनों का है, व्यक्तियों का नहीं. तब यह मान्यता ही गलत सिद्ध होगी कि भारत एक विधि-शासित लोकतंत्र है.” — न्यायमूर्ति हेगड़े

इन निर्णयों ने केवल एक संवैधानिक विवाद का समाधान नहीं किया; उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि लोकतंत्र की वास्तविक रक्षा किसी व्यक्ति, किसी पद अथवा किसी सरकार की सद्भावना से नहीं होती. उसकी रक्षा केवल संविधान की सर्वोच्चता, विधि के शासन और न्यायपालिका की स्वतंत्रता से होती है. जब भी सत्ता इन सीमाओं को लांघने का प्रयास करती है, तब न्यायालय केवल किसी व्यक्ति के अधिकारों की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की लोकतांत्रिक आत्मा की रक्षा करते हैं.

यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “फ्रीडम फर्स्ट” पुस्तिका से लिया गया है जिसका शीर्षक “संविधान और आम आदमी” था और इसका प्रकाशन मूलरुप से फरवरी 1971 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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