(कुणाल दत्त)
पटना, 18 अप्रैल (भाषा) स्थापत्य कला के संरक्षण से जुड़े 26 वर्षीय वास्तुकार दीप्तांशु सिन्हा के लिए पटना के डच और ब्रिटिश कालीन कलेक्ट्रेट परिसर को गिराना उन थोड़ी बहुत उम्मीदों के भी ध्वस्त होने जैसे था जो उन्हें ऐतिहासिक शहर की “खत्म होती विरासत” के पुनरुद्धार को लेकर थी।
इस घटना से वह इतने व्यथित हुए कि उन्होंने विरासती ढांचों के संरक्षण का काम कर रहे गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) में अपनी नौकरी छोड़ दी और गुरुग्राम आ गए।
सिन्हा ने कहा, “एक वक्त के बाद हर कोई उम्मीद छोड़ देता है। मैं समाहरणालय (कलेक्ट्रेट) की इमारत को ढहाए जाने को सहन नहीं कर सका, जो 2010 में विध्वंस की लहर से पहले हुआ था। परिसर में ढहाया जाने वाला अंतिम ढांचा इसका प्रसिद्ध डचकालीन रिकॉर्ड रूम के सामने का हिस्सा था। इसमें शानदार स्तंभ थे और इसकी चौड़ी दीवारों के भीतर पटना के शहरी विकास का सदियों का इतिहास सिमटा था।”
जिला प्रशासन का मुख्यालय पटना समाहरणालय कई इमारतों के समूह से बना था जिनमें 17वीं शताब्दी का रिकॉर्ड रूम और पुराना ‘डिस्ट्रिक इंजीनियर्स ऑफिस’ डच कालीन हैं जबकि डीएम कार्यालय भवन और 1938 की ‘डिस्ट्रिक बोर्ड पटना बिल्डिंग’ ब्रिटिश काल की हैं।
उनके अनुसार, सदियों पुराने कलेक्ट्रेट भवन को “संवेदनशीलता के साथ संभाले जाने की जरूरत थी” लेकिन इसके बदले उसे “बुलडोजर ” के हवाले कर दिया गया।
सिन्हा ने दावा किया कि नया मॉल खुलने से पटना उत्साहित है। उन्होंने कहा कि विरासत उसके एजेंडे में नहीं है और विश्व विरासत दिवस तो उनके लिए जैसे सोच के दायरे में ही नहीं है।
सांस्कृतिक विरासत की विविधता और इसकी रक्षा और संरक्षण के लिए आवश्यक प्रयासों के बारे में लोगों की जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल 18 अप्रैल को विश्व विरासत दिवस मनाया जाता है।
सिन्हा नागरिकों के नेतृत्व में हुए आंदोलन ‘ऐतिहासिक पटना कलेक्ट्रेट बचाओ’ का हिस्सा थे। इस मुहिम के तहत छह साल तक इस विरासत इमारत को बचाने के लिये संघर्ष किया गया। ऑस्कर विजेता फिल्म ‘गांधी’ में भी यह इमारत नजर आई थी।
उच्चतम न्यायालय ने पिछले साल 13 मई को इस इमारत के संरक्षण संबंधी आईएनटीएसीएच की याचिका को खारिज कर दिया था और अगले दिन इस इमारत को तोड़ने की कार्रवाई शुरू हो गई। 12 एकड़ के पटना समाहरणालय परिसर में इमारतों के समूह को चरणों में गिराया गया था। विध्वंस की आखिरी कार्रवाई दिसंबर के अंत में हुई थी।
इससे पहले स्मार्ट सिटी का मार्ग प्रशस्त करने के लिए 2019 में एक सदी से अधिक पुराने गोल मार्केट को ध्वस्त कर दिया गया था, 1885 में निर्मित अंजुमन इस्लामिया हॉल को 2018 में, बांकीपुर सेंट्रल जेल को 2010 में ढहा दिया गया था। इसके अलावा बीते 13 सालों में कई विरासत इमारतों को गिराया गया जिनमें सिटी एसपी बंगला, सिविल सर्जन का बंगला, जिला एवं सत्र न्यायाधीश बंगला, नई पुलिस लाइन बिल्डिंग व अन्य इमारतें शामिल हैं।
कई इतिहासकारों और वास्तुकारों ने पुनर्विकास परियोजना के लिए चरणबद्ध तरीके से ऐतिहासिक पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल भवन को गिराये जाने की आलोचना की है। 100 साल पुराने सुल्तान पैलेस पर भी पिछले साल जून से ही विध्वंस का खतरा मंडरा रहा है।
पटना कॉलेज के छात्र अमन लाल (19) कहते हैं, “वे लोगों को नई परियोजनाएं देना चाहते हैं। इसमें कुछ भी गलत नहीं है लेकिन यह हमारी विरासत की कीमत पर हो रहा है। हाल ही में, पीएमसीएच के ऐतिहासिक कैंसर ब्लॉक के एक बड़े हिस्से को पटना मेट्रो कॉरिडोर और पीएमसीएच स्टेशन के लिए तोड़ा गया था। असंवेदनशील विकास की उन्मत्त गति को देखते हुए कुछ वर्षों में पुराना सब कुछ मिट जाएगा।”
स्थापत्य कला संरक्षण के लिये काम करने वाली वास्तुकार आभा नारायण लांबा ने कहा कि पुरानी इमारतों का विध्वंस ऐतिहासिक शहरों के “चरित्र को नकारना है”।
उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “जो पटना को दिल्ली से, मुंबई को लखनऊ से, नोएडा को कलकत्ता से अलग करता है, वे ये पुरानी इमारतें हैं। ये संरचनाएं हमारे समग्र शहरी ताने-बाने का हिस्सा हैं और इन्हें बोझ या दायित्व के रूप में नहीं बल्कि एक संपत्ति के रूप में माना जाना चाहिए।”
भाषा प्रशांत नरेश
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