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Wednesday, 19 August, 2026
होमदेश'पहचान स्पष्ट नहीं हुई' :दाभोलकर हत्या मामले में दोषी सचिन अंदुरे को बॉम्बे HC ने जमानत क्यों दी

‘पहचान स्पष्ट नहीं हुई’ :दाभोलकर हत्या मामले में दोषी सचिन अंदुरे को बॉम्बे HC ने जमानत क्यों दी

सचिन अंदुरे इस मामले में ज़मानत पाने वाले दूसरे दोषी हैं. इस साल अप्रैल में, हाई कोर्ट ने सह-दोषी शरद भाऊसाहेब कालस्कर को भी ज़मानत दी थी.

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मुंबई: विशेष अदालत की ओर से दी गई उम्रकैद की सजा पर रोक लगाते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने मंगलवार को 2013 में तर्कवादी डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में दोषी सचिन अंदुरे को जमानत दे दी.

अंदुरे ने हाई कोर्ट में अपील दायर कर विशेष गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) कोर्ट की ओर से दी गई सजा को चुनौती दी थी. एक अंतरिम आवेदन में उसने जमानत और उम्रकैद की सजा पर रोक लगाने की मांग की थी. हाई कोर्ट ने मंगलवार को यह आवेदन मंजूर कर लिया.

अंदुरे इस मामले में जमानत पाने वाला दूसरा दोषी है. इससे पहले इस साल अप्रैल में उसके सह-दोषी शरद भाऊसाहेब कलस्कर को भी जमानत दी गई थी.

जमानत देते समय कोर्ट ने बचाव पक्ष की इस दलील को माना कि संदिग्धों की पहचान कराने के लिए टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) नहीं कराई गई थी. इसके बजाय गवाह को अंदुरे और उसके सह-आरोपी की तस्वीरें दिखाई गई थीं.

कोर्ट ने कहा, “इससे पहचान की प्रक्रिया प्रभावित होती है. घटना के करीब 10 साल बाद पहली बार उन्होंने कोर्ट में आरोपियों की पहचान की. इस पहचान का शायद ही कोई महत्व रह जाता है.” कोर्ट ने कहा, “TIP क्यों नहीं कराई गई, इसका कोई कारण नहीं बताया गया है. जहां तक आवेदक का सवाल है, उसकी स्पष्ट पहचान नहीं हुई है.”

कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालत के बाहर की गई कथित स्वीकारोक्ति का सबूत कमजोर है. कोर्ट ने कहा, “जानकारी दिए जाने के पांच साल बाद और खास तौर पर अंदुरे की गिरफ्तारी के बाद गवाह के बयान की पुष्टि करने वाला कोई सबूत नहीं है.”

67 वर्षीय दाभोलकर महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक थे. यह अंधविश्वास के खिलाफ काम करने वाला संगठन है. 20 अगस्त 2013 को पुणे में सुबह की सैर के दौरान मोटरसाइकिल पर आए दो हमलावरों ने उन्हें गोली मारकर हत्या कर दी थी. दाभोलकर की हत्या तीन अन्य तर्कवादियों और कार्यकर्ताओं की इसी तरह हुई हत्याओं की एक कड़ी में पहली थी. इनमें फरवरी 2015 में कोल्हापुर में गोविंद पानसरे, अगस्त 2015 में धारवाड़ में कन्नड़ भाषा के विद्वान एम.एम. कलबुर्गी और सितंबर 2017 में बेंगलुरु में पत्रकार गौरी लंकेश शामिल थीं.

अंदुरे पानसरे की हत्या के मामले में भी ट्रायल का सामना कर रहा है. दोनों मामलों में जमानत मिलने के बाद अब वह जेल से बाहर आ सकता है.

दाभोलकर मामले की जांच पहले स्थानीय पुलिस ने की थी. लेकिन उनकी बेटी मुक्ता दाभोलकर की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दायर किए जाने के बाद 2014 में जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दी गई थी.

अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि अंदुरे गोली चलाने वालों में से एक था. 10 मई 2024 को सेशन कोर्ट ने दाभोलकर की हत्या के मामले में अंदुरे और शरद कलस्कर को दोषी ठहराया और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई. हालांकि, दोनों को कड़े UAPA और आर्म्स एक्ट के तहत लगे आरोपों से बरी कर दिया गया था.

‘याददाश्त की लंबी परीक्षा’

आवेदक के खिलाफ मुख्य सबूत प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और एक प्रत्यक्षदर्शी की अदालत के बाहर की गई कथित स्वीकारोक्ति है. यह गवाह उस समय पुणे नगर निगम में सफाई कर्मचारी था.

दाभोलकर की हत्या वाले दिन वह ओंकारेश्वर मंदिर और खत्री वडा पाव की जगह के बीच अपना काम कर रहा था. उसने बताया कि वह सुबह करीब 6.30 बजे काम पर पहुंचा था और करीब 45 मिनट बाद उसे पटाखे जैसी आवाज सुनाई दी. उसने कहा कि उसने देखा कि दो लड़के एक बुजुर्ग व्यक्ति पर गोली चला रहे थे. वे दोनों लड़के पुलिस चौकी के पास खड़ी मोटरसाइकिल की तरफ गए और वहां से भाग गए. गवाह के बयान के मुताबिक, बुजुर्ग व्यक्ति जमीन पर गिर गया.

बाद में उसने कोर्ट में बयान दिया कि सचिन अंदुरे और सह-आरोपी शरद कलस्कर ही वे दो लोग थे जिन्हें उसने देखा था. CBI ने उसे आरोपियों की तस्वीरें दिखाई थीं. हालांकि, जिरह के दौरान इस अहम प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि CBI के एक अधिकारी ने उसे ये तस्वीरें सिर्फ 2018 में दिखाई थीं.

उसने उनमें से एक व्यक्ति की पहचान की थी, जिसका नाम कलस्कर था. महत्वपूर्ण बात यह थी कि उसने कहा था कि उसने दूसरे व्यक्ति को हत्या करते हुए नहीं देखा था. पुलिस ने उसे बताया था कि उस व्यक्ति का नाम अंदुरे है.

कोर्ट ने कहा, “कोर्ट में उसकी मुख्य पहचान मार्च 2022 में हुई थी. यानी घटना के करीब आठ साल और सात महीने बाद. यह उसकी याददाश्त की लंबी परीक्षा थी.”

कोर्ट ने कहा, “उसने पुलिस को बताया था कि उसने उस व्यक्ति को हत्या करते हुए नहीं देखा था. किसी भी स्थिति में, उसे दिसंबर 2018 में तस्वीरें दिखाई गई थीं. संदिग्धों की तस्वीरें दिखाने के बजाय TIP क्यों नहीं कराई गई, इसका कोई कारण नहीं बताया गया.”

कोर्ट ने दूसरे गवाह विनय से जुड़े सबूतों के आधार पर अभियोजन पक्ष की थ्योरी को भी स्वीकार नहीं किया. उसने बताया कि वह रोज सुबह सैर और जॉगिंग के लिए जाता था. हत्या वाले दिन वह सुबह की सैर से करीब 7 बजे घर लौटा और अपनी बालकनी में चला गया. उस समय उसने एक बुजुर्ग व्यक्ति को देखा. विनय ने कहा कि इसके एक से डेढ़ मिनट के अंदर उसे गोलियां चलने की आवाज सुनाई दी.

उसने उस जगह की तरफ देखा, जहां से आवाज आई थी. उसने देखा कि बुजुर्ग व्यक्ति जमीन पर पड़ा हुआ था.

उसके पीछे आए दो लड़के उल्टी दिशा में भाग रहे थे और उसके घर की तरफ आए. दोनों पुलिस चौकी की तरफ गए, वहां खड़ी मोटरसाइकिल स्टार्ट की और चले गए. उसने मोटरसाइकिल का नंबर देखा और पुलिस को इसकी जानकारी दी.

फिर 2018 में विनय को करीब एक दर्जन तस्वीरें दिखाई गईं. उसने 2022 में, यानी नौ साल बाद, दो तस्वीरों की पहचान की. दोनों तस्वीरें एक ही व्यक्ति की थीं. वह व्यक्ति भी शरद कलस्कर था. कोर्ट ने कहा, “फिर से, यह याददाश्त की एक लंबी परीक्षा थी.”

कोर्ट ने एक अन्य गवाह सोमनाथ धायडे की अदालत के बाहर की गई कथित स्वीकारोक्ति को भी नहीं माना. यह गवाह एक रेस्टोरेंट चलाता था और सनातन प्रभात साप्ताहिक का ग्राहक होने के साथ-साथ हिंदुत्व के कार्यक्रमों में भी शामिल होता था. 2012 में ऐसे ही एक कार्यक्रम में उसकी मुलाकात अंदुरे और ऋषिकेश देवदिकर नाम के एक अन्य व्यक्ति से हुई थी. दोनों धायडे के साथ हिंदुत्व पर चर्चा करते थे. उसने बताया कि घटना से करीब छह महीने पहले से आवेदक और ऋषिकेश देवदिकर उससे नहीं मिले थे.

गवाह ने बताया कि घटना के करीब 15 दिन बाद अंदुरे उसके रेस्टोरेंट में आया. वह अस्त-व्यस्त और परेशान दिख रहा था. यह गवाह उसके पास बैठा और उसने पूछा कि वह परेशान क्यों है. इसके बाद अंदुरे ने इस गवाह के सामने कथित तौर पर स्वीकार किया कि क्या वह उसे कुछ बता सकता है.

कोर्ट ने कहा कि इस गवाह ने 2018 में CBI को इस अदालत के बाहर की गई कथित स्वीकारोक्ति के बारे में बताया था. यानी कथित स्वीकारोक्ति के पांच साल बाद. कोर्ट ने कहा, “ऐसा दिखाने के लिए कुछ भी नहीं है कि आवेदक इस गवाह के इतना करीब था कि वह उसके सामने अपना अपराध कबूल करता. यह दिखाने वाला भी कोई सबूत नहीं है कि CBI अधिकारी को कैसे पता चला कि आवेदक ने इस गवाह के सामने कबूल किया था. इसलिए उसका बयान बहुत कमजोर सबूत है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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