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Saturday, 5 September, 2026
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छत्तीसगढ़ कांग्रेस नेताओं की हत्या के पीछे कौन था? 13 साल बाद भी झीरम साजिश में चार्जशीट का इंतज़ार

2013 के झीरम हत्याकांड के पीछे साजिश का आरोप लगाने वाली FIR दर्ज हुए पांच साल से ज्यादा हो चुके हैं. सुप्रीम कोर्ट से जांच की मंजूरी मिलने के बावजूद छत्तीसगढ़ पुलिस ने अभी तक चार्जशीट दाखिल नहीं की है.

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नई दिल्ली: एफआईआर दर्ज होने के पांच साल से ज्यादा समय बाद और करीब तीन साल पहले भारत के सुप्रीम कोर्ट से जांच की मंजूरी मिलने के बावजूद, 2013 के झीरम हत्याकांड में साजिश की जांच कर रहे छत्तीसगढ़ पुलिस के मामले में अभी तक चार्जशीट दाखिल नहीं हुई है. इस हत्याकांड में कांग्रेस के लगभग पूरे बड़े नेतृत्व का सफाया हो गया था. वहीं, राज्य के जगदलपुर में विशेष NIA अदालत ने हमले की योजना बनाने और उसे अंजाम देने के मामले में केंद्रीय एजेंसी की ओर से आरोपी बनाए गए सभी 10 लोगों को दोषी ठहरा दिया है.

यह साजिश का मामला मई 2020 में कांग्रेस विधायक उदय मुदलियार के बेटे जितेंद्र उदय मुदलियार की शिकायत पर दर्ज किया गया था. उदय मुदलियार मई 2013 में कांग्रेस नेताओं के काफिले पर हुए नक्सली हमले में मारे गए लोगों में शामिल थे.

छत्तीसगढ़ पुलिस के एक अधिकारी ने दिप्रिंट से पुष्टि की कि “चार्जशीट दाखिल नहीं हुई है.” उन्होंने मामले की “संवेदनशीलता” का हवाला देते हुए इसकी स्थिति के बारे में आगे जानकारी देने से इनकार कर दिया.

यह झीरम हत्याकांड से जुड़ा दूसरा आपराधिक मामला था और अभी लंबित है. इस हमले में तत्कालीन छत्तीसगढ़ कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्या चरण शुक्ला और उदय मुदलियार समेत कांग्रेस के बड़े नेताओं की माओवादियों ने हत्या कर दी थी.

एफआईआर दर्ज होने के एक महीने बाद, यानी घटना के करीब सात साल बाद, NIA ने बस्तर पुलिस से मामले की फाइलें मांगी थीं. NIA ने कहा था कि इस मामले का हत्याकांड से जुड़े उस पहले मामले से सीधा संबंध है, जिसकी जांच NIA पहले ही कर रही थी.

हालांकि, बस्तर पुलिस ने मामले की जानकारी देने से इनकार कर दिया. इसके बाद कानूनी लड़ाई शुरू हुई, जो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची. सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2023 में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें राज्य पुलिस को मामले की जांच करने की अनुमति दी गई थी.

अपने द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर की लंबित जांच को लेकर मुदलियार ने आरोप लगाया कि BJP के सत्ता में आते ही जांच से समझौता कर लिया गया था. मुदलियार ने दिप्रिंट से कहा, “जब BJP सत्ता में थी और सत्ता से बाहर थी, तब उसके हस्तक्षेप का इतिहास देखिए. वे कभी नहीं चाहते थे कि NIA इसकी तह तक पहुंचे और वे अब भी ऐसा ही कर रहे हैं. हत्या के पीछे जिन सभी बड़े माओवादी नेताओं का हाथ था, वे या तो आत्मसमर्पण कर चुके हैं या गिरफ्तार हो चुके हैं. उनसे हत्या के मकसद और साजिश के बारे में पूछताछ क्यों नहीं की जा रही है?”

मामला और उसकी कड़ी

दिसंबर 2018 में राज्य में सत्ता संभालने के तुरंत बाद कांग्रेस नेता भूपेश बघेल ने तत्कालीन बस्तर IG विवेकानंद सिन्हा की अगुवाई में विशेष जांच टीम (SIT) से जांच कराने का आदेश दिया. इस टीम में तत्कालीन DIG (एंटी-नक्सल ऑपरेशन) सुंदरराज पाटीलिंगम भी शामिल थे. टीम को झीरम हत्याकांड के पीछे हुई घटनाओं और साजिश की जांच करनी थी.

बघेल ने NIA की जांच को अधूरी जांच बताया था, क्योंकि इसमें हत्याकांड के पीछे की साजिश की जांच नहीं की गई थी.

पूर्व राज्य मुख्यमंत्री ने पिछले हफ्ते की शुरुआत में कांकेर में पत्रकारों से कहा, “NIA ने जांच सही तरीके से नहीं की. दरभा पुलिस थाने में जो FIR दर्ज हुई थी, उसमें जो धाराएं लगाई गई थीं और जिन लोगों के नाम दर्ज थे, उनसे पूछताछ नहीं की गई.”

उन्होंने आगे कहा, “NIA ने झीरम घाटी में घटना वाली जगह पर मौजूद सभी लोगों से भी पूछताछ नहीं की. उन्होंने यह पता लगाने के लिए एक भी कदम नहीं उठाया कि इस साजिश के पीछे कौन था. अदालत अपना फैसला सिर्फ रिपोर्ट के आधार पर करेगी. BJP लगातार इसे दबाने की कोशिश कर रही है.”

कांग्रेस के सत्ता में आने के करीब दो साल बाद, जितेंद्र मुदलियार ने मई 2020 में उसी दरभा पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज कराई. अपनी पुलिस शिकायत में मुदलियार ने हत्याकांड के पीछे बड़ी साजिश का आरोप लगाया और कुछ गैर-माओवादी लोगों के शामिल होने की आशंका जताई.

बस्तर जिला पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) और 120-B (आपराधिक साजिश) के तहत मामला दर्ज किया. राज्य पुलिस ने यह मामला बस्तर IG के तहत बनाई गई SIT को सौंप दिया. एफआईआर दर्ज होने के कुछ हफ्तों बाद गृह मंत्रालय ने NIA Act की धारा 8 का इस्तेमाल करते हुए NIA को मामले की जांच अपने हाथ में लेने का आदेश दिया. यह धारा एजेंसी को ऐसे किसी मामले की जांच करने का अधिकार देती है, जो पहले से NIA की जांच में चल रहे किसी मामले से जुड़ा हो.

जब ऐसा करने से इनकार कर दिया गया, तो एजेंसी ने विशेष NIA अदालत का रुख किया और बस्तर पुलिस को मामले की फाइलें सौंपने का निर्देश देने की मांग की. हालांकि, उसी साल अगस्त में अदालत ने एजेंसी की याचिका खारिज कर दी.

एजेंसी की अपील पर सुनवाई के दौरान सरकार के वकील ने दलील दी कि एफआईआर धारा 302 और 120-B के तहत दर्ज की गई थी. ये धाराएं NIA Act, 2008 के तहत तय अपराधों में शामिल नहीं हैं. इसलिए राज्य पुलिस के लिए मामले की फाइलें NIA को सौंपना जरूरी नहीं था. इसके अलावा, मुदलियार के वकील सुदीप श्रीवास्तव ने दलील दी कि NIA ने पहले जिस मामले की जांच अपने हाथ में ली थी, उसमें हत्याकांड की साजिश वाले पहलू की जांच नहीं की थी.

उन्होंने यह भी दलील दी थी कि एजेंसी की जांच केवल माओवादी कैडरों और नेताओं के काफिले की सुरक्षा की कमी जैसे दूसरे जुड़े हुए कारणों पर केंद्रित थी. उनका कहना था कि बाहरी मदद और जानकारी के बिना ऐसी घटना हो ही नहीं सकती थी, लेकिन जांच के दौरान इन पहलुओं को छुआ तक नहीं गया.

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मार्च 2022 में NIA की अपील खारिज कर दी थी और सुप्रीम कोर्ट ने भी नवंबर 2023 में एजेंसी की अपील खारिज कर दी थी.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कुछ दिनों बाद BJP के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा था कि अगर उनकी पार्टी राज्य में फिर सत्ता में आती है तो मामले की तुरंत जांच कराई जाएगी. अगले महीने विष्णु देव साय ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, क्योंकि BJP ने राज्य में जोरदार वापसी करते हुए सत्ता हासिल कर ली थी.

झीरम हत्याकांड से जुड़े दूसरे मामले में चार्जशीट अभी भी लंबित है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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