Wednesday, 25 May, 2022
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पीयूष जैन के लिए अब क्या है आगे का रास्ता, ज़ब्त हुए 197 करोड़ रुपये अब कभी नहीं देख पाएंगे

GST अधिकारियों का कहना है कि पीयूष जैन केस की जांच में कम से कम छह महीने का समय लगेगा, क्योंकि उन पर बहुत सारे अपराधों के आरोप लगेंगे, जिनमें कई एजेंसियां शामिल होंगी.

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नई दिल्ली: पिछले महीने वस्तु एवं सेवा कर महानिदेशालय (जीएसटी) की अहमदाबाद स्थित ख़ुफिया इकाई ने कानपुर के एक इत्र व्यापारी के यहां से 197.49 करोड़ रुपए नकद बरामद किए. जीएसटी चोरी के किसी मामले में केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) द्वारा बरामद की गई ये अभी तक की सबसे बड़ी नकद रकम है.

ओडोकेम इंडस्ट्रीज़ के नाम से एक कंपनी चलाने वाले व्यवसायी पीयूष जैन को केंद्रीय जीएसटी (सीजीएसटी) एक्ट की धारा 132 के तहत मुक़दमा दर्ज किए जाने के बाद, 26 दिसंबर को गिरफ्तार किया गया. ये धारा उन अपराधों से निपटने के लिए है, जिनमें कर बचाने की नीयत से बिल जारी किए बिना वस्तुओं और सेवाओं की सप्लाई कर दी जाती है, या फिर धोखाधड़ी से इनपुट टैक्स रिफंड्स हासिल करने के लिए, ऐसी वस्तुओं और सेवाओं के लिए इनवॉयस जारी कर दी जाती है, जिनका कोई वजूद ही नहीं होता.

तो आखिर उस नक़दी का क्या होगा जिसे अधिकारियों ने ज़ब्त किया है, और ऐसे अपराधों में कितनी सज़ा का प्रावधान है?

जैन के मामले में, उसने कथित रूप से गणपति रोड कैरियर्स नाम की एक ट्रांसपोर्ट कंपनी के साथ मिली-भगत करके, वस्तुओं को एक राज्य से दूसरे राज्य में ले जाने के लिए, एक ग़ैर-मौजूद फर्म के नाम से 50,000 रुपए से कम मूल्य के बहुत सारे चालान जारी किए, जिससे ई-वे बिल तैयार करने से बचा जा सके. ई-वे बिल्स ट्रांसपोर्ट परमिट्स की तरह होते हैं, जो तब जारी किए जाते हैं जब ले लाई जा रही वस्तुओं का मूल्य 50,000 से अधिक हो. इसका मक़सद राज्यों की सीमाओं के पार, वस्तुओं और सेवाओं की आवाजाही को सुगम बनाना है.

वित्त मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया, ‘ट्रांसपोर्टर भी ऐसी गुप्त सप्लाई की बिक्री से हुई आय नक़द वसूल कर रहा था, और अपना कमीशन काटकर उसे निर्माता के हवाले कर रहा था’.

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2017 के जीएसटी एक्ट के अनुसार, अगर 5 करोड़ रुपए से अधिक की कर चोरी पाई जाती है, तो ये अपराध संज्ञेय और ग़ैर-ज़मानती माना जाता है और अधिकारी गिरफ्तारी कर सकते हैं.

क़ानून ये भी कहता है कि अगर कर-देयता 5 करोड़ से अधिक की होती है, तो संबंधित व्यक्ति को अधिकतम पांच वर्ष तक की सज़ा सुनाई जा सकती है.

चूंकि जैन के कानपुर और कन्नौज परिसरों से बरामद नक़दी लगभग दो सौ करोड़ के क़रीब है, इसलिए अधिकारियों ने नाम छिपाने की शर्त पर कर कहा कि कर चोरी के 5 करोड़ से कहीं अधिक होने की संभावना है, इसलिए इस मामले में पांच साल तक की क़ैद, और साथ में जुर्माने का दंड दिया जा सकता है.

ऊपर हवाला दिए गए अधिकारी ने कहा, ‘नक़द पैसा हमारे पास ज़मानत के रूप में रह सकता है, जब तक कि मामले पर फैसला नहीं हो जाता’.

नक़दी के साथ जीएसटी अधिकारियों ने लगभग 23 किलोग्राम सोना, और सुगंधित कंपाउण्ड्स बनाने में इस्तेमाल होने वाली कच्ची सामग्री की, बिना हिसाब की भारी मात्रा बरामद की, जिसमें 600 किलोग्राम से अधिक संदल का तेल भी शामिल था, जो एक भूमिगत भंडार में छिपाया गया था, और जिसका बाज़ार मूल्य क़रीब 6 करोड़ रुपए था.

तलाशी की कार्रवाई के दौरान बरामद की गई नक़दी और दूसरी चीज़ों को, आमतौर पर किसी सरकारी बैंक की सुरक्षा में रखा जाता है, जब तक मामले की जांच न हो जाए. एक बार ज़ब्त नक़दी तथा बिना हिसाब की बिक्री की रक़म पर बक़ाया कर का हिसाब हो जाए, तो फिर उसे ज़ब्त की गई नक़दी से समायोजित कर लिया जाता है.

I-T के प्रावधान ज़्यादा कड़े

लेकिन यहां एक पेच है. जब जीएसटी अधिकारी इतनी बड़ी मात्रा में नक़दी ज़ब्त करते हैं, तो वो उस जानकारी को क्षेत्रीय आर्थिक खुफिया कमेटी के साथ साझा करते हैं, जो सभी केंद्रीय एजेंसियों का एक समूह होता है, जैसे आयकर विभाग, राजस्व खुफिया विभाग, और प्रवर्त्तन निदेशालय.

ये कमेटी एक मंच है जो राज्यों में इकनॉमिक इंटेलिजेंस, और आर्थिक अपराधों से निपटने में लगी सरकारी एजेंसियों पर, नज़र रखने का काम करती है.

इसमें सभी ख़ुफिया एजेंसियों की अनुक्रमिक भागीदारी काम करने लगती है. ऐसा होने पर जैन के खिलाफ सीजीएसटी एक्ट के अलावा, और भी मुक़दमे दायर किए जा सकते हैं. इसके अलावा उसके खिलाफ कर देयता और जुर्माने भी साथ साथ तय किए जाएंगे.

ऐसे मामलों में जहां बिना हिसाब का पैसा सैकड़ों करोड़ हों, वहां केंद्रीय आर्थिक खुफिया एजेंसी को भी सूचित किया जाता है, जो सभी आर्थिक अपराधों के लिए शीर्ष इकाई होती है.

एक जीएसटी अधिकारी के अनुसार, आईटी क़ानून के प्रावधान ज़्यादा कड़े होते हैं. आईटी एक्ट की धारा 269 एसटी के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो 2 लाख या उससे अधिक का नक़द लेन-देन करता है, वो लेन-देन की राशि के बराबर जुर्माने की रक़म का देनदार होगा. इसलिए, जैन ने जितने अपराध किए हैं, उन सब का हिसाब लगाने के बाद, उसे उससे अधिक पैसा कर के रूप में भरना पड़ सकता है, जितना उसके पास से ज़ब्त हुआ है.

करदाताओं के अपीलीय अधिकार

जैन के मामले में स्पष्ट किया गया कि आगे की जांच होने तक, ज़ब्त नक़दी को केस संपत्ति के तौर पर, भारतीय स्टेट बैंक की निगरानी में रखा गया है. ओडोकेम इंडस्ट्रीज़ ने अपनी कर देयताएं पूरी करने के लिए, ज़ब्त की हुई नक़दी से बक़ाया कर का कोई भुगतान नहीं किया है, और बक़ाया का निर्धारण अभी किया जाना है.

लेकिन, राजस्व विभाग ने ये ज़रूर स्पष्ट किया कि जैन ने स्वेच्छा से अपना अपराध स्वीकार कर लिया है, और उसके खिलाफ आरोपों के समर्थन में पर्याप्त सबूत रिकॉर्ड पर उपलब्ध हैं.

अधिकारियों ने कहा कि इस मामले में बहुत सारी एजेंसियां शामिल हैं, इसलिए इसकी जांच में कम से कम छह महीने लग जाएंगे, जिसके बाद ही कर की मांग रखी जाएगी.

प्राधिकारियों की ओर से करदाता को एक कारण बताओ नोटिस जारी किया जाता है. अगर करदाता कर योग्य राशि पर आपत्ति करता है, तो केस को बहुत से क़ानूनी मंचों पर चुनौती दी जा सकती है, जैसे जीएसटी एवं आईटी अपीलीय प्राधिकरण, जो ऊपर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकता है, जहां उसे बेहिसाब राशि और टैक्स रिटर्न्स से जुड़े सभी कागज़ात पेश करने होंगे.

एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा, ‘प्रतिवादी के पास सुप्रीम कोर्ट के स्तर तक अपील करने का अधिकार होता है’.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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