नई दिल्ली: अगस्त 1992 में जब देश दुनिया के लिए अपने बाजार खोल रहा था, तब चुनाव आयोग ऑफ इंडिया यानी ECI ने एक निर्देश जारी किया था. इसमें भारत के सभी जिलों के कलेक्टर को यह तय करने का अधिकार दिया गया था कि कोई व्यक्ति विदेशी है या नहीं. इस 1992 के निर्देश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट का 1995 का फैसला पिछले साल फिर से सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.
चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं में 1995 का यह फैसला यानी लाल बाबू हुसैन बनाम इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर एक बड़ा आधार बना.
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में उन लोगों के नाम सामान्य तरीके से हटाने पर आपत्ति जताई थी जो पहले चुनावों में मतदाता रह चुके थे. और फिर उनसे दोबारा अपनी पात्रता साबित करने को कहा गया था ताकि उनका नाम फिर से मतदाता सूची में शामिल हो सके.
1995 में कोर्ट ने कहा था. “अगर किसी व्यक्ति की नागरिकता पर संदेह है और उसका नाम पिछली मतदाता सूची में शामिल था, तो इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर या जांच करने वाला अधिकारी यह ध्यान रखे कि नाम शामिल करने की पूरी प्रक्रिया पहले ही पूरी की गई होगी. इसलिए नोटिस जारी करने और आगे की कार्रवाई से पहले उस तथ्य को पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए.”
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट की इसी टिप्पणी का सहारा लेते हुए कहा कि SIR में पहले से दर्ज मतदाताओं को दोबारा अपने दस्तावेज साबित करने के लिए कहना पहले से बनी हुई इस धारणा को उलट देता है. और इससे मतदाताओं पर यह बोझ डाल दिया जाता है कि वे खुद को फिर से सूची में शामिल करवाएं.
बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया और चुनाव आयोग की SIR करने की शक्ति और उसकी प्रक्रिया दोनों को सही ठहराया. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस ज्योतिर्मय भागची की बेंच ने कहा कि 1995 के फैसले को उसी संदर्भ तक सीमित समझा जाना चाहिए जिसमें वह दिया गया था.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लाल बाबू हुसैन मामले में बेंच चुनाव आयोग द्वारा बड़े स्तर पर या गहन सत्यापन प्रक्रिया की जांच नहीं कर रही थी. यह प्रक्रिया आयोग ने अपने संवैधानिक कर्तव्य निभाने के लिए की थी.
कोर्ट ने कहा. “यह सवाल कि क्या आयोग चुनावी सूची की शुद्धता और पवित्रता बनाए रखने के बड़े हित में पहले से दर्ज नामों की दोबारा जांच कर सकता है, उस मामले में विचार के लिए नहीं आया था.”
1995 के फैसले की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल इसलिए कि किसी व्यक्ति का नाम पहले की मतदाता सूची में है, इसका मतलब यह नहीं कि वह हमेशा के लिए जांच से बाहर हो गया. और मतदाताओं से दस्तावेज मांगना यह साबित नहीं करता कि उन पर अवैध तरीके से सबूत का बोझ डाला गया है.
1995 के फैसले की कहानी क्या थी. तब सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था. और अब कोर्ट ने क्या फैसला दिया है. दिप्रिंट समझाता है.
1992 का निर्देश जिसने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को जन्म दिया
1995 के फैसले की शुरुआत चुनाव आयोग के 1992 के निर्देश को चुनौती देने वाली याचिकाओं से हुई थी.
इस निर्देश में कहा गया था कि गणनाकर्ताओं द्वारा इकट्ठा की गई जानकारी को कलेक्टरों को भेजा जाए. फिर कलेक्टर पुलिस या खुफिया एजेंसियों से इसकी जांच करवाएं और तय करें कि संबंधित व्यक्ति भारत का नागरिक है या नहीं. इसके आधार पर इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर यानी ERO मसौदा मतदाता सूची तैयार करें और आपत्तियां मांगें.
सितंबर 1994 में जारी एक अन्य निर्देश के जरिए ERO को यह अधिकार दिया गया कि वह विदेशी नागरिकों की पहचान कर उनके नाम मतदाता सूची से हटाएं. 1995 के फैसले के अनुसार चुनाव आयोग की गाइडलाइन में कहा गया था कि नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी उस व्यक्ति की होगी जो अपना नाम मतदाता सूची में शामिल करवाना चाहता है.
इन निर्देशों के बाद ग्रेटर बॉम्बे के 39 पुलिस थानों में बड़े स्तर पर जांच हुई. करीब 1.67 लाख लोगों को पुलिस ने पत्र भेजकर जन्म प्रमाण पत्र. पासपोर्ट. नागरिकता प्रमाण पत्र और भारत सरकार के नागरिकता रजिस्टर में प्रविष्टि दिखाने को कहा. इसी तरह के नोटिस दिल्ली में भी भेजे गए. 1995 के फैसले में कहा गया कि इस कदम पर आरोप लगे थे कि इसका उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदाय को परेशान करना और उन्हें मताधिकार से वंचित करना था.
1995 का फैसला
इन निर्देशों को चुनौती देने वाली एक याचिका बॉम्बे हाई कोर्ट में दाखिल की गई थी.
हाई कोर्ट ने याचिकाएं खारिज कर दी थीं क्योंकि एडवोकेट जनरल ने अदालत को भरोसा दिया था कि अधिकारी कुछ रियायतें देंगे. इसके बाद इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. इसी तरह दो और याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुईं. एक दिल्ली के मोतिया खान पहाड़गंज के निवासियों की ओर से और दूसरी संजय अमर झुग्गी झोपड़ी कॉलोनी के कुछ निवासियों की ओर से. इन लोगों ने अपनी नागरिकता साबित करने के नोटिस को चुनौती दी थी.
इन तीनों याचिकाओं पर फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में कहा था कि बॉम्बे और दिल्ली में कुछ लोगों को संदिग्ध विदेशी माना गया जबकि वे पहले चुनावों में मतदाता रह चुके थे. और उनका नाम सूची में जोड़ने से पहले सत्यापन भी हुआ होगा.
कोर्ट ने कहा था. “ऐसा इसलिए माना जा सकता है क्योंकि 1950 के कानून और 1960 के नियमों के तहत किए गए सरकारी कार्य नियमित रूप से किए गए होंगे. उनके नाम पहले से सूची में थे और चूंकि उन्हें हटाने के लिए विशेष संशोधन प्रक्रिया शुरू की गई थी, इसलिए हटाने की पूरी प्रक्रिया का पालन जरूरी था.”
उस समय कोर्ट ने याचिकाएं मंजूर कर ली थीं. याचिकाकर्ताओं के खिलाफ शुरू की गई कार्रवाई रद्द कर दी थी और चुनाव आयोग को कहा था कि अगर वह चाहे तो नए सिरे से कार्रवाई शुरू करे. लेकिन इसके लिए उसे वह सामग्री बतानी होगी जिसके आधार पर नागरिकता पर संदेह किया गया था.
कोर्ट ने कहा था. “अगर किसी व्यक्ति की नागरिकता पर संदेह है और उसका नाम पिछली मतदाता सूची में था, तो इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर या जांच अधिकारी यह ध्यान रखे कि नाम शामिल करने की पूरी प्रक्रिया पहले की गई होगी. इसलिए नोटिस जारी करने और आगे की कार्रवाई में उस तथ्य को पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए.”
यह स्थायी गारंटी नहीं
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की वैधता पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मतदाता सूची एक बदलती रहने वाली व्यवस्था है.
कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में होना उसकी वैधता का अनुमान जरूर देता है. लेकिन इसे हमेशा के लिए जांच से सुरक्षा की गारंटी नहीं माना जा सकता. खासकर तब जब संविधान के तहत सूची की शुद्धता बनाए रखने के लिए जांच की जा रही हो.
कोर्ट ने यह दलील भी खारिज कर दी कि गहन सत्यापन प्रक्रिया से सबूत का बोझ गलत तरीके से मतदाताओं पर डाल दिया गया है. कोर्ट ने कहा कि मतदाताओं से दस्तावेज मांगना इस अनुमान को खत्म करना नहीं है. बल्कि यह वह प्रक्रिया है जिसके जरिए आयोग पुराने रिकॉर्ड की पुष्टि या जरूरत पड़ने पर सुधार करना चाहता है.
कोर्ट ने कहा कि लाल बाबू हुसैन मामले में बेंच ने यह नहीं कहा था कि मतदाता सूची में दर्ज नाम पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. बल्कि “अनुमान” शब्द का मतलब ही यह है कि उसे बदला जा सकता है.
SIR प्रक्रिया में क्या अलग है
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को सही ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची में नाम शामिल होने से वैधता का अनुमान जरूर बनता है. लेकिन यह चुनाव आयोग को SIR जैसी प्रक्रिया करने से नहीं रोक सकता.
कोर्ट ने कहा कि अगर याचिकाकर्ताओं की बात मान ली जाए तो एक बार नाम सूची में आ जाने के बाद चुनाव आयोग किसी बड़े स्तर की जांच नहीं कर पाएगा. वह केवल व्यक्तिगत आपत्तियों तक सीमित रह जाएगा.
कोर्ट ने कहा. “ऐसी व्याख्या चुनाव आयोग के संवैधानिक कर्तव्य को अनावश्यक रूप से सीमित कर देगी और समय के साथ पैदा होने वाली व्यवस्थागत कमियों को दूर करने में उसे कमजोर बना देगी.”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची में नाम शामिल होना ऐसा अंतिम अनुमान नहीं हो सकता जो चुनाव आयोग को नई और गहन जांच करने से रोके.
कोर्ट ने माना कि मतदाता सूची में नाम होना एक साक्ष्य आधारित अनुमान देता है. इसका मतलब यह है कि हर बार मूल तथ्यों को दोबारा साबित करने की जरूरत नहीं होती. लेकिन कोर्ट ने कहा कि इस अनुमान को इतना बड़ा नहीं बनाया जा सकता कि किसी भी तरह की जांच ही न हो सके.
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