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Wednesday, 27 May, 2026
होमदेशक्या बचपन में किए गए अपराध के कारण रोजगार से रोका जा सकता है? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसका जवाब दिया

क्या बचपन में किए गए अपराध के कारण रोजगार से रोका जा सकता है? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसका जवाब दिया

यह फैसला एक ऐसे उम्मीदवार से जुड़े मामले में आया, जिसने कर्मचारी राज्य बीमा निगम के तहत MTS परीक्षा पास कर ली थी, लेकिन जिसका ऑफर लेटर रोक लिया गया था.

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नई दिल्ली: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि किशोरावस्था में किया गया कोई अपराध बड़े होने के बाद नौकरी से अयोग्य घोषित करने का आधार नहीं बन सकता.

21 मई का यह फैसला जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की सुधारात्मक भावना को मजबूत करता है. इसमें कहा गया है कि युवा अपराधियों को सुधार और पुनर्वास का मौका मिलना चाहिए.

जस्टिस श्री प्रकाश सिंह ने कहा. “किसी व्यक्ति की आजीविका को केवल उसके किसी आपराधिक मामले में कथित शामिल होने के आधार पर छीन लेना बहुत गलत और अनुचित होगा.”

यह मामला शुशील त्रिपाठी से जुड़ा था. उन्होंने कर्मचारी राज्य बीमा निगम यानी ESIC में मल्टी टास्किंग स्टाफ यानी MTS के पद के लिए भर्ती प्रक्रिया पास की थी.

दो चरणों की परीक्षा और दस्तावेज सत्यापन के बाद जुलाई 2024 में उन्हें नियुक्ति का प्रस्ताव दिया गया था.

लेकिन सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद भी उनकी जॉइनिंग लेटर रोक दी गई. कारण यह था कि उन्होंने अपने एटेस्टेशन फॉर्म में बताया था कि वह दो मामलों में शामिल रहे हैं. एक मामला 2015 का था जिसमें उन्हें किशोर माना गया था. दूसरा मामला 2020 का था, जो सबूतों के अभाव में बंद कर दिया गया था.

अधिकारियों ने पुलिस वेरिफिकेशन लंबित होने और कानूनी राय लेने की जरूरत को इसकी वजह बताया.

इसके बाद यह मामला हाई कोर्ट पहुंचा क्योंकि शुशील त्रिपाठी ने जॉइनिंग लेटर में देरी को चुनौती दी.

कोर्ट ने इस मुद्दे को जुवेनाइल जस्टिस के नजरिए से देखा जो सुधार, पुनर्वास और दूसरा मौका देने पर जोर देता है न कि सजा पर.

हाई कोर्ट यानी लखनऊ बेंच ने अधिकारियों को याचिकाकर्ता को जॉइनिंग लेटर जारी करने का निर्देश दिया.

कोर्ट ने कहा. “याचिकाकर्ता को अनिश्चित समय तक नौकरी का इंतजार नहीं कराया जा सकता क्योंकि अंतिम रिपोर्ट का निपटारा लंबित है.”

कोर्ट ने कहा कि एक मामला उस समय का था जब याचिकाकर्ता नाबालिग था. इसलिए उस आधार पर उसे नौकरी से अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता.

कोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस यानी बाल संरक्षण अधिनियम का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी किशोर को दोषी भी माना जाए तो भी वह दोष रोजगार के लिए अयोग्यता नहीं बन सकता.

फैसले में कहा गया कि कानून का उद्देश्य किशोरों को नया जीवन शुरू करने का मौका देना है. ताकि वे बिना किसी कलंक या भेदभाव के समाज में वापस जुड़ सकें.

जुवेनाइल कानून के अनुसार बच्चे और किशोर अभी विकास की प्रक्रिया में होते हैं.

इस समय की गलतियों को उनके चरित्र का स्थायी हिस्सा नहीं माना जाता. बल्कि उन्हें सुधार और बदलाव का अवसर माना जाता है. और कानून उन्हें कम उम्र में की गई गलतियों के कारण जीवन भर के कलंक से बचाता है.

दूसरे मामले के बारे में कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने पहले ही अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर दी थी जिसमें सबूतों की कमी बताई गई थी.

कोर्ट ने कहा कि जब आरोप गंभीर न हों और जांच में कोई दोष साबित न हो, तो किसी उम्मीदवार को रोजगार में अनिश्चित समय तक प्रक्रिया देरी के कारण नुकसान नहीं होना चाहिए.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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