नई दिल्ली: नीति आयोग की एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि भारत की शहरी प्रशासन व्यवस्था शहरों को संभालने में नाकाम हो रही है. रिपोर्ट में कहा गया है कि “सिर्फ नाम के मेयर”, बंटी हुई जिम्मेदारियां, कमजोर आर्थिक स्थिति और कर्मचारियों की कमी के कारण शहरी स्थानीय निकाय (ULBs) लोगों को बुनियादी सुविधाएं देने में असफल हो रहे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक सबसे बड़ी समस्या मेयर के पद में है.
‘Moving Towards Effective City Government–A framework for million-plus cities’ नाम की इस रिपोर्ट में कहा गया है, “मेयरों के पास पर्याप्त अधिकार नहीं होने की वजह से वे शहर प्रशासन में बड़ी भूमिका नहीं निभा पाते.” रिपोर्ट में कहा गया कि ज्यादातर शहरों में मेयर का पद “सिर्फ प्रतीकात्मक” बनकर रह गया है.
रिपोर्ट के मुताबिक असली ताकत नगर आयुक्तों या राज्य सरकार के नियंत्रण वाली एजेंसियों के पास होती है. इससे चुने गए प्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच बड़ा अंतर पैदा हो जाता है.
समस्या को और बढ़ाने वाली बात यह है कि अलग-अलग शहरों में चुनाव प्रणाली भी अलग है और कई जगह मेयर का कार्यकाल सिर्फ एक साल का होता है. कई शहरों में मेयर सीधे जनता द्वारा नहीं चुने जाते. ऐसे में काम में निरंतरता और जवाबदेही की कमी रहती है.
रिपोर्ट के अनुसार इसका नतीजा “कमजोर राजनीतिक नेतृत्व, बंटी हुई जिम्मेदारियां और भूमिकाओं की स्पष्ट कमी” के रूप में सामने आता है, जिससे प्रशासन प्रभावित होता है.
अप्रैल में जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ये समस्याएं भारत की शहरी प्रशासन व्यवस्था के बड़े ढांचे में गहरी कमजोरी को दिखाती हैं.
गैर-लाभकारी संस्था जनग्रह के चीफ पॉलिसी एंड इनसाइट्स ऑफिसर आनंद अय्यर ने दिप्रिंट से कहा, “आज हमारे बड़े शहरों के मेयर उन मामलों में फैसला नहीं लेते, जो सीधे नागरिकों की जिंदगी को प्रभावित करते हैं. आधे मामलों की बात छोड़िए, वे एक-चौथाई मामलों में भी फैसला नहीं कर पाते. यह प्रभावी प्रशासन नहीं है.”
जनग्रह भारत के शहरों और कस्बों में जीवन की गुणवत्ता सुधारने के लिए काम करने वाली संस्था है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि 74वें संविधान संशोधन का मकसद स्थानीय निकायों को मजबूत करना था, लेकिन असल में शहर सरकारों को पर्याप्त अधिकार नहीं मिले. शहरी योजना, पानी सप्लाई और परिवहन जैसे अहम क्षेत्रों पर उनका सीमित नियंत्रण है.
रिपोर्ट में सबसे बड़ी चिंता अलग-अलग एजेंसियों में बंटी जिम्मेदारियों को बताया गया है.
रिपोर्ट में कहा गया है, “पूरे शहर के नतीजों के लिए कोई एक संस्था जिम्मेदार नहीं है.” इसमें कहा गया कि सरकारी एजेंसियां और दूसरे विभाग अब भी ज़रूरी सेवाओं को नियंत्रित करते हैं. इससे जवाबदेही कमज़ोर होती है और सेवाएं देने में दिक्कत आती है.
रिपोर्ट के अनुसार, “राज्य सरकार की अलग-अलग एजेंसियों और विभागों में जिम्मेदारियां बंटी होने के कारण शहर सरकारें सिर्फ संचालन और रखरखाव तक सीमित रह जाती हैं. इससे नगर प्रशासन बुनियादी सेवाओं की निगरानी सही तरीके से नहीं कर पाता.”
रिपोर्ट में बेंगलुरु का उदाहरण दिया गया है. वहां नगर निगम कचरा प्रबंधन और सड़कों का काम संभालता है, जबकि पानी सप्लाई, ट्रांसपोर्ट और शहरी योजना जैसी अहम सेवाएं अलग-अलग राज्य एजेंसियों के पास हैं. इससे लोग उन सेवाओं की विफलता के लिए भी स्थानीय सरकार को दोष देते हैं, जिन पर उसका नियंत्रण ही नहीं होता.
आनंद अय्यर ने कहा, “शहर में सेवाएं संभालने वाली कई एजेंसियों के बीच एक ही समन्वय केंद्र होना चाहिए. फिलहाल वे अलग-अलग स्तर पर राज्य सरकार को रिपोर्ट करती हैं.”
उन्होंने कहा, “व्यवहारिक और तार्किक रूप से यह समन्वय शहर स्तर पर होना चाहिए, जहां मेयर और चुने गए प्रतिनिधि नेतृत्व करें और कमिश्नर व अधिकारी उनकी मदद करें.”
रिपोर्ट में कहा गया है कि पैसों की कमी भी समस्या को और गंभीर बनाती है. शहरी निकायों की अपनी कमाई कमजोर है, राज्यों से मिलने वाला पैसा पर्याप्त और नियमित नहीं है और वे खास योजनाओं से जुड़े अनुदान पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक शहर सरकारें राज्य से मिलने वाले पैसों पर काफी निर्भर हैं, जो अक्सर अनियमित होते हैं और सिर्फ कुछ योजनाओं तक सीमित रहते हैं.
राज्य वित्त आयोग (SFCs), जिनका मकसद आर्थिक अधिकारों का बंटवारा सुनिश्चित करना था, वे भी अपनी भूमिका निभाने में काफी हद तक असफल रहे हैं. रिपोर्ट में कहा गया है, “SFCs के गठन में देरी, कमजोर संस्थागत सहयोग और उनकी सिफारिशों को सही तरीके से लागू न किए जाने के कारण आर्थिक मदद अनिश्चित और अस्थायी बन गई है.”
इसका नतीजा यह है कि शहर सरकारें इंफ्रास्ट्रक्चर और सेवाओं में निवेश नहीं कर पा रही हैं.
रिपोर्ट में कर्मचारियों की भारी कमी और तकनीकी विशेषज्ञता की कमी का भी जिक्र किया गया है. कई शहरों में शहरी योजना, इंजीनियरिंग और फाइनेंस जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञों की भारी कमी है.
नगर आयुक्तों के बार-बार तबादले और बाहर से लाए गए कर्मचारियों पर ज्यादा निर्भरता भी प्रशासनिक निरंतरता को कमजोर करती है. रिपोर्ट में कहा गया है, “भर्ती में कमी, डेपुटेशन पर ज्यादा निर्भरता, लगातार ट्रांसफर और प्रशिक्षण में कम निवेश मिलकर ULBs की संस्थागत क्षमता को कमजोर करते हैं.”
रिपोर्ट के मुताबिक इन सभी समस्याओं ने मिलकर शहरी प्रशासन में “लगातार और व्यवस्था से जुड़ी बड़ी कमी” पैदा कर दी है, जिसका असर योजना, सेवाओं, जवाबदेही और लंबे समय के विकास पर पड़ रहा है.
नीति की सिफारिशें
इन समस्याओं को दूर करने के लिए नीति आयोग ने बड़े सुधारों का सुझाव दिया है. इसकी शुरुआत शहरों की नेतृत्व व्यवस्था को मजबूत बनाने से करने की बात कही गई है.
सबसे बड़ा सुझाव यह है कि मेयर का चुनाव सीधे जनता द्वारा हो और उसका कार्यकाल तय 5 साल का हो.
रिपोर्ट में कहा गया है, “सरकार के तीसरे स्तर को सच में मजबूत बनाने के लिए एक ऐसी एकजुट शहर प्रशासन व्यवस्था जरूरी है, जिसकी अगुवाई अधिकारों से लैस, सीधे चुने गए मेयर के हाथ में हो.” इससे मेयर को सीधा जनादेश मिलेगा और जवाबदेही भी साफ होगी.
5 साल के तय कार्यकाल की सिफारिश का समर्थन करते हुए आनंद अय्यर ने कहा कि बार-बार नेतृत्व बदलने से प्रशासन की निरंतरता प्रभावित होती है.
उन्होंने कहा, “अगर किसी कंपनी का CEO हर साल बदल दिया जाए, तो आप कैसे उम्मीद करेंगे कि वह कंपनी आगे बढ़ेगी?” उनका कहना था कि शहरों के प्रशासन को बेहतर बनाने और सेवाओं में सुधार के लिए स्थिर नेतृत्व और लंबा कार्यकाल जरूरी है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मेयर को प्रशासनिक अधिकार दिए जाएं और उन्हें “सिटी गवर्नमेंट का प्रमुख” बनाया जाए. नगर आयुक्त उनके अधीन काम करें.
शक्ति एक जगह केंद्रित न हो, इसके लिए रिपोर्ट में “मेयर-इन-काउंसिल” सिस्टम का सुझाव दिया गया है. इसके तहत चुने गए पार्षद पानी सप्लाई, ट्रांसपोर्ट और वित्त जैसे विभागों की निगरानी करेंगे.
रिपोर्ट का एक और बड़ा सुझाव यह है कि सरकारी एजेंसियों और सेवाएं देने वाली संस्थाओं को नगर निगम के नियंत्रण में लाया जाए. रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसी सभी एजेंसियां “नगर निगम के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करें”, ताकि प्रशासन और जवाबदेही एकजुट हो सके.
वित्तीय मामलों में नीति आयोग ने नगर निकायों की आमदनी बढ़ाने और फंड का नियमित प्रवाह सुनिश्चित करने पर जोर दिया है. रिपोर्ट में राज्य वित्त आयोग का समय पर गठन और उनकी सिफारिशों को सही तरीके से लागू करने की बात कही गई है.
रिपोर्ट में पानी सप्लाई, बस सेवा, सफाई व्यवस्था, ठोस कचरा प्रबंधन, फायर सर्विस और शहरी योजना जैसे अहम काम शहर सरकारों को सौंपने की भी सिफारिश की गई है, ताकि जिम्मेदारी और अधिकार दोनों एक साथ हों.
सुधारों की ज़रूरत को देखते हुए नीति आयोग ने शुरुआत देश के उन 47 शहरों से करने का सुझाव दिया है जिनकी आबादी 10 लाख से ज्यादा है. इन शहरों में देश की करीब एक-तिहाई शहरी आबादी रहती है और ये देश के कुल जीडीपी का लगभग 60 प्रतिशत योगदान देते हैं.
रिपोर्ट में आखिर में कहा गया है कि भारत के लंबे समय के विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए शहरी प्रशासन में सुधार बेहद जरूरी है.
रिपोर्ट में कहा गया है, “शहरी प्रशासन को मजबूत करना सिर्फ किसी एक क्षेत्र का सुधार नहीं है, बल्कि विकसित भारत @2047 के आर्थिक, सामाजिक और जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने की बुनियादी जरूरत है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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