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Saturday, 19 September, 2026
होमदेशयूपी की IAS दुर्गा शक्ति नागपाल फिर विवादों में, इस बार जज को ‘प्रभावित और डराने’ की कोशिश का आरोप

यूपी की IAS दुर्गा शक्ति नागपाल फिर विवादों में, इस बार जज को ‘प्रभावित और डराने’ की कोशिश का आरोप

दुर्गा शक्ति नागपाल अभी देवीपाटन की मंडलायुक्त हैं. एक सिविल जज ने आरोप लगाया है कि लंबित मामले को लेकर नागपाल ने उन्हें फोन किया था, जिसके बाद इलाहाबाद HC ने मामले का संज्ञान लिया.

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लखनऊ: भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) की अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल एक बार फिर विवादों में हैं. इस बार उन पर एक लंबित सिविल विवाद के मामले में न्यायिक अधिकारी को प्रभावित करने और डराने की कोशिश करने का आरोप लगा है.

2010 बैच की अधिकारी नागपाल अभी देवीपाटन की मंडलायुक्त हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच की नजर अब उन पर है. गोंडा की सिविल जज (सीनियर डिवीजन) शबीना खान ने आरोप लगाया है कि उत्तर प्रदेश कैडर की वरिष्ठ अधिकारी नागपाल ने उनके कोर्ट में लंबित एक मामले को लेकर उन्हें फोन किया था.

हाईकोर्ट ने कहा है कि पहली नजर में कथित बातचीत से ऐसा लगता है कि न्यायिक अधिकारी को प्रभावित करने की कोशिश की गई. कोर्ट ने नागपाल के व्यवहार को आपराधिक अवमानना से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाली अदालत के पास भेज दिया है.

जस्टिस सैयद कमर हसन रिजवी ने ये टिप्पणियां ज्योति विद्या मंदिर स्कूल और नगर पालिका परिषद, गोंडा के बीच 1997 से लंबित एक सिविल मुकदमे के ट्रांसफर से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान कीं.

यह विवाद नजूल जमीन के कई हिस्सों से जुड़ा है, जो देवीपाटन मंडल के कमिश्नर के नाम दर्ज हैं. नजूल जमीन सरकार की होती है और आमतौर पर इसे लीज पर दी गई जमीन के तौर पर मैनेज किया जाता है.

कोर्ट के सामने मंडलायुक्त की ओर से कहा गया कि यह जमीन ऑफिस की इमारत और दूसरे सरकारी कामों के लिए आरक्षित थी. आरोप है कि बाद में इस जमीन पर स्कूल की इमारत बना दी गई, जिसके बाद विवाद शुरू हुआ. यह मामला दो दशक से ज्यादा समय से सिविल कोर्ट में लंबित है.

मामला अभी सबूत पेश करने के चरण में है और इस पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश भी लागू है. स्कूल ने आरोप लगाया था कि राज्य के अधिकारी अपने पद का गलत इस्तेमाल कर कोर्ट पर अनुचित दबाव बना रहे हैं. स्कूल ने मामले को देवीपाटन मंडल से बाहर ट्रांसफर करने की मांग की थी.

आरोप

विवाद तब और बढ़ गया जब सिविल जज शबीना खान ने 15 जुलाई को नागपाल के साथ कथित फोन पर हुई बातचीत के बारे में कोर्ट को बताया.

सोशल मीडिया पर वायरल हुए अपने लिखित बयान में खान ने आरोप लगाया कि दुर्गा ने कहा, “मैं एक वरिष्ठ IAS अधिकारी हूं और आपने मेरा फोन नहीं उठाकर गलत व्यवहार किया है.” उन्होंने आगे कहा, “अच्छा हुआ आपने मुझसे बात कर ली, वरना मैं आपके खिलाफ हाईकोर्ट में शिकायत करने वाली थी.”

जस्टिस रिजवी ने कहा कि कथित बातचीत का लहजा और भाषा सीधे तौर पर यह दिखाती है कि कोर्ट की पीठासीन अधिकारी को प्रभावित करने की कोशिश की गई. हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि नागपाल ने फोन करने से इनकार नहीं किया है. कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि कोई मुकदमा लड़ने वाला पक्ष या राज्य किसी लंबित मामले को लेकर फोन पर कोर्ट से संपर्क कैसे कर सकता है.

कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में यह कथित व्यवहार न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला और न्याय दिलाने की प्रक्रिया में दखल है. सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का हवाला देते हुए, जिनमें न्यायिक मामलों में जजों को धमकाने या उन पर दबाव बनाने की कोशिशों को गंभीरता से लिया गया है, हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले पर आपराधिक अवमानना के तहत विचार किए जाने की ज़रूरत है.

कोर्ट ने निर्देश दिया कि मुख्य न्यायाधीश या संबंधित वरिष्ठ जज से ज़रूरी निर्देश लेने के बाद मामले को आपराधिक अवमानना से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाली उचित अदालत के सामने रखा जाए.

दिप्रिंट ने नागपाल से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क किया है. जवाब मिलने पर इस रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा.

पहले भी विवादों में रही हैं नागपाल

यह पहली बार नहीं है जब नागपाल किसी बड़े विवाद के केंद्र में आई हैं.

2013 में जब वह उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर जिले में सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) के पद पर तैनात थीं, तब उन्होंने यमुना और हिंडन नदियों के किनारे कथित अवैध बालू खनन के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी.

अवैध खनन के खिलाफ नागपाल की कार्रवाई, जिसमें छापेमारी और कथित तौर पर इसमें शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई भी शामिल थी, जुलाई 2013 में बड़ा विवाद बन गई. उस समय की अखिलेश यादव सरकार ने कादलपुर गांव में निर्माणाधीन मस्जिद की एक दीवार गिराए जाने के बाद उन्हें निलंबित कर दिया था. राज्य सरकार ने आरोप लगाया था कि उनकी कार्रवाई से धार्मिक ढांचे को लेकर कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब होने का खतरा पैदा हुआ.

हालांकि, नागपाल ने अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को स्वीकार नहीं किया था. उनके निलंबन के बाद यह बहस शुरू हो गई कि क्या सरकारी अधिकारियों को अपना काम करने के लिए राजनीतिक दबाव में निलंबित किया जा सकता है. यह विवाद उत्तर प्रदेश से बाहर भी फैल गया और राज्य सरकार के फैसले की काफी आलोचना हुई. केंद्र ने उत्तर प्रदेश सरकार से रिपोर्ट भी मांगी थी.

नागपाल ने अपनी कानूनी लड़ाई जारी रखी और अपने रुख पर कायम रहीं. बढ़ती आलोचना और जांच के बीच अखिलेश यादव सरकार ने अक्टूबर 2013 में उनका निलंबन वापस ले लिया.

2025 में भी वह उस समय सुर्खियों में आईं, जब नई दिल्ली स्थित इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट (IARI) ने उन्हें 1.63 करोड़ रुपये के नुकसान की भरपाई की मांग वाला नोटिस भेजा. IARI ने आरोप लगाया था कि नागपाल मई 2022 से फरवरी 2025 तक दिल्ली के पूसा कैंपस में Type VI-A सरकारी बंगले B-17 पर “अनधिकृत कब्जे” में रही थीं.

नागपाल ने कहा था कि उन्होंने अपने माता-पिता की खराब सेहत के कारण बंगला रखने के लिए समय बढ़ाने की मांग की थी. उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने किराया दिया था और आखिरकार फरवरी में बंगला खाली कर दिया. इसके बावजूद कुछ प्रक्रियाओं से जुड़ी औपचारिकताओं के कारण उन पर भारी जुर्माना लगाया गया है, जो व्यावहारिक नहीं है.

नागपाल को यह बंगला मार्च 2015 में दिया गया था, जब उन्हें तत्कालीन कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह के ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी (OSD) के तौर पर नियुक्त किया गया था. वह अप्रैल 2015 में बंगले में रहने लगी थीं और हर महीने किराया देती रहीं.

हालांकि, कृषि मंत्रालय में उनकी प्रतिनियुक्ति मई 2019 में खत्म हो गई. इसके बाद भी उन्होंने बंगले पर रहना जारी रखा. इस दौरान वह वाणिज्य मंत्रालय चली गईं और बाद में 2021 में उत्तर प्रदेश कैडर में वापस आ गईं. IARI ने उन्हें कई बार नोटिस देकर बंगला खाली करने को कहा, लेकिन उन्होंने फरवरी 2025 में ही बंगला खाली किया, जब संस्थान ने दिल्ली पुलिस से मदद मांगी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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