नई दिल्ली: जब सुप्रीम कोर्ट की दो जजों वाली बेंच ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत शरजील इमाम और उमर खालिद को जमानत देने से इनकार करने वाले पहले के अदालत के आदेश की आलोचना की, तब जमानत पर बहस ने एक बड़े मुद्दे को सामने ला दिया: एक ही विषय पर अलग-अलग अदालत की बेंचों के विरोधाभासी फैसले.
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और उज्जल भुइयां ने 18 मई को कहा कि जनवरी का फैसला 2021 के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम के.ए. नजीब मामले में तीन जजों वाली बड़ी सुप्रीम कोर्ट बेंच द्वारा तय सिद्धांतों से अलग था. उस फैसले में कहा गया था कि बिना ट्रायल के लंबे समय तक जेल में रहना, सख्त UAPA कानून के तहत भी जमानत का आधार बन सकता है.
न्यायिक अनुशासन के महत्व पर जोर देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि छोटी बेंचें बड़ी बेंचों के फैसलों का पालन करने के लिए बाध्य हैं और एक ही कानूनी सवाल पर सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग बेंचों द्वारा विरोधाभासी स्थिति लेने के खिलाफ चेतावनी दी.
कुछ दिनों बाद, जस्टिस अरविंद कुमार और पी.बी. वराले की सुप्रीम कोर्ट बेंच ने UAPA मामलों में लंबे समय तक जेल में रहने के आधार पर जमानत के मुद्दे को बड़ी बेंच के पास भेज दिया, लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न देने वाले आदेश के खिलाफ की गई “गंभीर टिप्पणियों” पर कोई जवाब नहीं दिया.
यह विरोधाभास उस बड़े रुझान को दिखाता है जिसे कुछ वकील और जज महसूस करते हैं: महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों पर समान स्तर की बेंचों के बीच बढ़ती खुली असहमति.
कानूनी विशेषज्ञ डॉ. अर्घ्य सेनगुप्ता, जो विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के संस्थापक और रिसर्च डायरेक्टर हैं, ने दिप्रिंट से कहा, “यह साफ तौर पर इस बात का परिणाम है कि जैसा कई बार कहा गया है, हमारे पास एक सुप्रीम कोर्ट नहीं है, बल्कि 17 सुप्रीम कोर्ट हैं.”
सेनगुप्ता ने कहा, “कुछ असंगतियां होना तय है. हमें हैरान नहीं होना चाहिए.”
उन्होंने दिप्रिंट से कहा कि ये असंगतियां अदालत की संरचना का अनुमानित परिणाम हैं.
34 जजों के साथ भारत का सुप्रीम कोर्ट दुनिया की सबसे बड़ी संवैधानिक अदालत है. इसके बाद जर्मनी का स्थान है, जहां 16 जज हैं.
साथ ही, भारतीय सुप्रीम कोर्ट सभी जजों के साथ एक साथ बैठकर मामले नहीं सुनता. आमतौर पर दो या कभी-कभी तीन जजों की बेंच बैठती है.
जब दो अलग-अलग दो जजों वाली बेंचों के फैसलों में टकराव होता है, तो विवादित कानूनी मुद्दे को समाधान के लिए तीन जजों वाली बेंच को भेजा जाता है.
ऐसी स्थिति में दिया गया फैसला आधिकारिक घोषणा बन जाता है, जिसका पालन छोटी बेंचों को करना होता है.
पांच या उससे अधिक जजों वाली बड़ी संविधान बेंचें उन बड़े संवैधानिक सवालों पर विचार करने के लिए बनाई जाती हैं जिनमें कानूनों की वैधता की जांच करनी होती है, खासकर तब जब उन पर संविधान की सीमाओं और नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने का आरोप हो.
अब तक की सबसे बड़ी बेंच 1973 के केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले में बनाई गई थी. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग बेंचें संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति की सीमा पर अलग-अलग फैसले दे चुकी थीं.
13 जजों वाली इस बेंच के सामने मामला शुरू में इस सवाल से जुड़ा था कि क्या राज्य किसी धार्मिक संस्था के प्रबंधन पर प्रतिबंध लगा सकता है.
लेकिन बाद में यह इस बड़े सवाल में बदल गया कि क्या संसद के पास संविधान में संशोधन करने की असीमित शक्ति है.
बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार है कि वह संविधान के “मूल ढाँचे” के खिलाफ जाने वाले संशोधनों को रद्द कर सकता है. यह सिद्धांत आज भारतीय संवैधानिक सोच की बुनियाद है.
सेनगुप्ता ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट को कभी भी इतनी सारी समान स्तर की बेंचों के रूप में काम करने के लिए नहीं बनाया गया था. जब इसकी शुरुआत हुई थी, तब सिर्फ एक बेंच थी. बाद में मामलों की संख्या बहुत बढ़ गई. यह कुछ हद तक अदालत के नियंत्रण से बाहर था, लेकिन कुछ हद तक अदालत ने खुद भी स्पेशल लीव पिटीशन लेकर इसे बढ़ाया.”
न्यायिक अनुशासन
सालों से सुप्रीम कोर्ट बार-बार कहता आया है कि न्यायिक अनुशासन के तहत समान शक्ति वाली बेंचों को पहले के फैसलों का पालन करना चाहिए या असहमति होने पर मामले को बड़ी बेंच के पास भेजना चाहिए.
2004 के सेंट्रल बोर्ड ऑफ दाऊदी बोहरा कम्युनिटी बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में संविधान बेंच ने कहा था कि समान स्तर की बेंच पहले की समान स्तर की बेंच के फैसले के खिलाफ नहीं जा सकती और उसे मामला बड़ी बेंच को भेजना होगा.
यह मामला समुदाय के नेता के सदस्यों को बहिष्कृत करने के अधिकार से जुड़ा था, जिसे 1962 के सरदार सैयदना ताहेर सैफुद्दीन साहब बनाम बॉम्बे राज्य मामले में पाँच जजों की बेंच ने सही माना था.
लेकिन उसके बाद कई छोटी बेंचों ने उस फैसले से अलग राय रखी, बिना मामले को बड़ी बेंच के पास भेजे. 2004 की बेंच ने कहा कि उन्हें ऐसा करना चाहिए था और मामले को बड़ी बेंच को भेज दिया. इस मामले की सुनवाई 2023 में शुरू हुई और अब भी लंबित है.
अदालत ने दाऊदी बोहरा कम्युनिटी मामले में तय सिद्धांत को कई राजनीतिक और संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण मामलों में लागू किया है.
2020 के पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह मामले में पांच जजों की बेंच ने 2004 के ई.वी. चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले के तर्क की आलोचना की. उस फैसले में कहा गया था कि राज्य अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण करके आरक्षण बाँट नहीं सकते.
फिर भी बेंच ने उसे सीधे पलट नहीं किया, बल्कि मामला सात जजों की बड़ी बेंच को भेज दिया. उस बड़ी बेंच ने 2024 में ई.वी. चिन्नैया फैसले को पलट दिया.
ऐसा ही एक मामला 2017 के के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ के नौ जजों वाले फैसले में दिखा, जिसमें अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना गया. यह नौ जजों की बेंच इसलिए बनाई गई क्योंकि पहले की छोटी बेंचें निजता के अधिकार पर अलग राय रख चुकी थीं.
पुट्टस्वामी फैसले में कई जजों ने 2013 के सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज़ फाउंडेशन मामले के तर्क पर सवाल उठाए. उस दो जजों वाली बेंच ने आईपीसी की धारा 377 को सही माना था, जो समलैंगिकता को अपराध बनाती थी.
फिर भी अदालत ने कौशल फैसले को औपचारिक रूप से रद्द नहीं किया क्योंकि उस पर सीधी चुनौती नहीं थी, जबकि कौशल बेंच छोटी थी.
एक साल बाद नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018) मामले में धारा 377 को रद्द कर समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया.
बेंचों के बीच अप्रत्यक्ष असहमति के सवालों ने अदालत के भीतर भी आलोचना पैदा की है.
2019 के कांतारू राजीवरु बनाम इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन मामले में पांच जजों की बेंच ने सबरीमाला मंदिर प्रवेश मामले पर 2018 के फैसले की समीक्षा याचिकाओं पर विचार किया.
उस 2018 के मामले में दूसरी पांच जजों की बेंच ने कहा था कि सबरीमाला मंदिर 10 से 50 साल की महिलाओं को प्रवेश से नहीं रोक सकता.
जस्टिस रोहिंटन नरीमन ने बहुमत की आलोचना की क्योंकि उन्होंने स्थापित प्रक्रिया अपनाए बिना पहले के सबरीमाला फैसले पर संदेह जताया.
मामला बाद में नौ जजों की बड़ी बेंच को भेजा गया, जिसने अभी तक फैसला सुरक्षित रखा है. लेकिन नरीमन का मानना था कि समीक्षा याचिकाओं पर विचार ही नहीं होना चाहिए था.
उन्होंने कहा, “किसी फैसले की ईमानदार आलोचना की जा सकती है, लेकिन सर्वोच्च अदालत के आदेशों को रोकने या लोगों को ऐसा करने के लिए प्रेरित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती.”
जस्टिस नागरत्ना ने भी हाल के वर्षों में बेंचों के बीच एकरूपता को लेकर चिंता जताई है.
2023 में, जब तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की बेंच ने गर्भपात मामले में उनकी बेंच के पहले के आदेश पर रोक लगाई, तब नागरत्ना ने “बेंच शॉपिंग” की कोशिशों की आलोचना की. उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट की हर बेंच ही सुप्रीम कोर्ट है.”
हाल ही में 2024 के प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन बनाम महाराष्ट्र राज्य फैसले में, जिसमें कहा गया कि राज्य हमेशा निजी संपत्ति को “सामुदायिक संसाधन” कहकर नहीं ले सकता, नागरत्ना ने अपने सहमति वाले फैसले में बहुमत द्वारा पुराने फैसलों की आलोचना करने के तरीके पर चिंता जताई.
इस फैसले ने 1980 के दशक के कई राष्ट्रीयकरण और संपत्ति जब्ती मामलों को पलट दिया, जैसे 1983 का संजीव कोक मैन्युफैक्चरिंग कंपनी बनाम भारत कोकिंग कोल लिमिटेड मामला.
नागरत्ना ने पूछा, “क्या हम सिर्फ अलग कानूनी व्याख्या के कारण पुराने जजों को दोषी ठहरा सकते हैं और उन पर ‘नुकसान’ करने का आरोप लगा सकते हैं?”
उन्होंने 2024 के मिनरल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया मामले में भी ऐसी ही चिंता जताई, जहाँ वे नौ जजों की बेंच में अकेली असहमत जज थीं.
बेंच ने कहा कि राज्य सरकारें रॉयल्टी के अलावा भी खनिज उत्खनन पर टैक्स लगा सकती हैं. इस फैसले में 1989 के इंडिया सीमेंट लिमिटेड बनाम तमिलनाडु राज्य मामले को पलट दिया गया, जिसमें सात जजों की बेंच ने उल्टा फैसला दिया था.
हालांकि यह बड़ी बेंच द्वारा छोटी बेंच का फैसला पलटने जैसा लग सकता है, लेकिन बहुमत ने वास्तव में 2004 के पश्चिम बंगाल राज्य बनाम केसोराम इंडस्ट्रीज लिमिटेड मामले पर भरोसा किया.
उस पाँच जजों वाली बेंच ने भी 1983 के सात जजों वाले संजीव कोक मैन्युफैक्चरिंग मामले से असहमति जताई थी. नागरत्ना ने कहा कि पांच जजों वाली बेंच को सात जजों वाली बेंच पर संदेह जताने का अधिकार नहीं था.
अपने असहमति वाले फैसले में उन्होंने कहा कि बड़ी बेंच के फैसले पर संदेह तभी किया जा सकता है जब उसमें “स्पष्ट गलती” या गंभीर दोष हो.
यानी दो या तीन जजों वाली बेंच पाँच जजों वाली बेंच के फैसले पर तब तक सवाल नहीं उठा सकती जब तक बड़ी बेंच ने साफ गलती न की हो. तब भी सही तरीका मामला सात जजों की संविधान बेंच को भेजना है.
वकील और कानूनी विशेषज्ञ तनवीर अहमद मीर का मानना है कि नागरत्ना की बार-बार की टिप्पणियाँ 2004 के दाऊदी बोहरा कम्युनिटी मामले में तय सिद्धांतों को मजबूत करने की कोशिश हैं.
इस मामले में अदालत ने साफ कहा था कि छोटी बेंच को बड़ी बेंच का पालन करना होगा और असहमति होने पर मामला बड़ी बेंच को भेजना होगा.
मीर ने नागरत्ना की इस बात से सहमति जताई कि उमर खालिद को जमानत देने से इनकार करने वाली दो जजों की बेंच को 2021 के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम के.ए. नजीब फैसले के खिलाफ नहीं जाना चाहिए था.
नजीब फैसले में कहा गया था कि अगर लंबे समय तक जेल में रखने से किसी आरोपी के त्वरित सुनवाई के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है, तो अदालत जमानत दे सकती है, चाहे मामला UAPA जैसे सख्त कानून से जुड़ा हो.
उन्होंने कहा, “सिर्फ तीन जजों वाली बेंच ही पहले की बेंच की समझदारी पर सवाल उठा सकती है.”
उन्होंने आगे कहा, “नागरत्ना यही कहती हैं और कानून भी यही है. अगर आपके मन में कोई टकराव था, तो आप मुख्य न्यायाधीश से पांच जजों की बेंच बनाने को कह सकते थे.”
ऐसी असंगतियां कई अन्य मामलों में भी दिखती हैं.
उदाहरण के लिए, 2020 के इंदौर डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम मनोहरलाल मामले में संविधान बेंच को 2014 के पुणे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन बनाम हरकचंद मिसिरिमल सोलंकी और 2018 के इंदौर डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम शैलेंद्र मामलों के विरोधाभासी फैसलों को स्पष्ट करना पड़ा.
यह मामला भूमि अधिग्रहण के मुआवजे से जुड़ा था. कानून के अनुसार, अगर सरकार पांच साल के भीतर भुगतान नहीं करती, तो अधिग्रहण रद्द हो सकता है.
2014 में तीन जजों की बेंच ने पुणे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन मामले में कहा था कि पैसा वास्तव में जमीन मालिकों तक पहुँचना चाहिए या कम से कम अदालत में जमा होना चाहिए. सिर्फ सरकार के खाते में जमा करना पर्याप्त नहीं है.
लेकिन 2018 में दूसरी तीन जजों वाली बेंच ने इंदौर डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम शैलेंद्र मामले में बिल्कुल उल्टा फैसला दिया और कहा कि सरकार के खाते में पैसा जमा करना ही काफी है.
आखिरकार 2020 में पांच जजों की बेंच ने फैसला दिया कि अगर पैसा सरकार के खाते में जमा है, तो उसे “भुगतान” माना जा सकता है. लेकिन इस बीच काफी भ्रम पैदा हो गया क्योंकि जमीन मालिक 2014 के फैसले के आधार पर अपनी जमीन वापस मांगने लगे थे.
2018 के जरनैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता फैसले को लेकर भी विवाद है. इस फैसले में कहा गया था कि एससी/एसटी समुदायों से आरक्षण के लिए उनकी “पिछड़ेपन” का सबूत नहीं मांगा जा सकता.
पांच जजों वाली बेंच ने 2006 के एम. नागराज बनाम भारत संघ फैसले को काफी कमजोर कर दिया था. उस पाँच जजों वाली बेंच ने सरकारी नौकरियों में एससी/एसटी आरक्षण लागू करने के लिए कुछ शर्तें लगाई थीं.
इससे हाई कोर्टों में आरक्षण मामलों को लेकर भ्रम पैदा हुआ. 2022 में सुप्रीम कोर्ट को दिशा-निर्देश जारी करने पड़े, जिसमें कहा गया कि सरकारी नौकरियों में एससी/एसटी प्रतिनिधित्व का मूल्यांकन पूरे विभाग के बजाय हर कैडर के आधार पर किया जाना चाहिए.
असंगतियां
मीर ने इन असंगतियों को “दुर्भाग्यपूर्ण” बताया.
उन्होंने कहा कि इससे निचली अदालतों के सामने गलत उदाहरण गया है: “अगर सुप्रीम कोर्ट खुद एकरूप नहीं रह सकता, तो आप हाई कोर्ट और जिला अदालतों से एकरूपता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?”
असंगति के मुद्दे खास तौर पर आपराधिक मामलों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में ज्यादा दिखाई दिए हैं.
यूएपीए के तहत जमानत कानून पर नागरत्ना की हालिया टिप्पणियां दिखाती हैं कि अलग-अलग बेंचों की अलग व्याख्याओं का असर उन विचाराधीन कैदियों पर पड़ सकता है जो ट्रायल से पहले लंबे समय तक जेल में रहते हैं.
सेनगुप्ता ने मृत्युदंड से जुड़े कानून पर सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग बेंचों के पुराने विरोधाभासों की ओर भी इशारा किया.
उन्होंने उस समय का उदाहरण दिया जब जस्टिस एस.बी. सिन्हा कई मौत की सजा को उम्रकैद में बदल रहे थे, जबकि उसी समय जस्टिस अरिजीत पसायत न सिर्फ कई मौत की सजाओं को बरकरार रख रहे थे बल्कि कुछ मामलों में उम्रकैद को मौत की सजा में भी बदल रहे थे. उन्होंने कहा कि न्यायिक दृष्टिकोण में ऐसे अंतर आरोपियों के लिए “जीवन और मृत्यु” का सवाल बन सकते हैं.
वकील और कानूनी विशेषज्ञ अभिनव सेखरी ने 2025 में अपने ब्लॉग में लिखा कि इस व्यवस्था में फँसे कई लोगों को लगता है कि वे “अनिश्चित कानून व्यवस्था” से जूझ रहे हैं, जहाँ फैसलों में एकरूपता एक दुर्लभ अपवाद है और सबसे साधारण मामला भी असुरक्षित लगता है.
अदालत के अपने पुराने फैसले बताते हैं कि ये तनाव पूरी तरह नए नहीं हैं. लेकिन हाल के वर्षों में जजों ने अदालत के आदेशों और सुनवाई के दौरान इस समस्या को खुलकर स्वीकार किया है.
सेनगुप्ता ने कहा, “अब इसकी रिपोर्टिंग ज्यादा होने लगी है, लेकिन यह समस्या नई नहीं है.”
इसके बाद की बहस सिर्फ संवैधानिक असहमतियों के विषय तक सीमित नहीं रही, बल्कि इस बात पर भी केंद्रित रही कि ऐसी असहमतियों को संस्थागत स्तर पर कैसे सुलझाया जाए.
सेनगुप्ता का कहना था कि पहला कदम “असंगति को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उसे कम करना” होना चाहिए.
विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी द्वारा सुझाए गए सुधारों में सुप्रीम कोर्ट को तीन हिस्सों में बाँटना शामिल है: प्रवेश विभाग, अपीलीय विभाग और संवैधानिक विभाग. इससे यह सुनिश्चित होगा कि संवैधानिक सवालों की सुनवाई ऐसी बेंचें करें जिन्हें अधिकारिक और एकरूप फैसले देने की विशेष जिम्मेदारी दी गई हो.
लेकिन फिलहाल, संरचनात्मक सुधारों के ये सभी प्रस्ताव केवल सैद्धांतिक हैं.
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