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Tuesday, 28 July, 2026
होमदेशCJP प्रदर्शन: ‘बिना आईडी वाले पुलिसवालों’ से पिटाई का आरोप, IIT छात्रा ने किया सुप्रीम कोर्ट का रुख

CJP प्रदर्शन: ‘बिना आईडी वाले पुलिसवालों’ से पिटाई का आरोप, IIT छात्रा ने किया सुप्रीम कोर्ट का रुख

तोशिबा यादव ने बड़ी याचिका के साथ अंतरिम आवेदन दायर किया है. उनका आरोप है कि बिना नेमप्लेट और पहचान पत्र वाले पुलिसकर्मियों ने उनके साथ मारपीट की.

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नई दिल्ली: 20 जुलाई को दिल्ली में छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई में घायल हुईं 27-वर्षीय आईआईटी पटना की छात्रा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. उन्होंने सिर्फ अपने लिए न्याय नहीं मांगा है, बल्कि यह भी मांग की है कि भविष्य में सरकार और पुलिस सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शनों से कैसे निपटें, इसके लिए स्पष्ट नियम बनाए जाएं.

तोशिबा यादव ने अपनी अंतरिम याचिका (Interlocutory Application-IA) में बताया है कि प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों ने उनके साथ बेरहमी से मारपीट की. यह याचिका उस बड़ी याचिका के साथ सुनी जाएगी, जिसमें प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर कथित पुलिस हिंसा की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है.

उत्तर प्रदेश के औरैया जिले की रहने वाली तोशिबा यादव फिलहाल आईआईटी पटना से एमबीए कर रही हैं. उन्होंने अपनी याचिका में कहा है कि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के ‘चलो संसद’ मार्च से लौटते समय उन पर पुलिसकर्मियों ने हमला किया. उनका आरोप है कि पुलिसकर्मी वर्दी में थे, लेकिन उनके नाम की पट्टी (नेमप्लेट) या पहचान पत्र (आईडी बैज) नहीं लगा था.

उन्होंने बताया कि इस हमले में उनके सिर पर करीब 3×3 सेंटीमीटर का गहरा घाव हुआ. उन्हें तुरंत इलाज के लिए लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज ले जाया गया, जहां उनके सिर पर टांके लगाए गए.

तोशिबा ने अपनी मेडिकल रिपोर्ट और चोटों की तस्वीरें भी कोर्ट में जमा की हैं. उनका कहना है कि ये सबूत दिखाते हैं कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे निहत्थे युवाओं के साथ गंभीर शारीरिक हिंसा की गई.

वकील नेहा राठी के जरिए दाखिल इस याचिका में तोशिबा सिर्फ अपने लिए न्याय नहीं मांग रही हैं. उन्होंने मांग की है कि सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शनों से निपटने के तरीके में बड़े संस्थागत सुधार किए जाएं.

उनका कहना है कि पुलिस ने जिस तरह पैलेट गन, शॉक बैटन और कील लगी लाठियों का इस्तेमाल किया, वह पूरी तरह गलत था और इससे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले गरिमा और शारीरिक सुरक्षा के अधिकार का उल्लंघन हुआ.

याचिका में यह भी कहा गया है कि सादे कपड़ों में और बिना पहचान वाले पुलिसकर्मियों का लाठीचार्ज में शामिल होना बेहद चिंताजनक है. उनके मुताबिक, ऐसा जवाबदेही से बचने के लिए किया जाता है.

याचिका में कहा गया है, “पुलिस को शांत, संयमित और ज़रूरत के हिसाब से कार्रवाई करनी चाहिए थी, लेकिन इसके बजाय उसने प्रदर्शन कर रहे लोगों पर बल प्रयोग किया.”

तोशिबा का कहना है कि पुलिस की कथित हिंसा सिर्फ लाठीचार्ज तक सीमित नहीं थी. उनका आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने महिला प्रदर्शनकारियों और छोटे बच्चों को गोद में लेकर चल रही महिलाओं के साथ भी वह संवेदनशीलता नहीं दिखाई, जिसकी उनसे उम्मीद की जाती है.

उन्होंने कई वीडियो और तस्वीरों का हवाला दिया है, जिनमें कथित तौर पर महिला प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट और उत्पीड़न दिखाया गया है. याचिका में कहा गया है कि कुछ वीडियो में पुलिसकर्मी महिलाओं के शरीर के निजी और संवेदनशील हिस्सों पर लाठियां मारते हुए भी दिखाई देते हैं.

याचिका में कहा गया है, “ऐसा व्यवहार पूरी तरह निंदनीय है. यह महिला प्रदर्शनकारियों की गरिमा, शारीरिक सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गंभीर हमला है.”

याचिका में आगे कहा गया है कि महिलाओं के खिलाफ इस तरह अंधाधुंध बल प्रयोग, खासकर उनके निजी अंगों को निशाना बनाना, भीड़ नियंत्रण या कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर सही नहीं ठहराया जा सकता. इससे पुलिस कार्रवाई की वैधता, ज़रूरत और उसकी सीमा पर गंभीर सवाल उठते हैं.

तोशिबा ने कहा है कि महिलाओं और छोटे बच्चों को गोद में लिए लोगों के खिलाफ इस तरह बल प्रयोग कानून के मुताबिक किसी भी तरह उचित नहीं है. यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले गरिमा, शारीरिक सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार पर सीधा हमला है.

उन्होंने कहा कि ऐसी कार्रवाई को “भीड़ नियंत्रण” का नाम देकर सही नहीं ठहराया जा सकता. यह पुलिस की शक्ति का मनमाना और ज़रूरत से कहीं ज्यादा इस्तेमाल है.

5 सुरक्षा उपायों वाला SoP

ऐसी हिंसा को दोबारा होने से रोकने के लिए यादव ने सुप्रीम कोर्ट को एक जैसा स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) के तौर पर पांच खास सुरक्षा उपायों का एक सेट सुझाया है, जो भीड़ को कंट्रोल करने के लिए नियमों का एक ऐसा सेट होगा जो लोगों को आसानी से समझ में आएगा, जो संयम और बराबरी के सिद्धांतों पर आधारित होगा.

इनमें सभी लोगों के लिए पहचान की एक सख्त ज़रूरत शामिल है–तैनाती के दौरान दिखने वाली नेम प्लेट, रैंक बैज और आईडी नंबर पहनना.

तुरंत मेडिकल मदद, जिससे यह पक्का हो सके कि पुलिस कार्रवाई से घायल हर व्यक्ति को डॉक्यूमेंटेड मेडिकल जांच और मदद मिले. ज़रूरी रिपोर्टिंग, जिसके लिए अधिकारियों को किसी भी तरह के बल प्रयोग को सही ठहराते हुए डिटेल्ड रिपोर्ट जमा करनी होगी, जिसमें शामिल लोगों की पहचान भी शामिल होगी. और पुलिस को समय-समय पर बल प्रयोग की कानूनी सीमाओं और “सेंसिटिव पुलिसिंग” पर खास ट्रेनिंग दी जाएगी.

आखिरकार, यादव चाहती हैं कि कोर्ट यह माने कि सरकारी नीतियों से असहमति राज्य द्वारा “बेवजह क्रूरता” को सही नहीं ठहराती. वह यह पक्का करना चाहती हैं कि विरोध करने का अधिकार, जिसे आर्टिकल 19 के तहत सुरक्षा मिली है, भारत की लोकतांत्रिक नींव का एक मज़बूत हिस्सा बना रहे, जो राज्य द्वारा प्रायोजित मनमानी हिंसा के खतरे से मुक्त हो.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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