इंदौर, 27 अप्रैल (भाषा) मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में एक हस्तक्षेपकर्ता ने भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद विवाद को लेकर हिंदू पक्ष की दो जनहित याचिकाओं की स्वीकार्यता पर सवाल उठाते हुए सोमवार को दावा किया कि इनमें 11वीं सदी के संरक्षित स्मारक पर मालिकाना हक प्रदान करने की गुहार की गई है।
हस्तक्षेपकर्ता ने दलील दी कि चूंकि किसी संपत्ति पर मालिकाना हक से जुड़े विवादों का निपटारा पहले दीवानी अदालतों में किया जाता है, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर इन जनहित याचिकाओं के बूते सीधे उच्च न्यायालय में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
यह अनुच्छेद उच्च न्यायालयों को लोगों के मौलिक अधिकारों और अन्य कानूनी अधिकारों के मामलों में अलग-अलग रिट (औपचारिक आदेश) जारी करने की शक्ति देता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मेनन ने मुनीर अहमद और मुस्लिम समुदाय के अन्य लोगों के हस्तक्षेप आवेदन के पक्ष में उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी के सामने विस्तृत दलीलें पेश कीं।
उन्होंने भोजशाला मामले में ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ नामक संगठन और कुलदीप तिवारी व एक अन्य व्यक्ति की दायर दो जनहित याचिकाओं पर सवाल उठाए। मेनन ने कहा कि दोनों याचिकाएं एक समान हैं और याचिकाकर्ताओं की मुख्य गुहार यही है कि धार के विवादित स्मारक में केवल हिंदुओं को पूजा का अधिकार मिलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इस गुहार का वस्तुत: यही मतलब है कि याचिकाकर्ताओं को विवादित स्मारक का मालिक घोषित किया जाए।
मेनन ने कहा कि याचिकाकर्ता अपने अधिकार तय किए जाने की बात कर रहे हैं और वे एक ट्रस्ट बनाए जाने की गुहार करते हुए विवादित स्मारक का मालिकाना हक चाह रहे हैं, इसलिए कानूनी प्रावधानों के मुताबिक उनका मुकदमा जनहित याचिका के तौर पर नहीं चलाया जा सकता।
उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसे मुकदमे मूलत: दीवानी अदालतों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और उच्च न्यायालय की रिट कार्यवाही में उन पर फैसला नहीं किया जा सकता। वरिष्ठ अधिवक्ता ने याचिकाकर्ताओं के जनहित याचिका दायर करने के अधिकार पर भी सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया कि किसी व्यक्ति द्वारा उसके ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ होने का दावा भर कर देना जनहित याचिका दायर करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
मेनन ने कहा कि जनहित याचिकाओं के मामलों में अदालतों ने याचिकाकर्ताओं की ओर से गरीब व वंचित वर्गों की सेवा और नेक इरादे के सबूत प्रस्तुत किए जाने पर हमेशा जोर दिया है।
हस्तक्षेपकर्ता की ओर से उच्च न्यायालय में यह दावा भी किया गया कि गुजरे वर्षों में भोजशाला मामले को लेकर दायर मुकदमों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और सरकार द्वारा इस स्मारक की प्रकृति को लेकर अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग जवाब पेश किए गए हैं।
सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सुनील कुमार जैन ने अदालत को बताया कि एएसआई ने भोजशाला परिसर के वैज्ञानिक सर्वेक्षण की वीडियोग्राफी के फुटेज की सीलबंद हार्ड ड्राइव अदालत में प्रस्तुत कर दी है।
उन्होंने बताया कि उच्च न्यायालय के आदेश के मुताबिक यह फुटेज अदालत के एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी अपलोड कर दिया गया है और प्रतिवादियों में शामिल धार की मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी के वकील को इसे देखने की सुविधा प्रदान की गई है।
भोजशाला मामले में अदालत में सुनवाई मंगलवार को भी जारी रहेगी।
उच्च न्यायालय इस स्मारक के धार्मिक स्वरूप के विवाद को लेकर दायर चार याचिकाओं और एक रिट अपील पर छह अप्रैल से नियमित सुनवाई कर रहा है।
भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह विवादित परिसर एएसआई द्वारा संरक्षित है।
भाषा हर्ष रंजन वैभव
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