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Friday, 18 September, 2026
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काशी मठ विवाद: यह कोई आम गुरु बनाम शिष्य की अदालत की लड़ाई नहीं है

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने उत्तराधिकारी संयमींद्र तीर्थ के लिए एर्नाकुलम अदालत में पवित्र कीमती सामान वापस लेने की कार्रवाई आगे बढ़ाने का रास्ता साफ कर दिया.

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नई दिल्ली: दो दशक से ज्यादा समय से केरल का श्री काशी मठ संस्थान एक जटिल कानूनी विवाद में फंसा हुआ है. यह विवाद गुरु सुधींद्र तीर्थ और उनके शिष्य राघवेंद्र तीर्थ के पवित्र गुरु-शिष्य संबंध से शुरू हुआ और बाद में इस बात को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई में बदल गया कि मठ का सही प्रमुख कौन है और पवित्र कीमती सामान वापस कैसे हासिल किया जाए.

यह मामला 2000 में शुरू हुआ, जब उस समय मठ से निकाले जा चुके राघवेंद्र तीर्थ ने तिरुपति की एक अदालत में खुद को ‘मठाधिपति’ बताते हुए अपना दावा पेश किया, लेकिन वह केस हार गए. एक दशक बाद वह एक और अदालत के मामले में फंस गए. इस बार सुधींद्र तीर्थ ने केरल की एर्नाकुलम अदालत में मठ का सोना और दूसरी कीमती चीजें वापस लेने के लिए कार्रवाई शुरू की. ये चीजें राघवेंद्र तीर्थ के पास थीं.

मुकदमेबाजी का तीसरा दौर 2017 में सुधींद्र तीर्थ के समाधि लेने के बाद शुरू हुआ. राघवेंद्र तीर्थ ने उस समय आपत्ति जताई, जब सुधींद्र तीर्थ के उत्तराधिकारी बने संत ने एर्नाकुलम अदालत से उन्हें कार्रवाई में एक पक्ष के रूप में शामिल करने की मांग की. स्वामी संयमींद्र तीर्थ ने ‘मठाधिपति’ के पद पर उत्तराधिकारी होने का दावा किया और इसके साथ ही अपने गुरु सुधींद्र तीर्थ से जुड़े अधिकारों पर भी अपना दावा किया.

हालांकि, राघवेंद्र तीर्थ ने नए मठाधिपति की मांग पर आपत्ति जताई और कहा कि इस मामले पर फैसला करने का अधिकार एर्नाकुलम अदालत के पास नहीं है. उनके अनुसार, कार्रवाई में पक्ष बनने से पहले संयमींद्र तीर्थ को तिरुपति अदालत की अनुमति लेनी होगी. इसी अदालत ने यह तय किया था कि मठ का सही मठाधिपति कौन है.

जहां एर्नाकुलम अदालत ने राघवेंद्र तीर्थ के पक्ष में फैसला दिया, वहीं केरल हाई कोर्ट ने उनके खिलाफ फैसला सुनाया. इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.

मंगलवार को जस्टिस अरविंद कुमार की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने स्वामी संयमींद्र तीर्थ के लिए एर्नाकुलम अदालत में कार्रवाई आगे बढ़ाने का रास्ता साफ कर दिया. बेंच ने केरल हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा और कार्रवाई में डिक्री-धारक के रूप में संयमींद्र तीर्थ को शामिल करने की अनुमति दी.

सुप्रीम कोर्ट में संयमींद्र तीर्थ की ओर से पेश हुए वकीलों ने दिप्रिंट को बताया कि अब उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश से 2009 से एर्नाकुलम अदालत में लंबित कार्रवाई तेज़ी से आगे बढ़ेगी.

अधिवक्ता लक्ष्मीश एस. कामथ ने कहा, “इस बात को लेकर मुकदमे के कारण कार्रवाई रुक गई थी कि संयमींद्र तीर्थ को उस मामले में याचिकाकर्ता बनाए जाने से पहले तिरुपति अदालत से अनुमति लेनी होगी या नहीं. सुप्रीम कोर्ट के हमारे पक्ष में फैसले के बाद एर्नाकुलम अदालत में कार्रवाई फिर से शुरू होगी.”

काशी मठ विवाद कैसे शुरू हुआ

इस कानूनी लड़ाई की शुरुआत मठ के प्रमुख और उसके प्रशासन को लेकर हुए विवाद से हुई. परंपरा के अनुसार, मठाधिपति का पद उस शिष्य को मिलता है, जिसे मौजूदा गुरु कई बातों को देखकर चुनते हैं. इनमें कुंडली देखना और ‘दैवीनिश्चय’ (भगवान की इच्छा) हासिल करना शामिल है.

1994 में मठाधिपति ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में राघवेंद्र तीर्थ को कुछ मूर्तियां, आभूषण और दूसरी चीजें सौंप दी थीं.

दोनों के बीच मतभेद होने के बाद राघवेंद्र तीर्थ को 2000 में मठ से निकाल दिया गया. इसके बाद काशी मठ के सही मठाधिपति को लेकर विवाद शुरू हो गया. इसके तुरंत बाद राघवेंद्र तीर्थ ने तिरुपति की अदालत में मुकदमा दायर किया. उन्होंने मांग की कि यह घोषित किया जाए कि वह श्री काशी मठ संस्थान के कानूनी रूप से 21वें मठाधिपति हैं. उन्होंने यह भी मांग की कि उनके गुरु को मठ के कामकाज और प्रशासन में दखल देने से स्थायी रूप से रोका जाए.

28 जनवरी 2009 को यह मुकदमा खारिज कर दिया गया और राघवेंद्र तीर्थ को मठ के प्रशासन में दखल देने से स्थायी रूप से रोक दिया गया. इस आदेश के जरिए उन्हें मठाधिपति को संस्थान की सभी मूर्तियां, धार्मिक सामान और दूसरी संपत्तियां खुद सौंपने का भी निर्देश दिया गया. इसलिए सुधींद्र तीर्थ के उत्तराधिकारी के रूप में उनके पास मौजूद सभी धार्मिक सामान वापस करना उनकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी थी. जून 2015 के एक आदेश में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने राघवेंद्र की अपील खारिज कर दी और निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा.

इस बीच, 2009 में सुधींद्र तीर्थ ने तिरुपति की निचली अदालत में फैसले को लागू कराने के लिए कार्रवाई शुरू की. यह कार्रवाई राघवेंद्र तीर्थ के खिलाफ थी. राघवेंद्र तीर्थ ने यह कहते हुए आपत्ति की कि वह अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर रह रहे हैं. 2011 में यह कार्रवाई एर्नाकुलम अदालत में भेज दी गई. राघवेंद्र तीर्थ ने इसे भी चुनौती दी, लेकिन हाई कोर्ट में हार गए.

बाद में राघवेंद्र तीर्थ ने कार्रवाई की याचिका पर अपनी आपत्तियां दाखिल कीं. इन्हें भी निचली अदालत और हाई कोर्ट दोनों ने खारिज कर दिया.

आखिर में सुधींद्र तीर्थ ने फैसले को लागू कराने में पुलिस की मदद के लिए निचली अदालत से अनुरोध किया. इस मांग को खारिज कर दिया गया, लेकिन अपील के बाद हाई कोर्ट ने इसकी अनुमति दे दी. इसके बाद की कार्रवाई में जांच की जिम्मेदारी सीबीआई को सौंप दी गई.

2017 में सुधींद्र तीर्थ ने समाधि ले ली. इसके बाद अगले मठाधिपति के रूप में नामित संयमींद्र तीर्थ ने राघवेंद्र तीर्थ के खिलाफ कार्रवाई को आगे बढ़ाने की कोशिश की.

राघवेंद्र तीर्थ की आपत्ति के बाद 2019 में एर्नाकुलम की निचली अदालत ने नए मठाधिपति से कहा कि वह कार्रवाई में पक्ष बनने के लिए तिरुपति अदालत से अनुमति लें.

हालांकि, पिछले महीने हाई कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया. हाई कोर्ट ने कहा कि संयमींद्र तीर्थ को अदालत से किसी तरह की जगह लेने या मान्यता लेने के बिना ही कार्रवाई में शामिल होने का अधिकार है.

अपने आदेश में हाई कोर्ट ने राघवेंद्र तीर्थ को जानबूझकर अपना पता छिपाने और फैसले को लागू कराने की प्रक्रिया में रुकावट डालने के लिए फटकार लगाई. कोर्ट ने एक पुराने मामले में उन्हें “पता न चलने वाले स्वामीजी” तक कहा था, जो खुद को कानून की प्रक्रिया से दूर रख रहे थे. हाई कोर्ट को सीबीआई से उनका पता लगाने के लिए कहना पड़ा.

हाई कोर्ट ने कहा कि उसे यह बात अजीब लगी कि एक पुराने “शिष्य”, जिसे मठ से जुड़े सभी अधिकारों और जिम्मेदारियों से हटा दिया गया है, वह अपने ही गुरु के “शिष्य” की जिम्मेदारियों का विरोध कर रहा है. कोर्ट के अनुसार, वह शिष्य अपने सम्मानित गुरु की इच्छा पूरी करने की कोशिश कर रहा है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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