Sunday, 3 July, 2022
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10 राजनैतिक घटनाक्रम जिसने इस दशक की राजनीति को बदल दिया

50 सालों तक राजनीति को मथने वाले राजनीति के बड़े किरदार वाजपेयी-करूणानिधि-जयललिता-बालासाहब ठाकरे जैसी शख्सियत राजनैतिक खालीपन पैदा कर गए वहीं जगन मोहन रेड्डी जैसे नए क्षेत्रीय क्षत्रप राजनीति में उभरे.

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जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 का खत्म होना, 600 सालों से चले आ रहे अयोध्या मसले का हल निकल जाना, 35 सालों के बाद प्रचंड बहुमत के साथ देश के राजनीतिक क्षितिज पर मोदी का छा जाना, 2019 को राजनैतिक घटनाक्रम के हिसाब से इस दशक का सबसे महत्वपूर्ण साल बनाता है, पर सिर्फ इन घटनाओं ने इस इस दशक के राजनैतिक परिदृश्य को बदला हो ऐसा नहीं है. इस दशक में देश की राजनीति को चलाने वाली वामपंथी पार्टियां बेअसर हो गई. 50 सालों तक राजनीति को मथने वाले राजनीति के बड़े किरदार वाजपेयी-करूणानिधि-जयललिता-बालासाहब ठाकरे जैसी शख्सियत राजनैतिक खालीपन पैदा कर गए, जगन मोहन रेड्डी जैसे नए क्षेत्रीय क्षत्रप राजनीति में उभरे तो सिलसिलेवार तरीके से नज़र डालते हैं इस दशक के बड़े राजनैतिक घटनाक्रम पर.

मोदी का राजनेता से कल्ट में तब्दील हो जाना, करिश्माई नेतृत्व की वापसी

2014 में मोदी का गुजरात से आकर राष्ट्रीय राजनीति पर छा जाना इस दशक की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में एक है. मोदी का राजनेता से कल्ट बन जाना इंदिरा के बाद दूसरा ऐसा उदाहरण है, जब पार्टियां गौण हो जाए और मतदाता केवल मोदी को हराने या जिताने के नाम पर वोट करें. मोदी पार्टी भी हो जाए और पार्टी का सिंबल भी. द्रविड़ राजनीति की कल्ट अवधारणा मोदी ने उत्तर भारत की राजनीति में पैदा कर दी. नमो टीवी, नमो टी-शर्ट, मोदीकट जैकेट से लेकर मर्चेनडाईजर की पूरी लिस्ट मोदी के नाम पर बिकने लगी. मोदी इस दशक के सबसे ध्रुवीकरण करने वाले शख़्सियत बनकर उभरे. जनधन, उज्ज्वला के ज़रिये मोदी के कल्ट का जादू यह रहा कि नोटबंदी के बाद भी जनता ने यूपी चुनाव में मोदी को दिल खोलकर वोट किया.

गठबंधन की राजनीति का अंत, बीजेपी युग का विस्तार

2014 के लोकसभा चुनाव में यूपीए की हार और 30 साल के बाद बीजेपी का अकेले दम पर 282 सीट लाकर गठबंधन की राजनीति को अप्रासंगिक बना दिया. पांच साल बाद भी मोदी के नेतृत्व में बीजेपी पर एंटी इनकम्बेंसी हावी नहीं हुई और बीजेपी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 2014 के जनादेश को पार करते हुए अकेले दम पर 303 सीटें पाई. एनडीए को मिला दें तो 350 सीटें से ज्यादा सीटें. यह दशक बीजेपी के विस्तार का दशक रहा.

2014 में महज 7 राज्यों में सरकार बनाने वाली बीजेपी 2018 के आते आते 21 राज्यों पर उसका शासन था. इसी दौर में बीजेपी ने उत्तर पूर्व के राज्य असम, अरूणाचल, मणिपुर और त्रिपुरा से लेकर जम्मू-कश्मीर तक में सरकारें चलाई.

हिन्दुत्व की जगह राष्ट्रवाद ने ले ली और मोदी-शाह की जोड़ी ने बीजेपी को 19 करोड़ सदस्यों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बना दिया.

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कांग्रेस के दबदबे का अंत

2004 से 2014, दस साल तक यूपीए 1 और यूपीए 2 में सत्ता के केन्द्र में रहने वाली कांग्रेस 2014 में अपने सबसे खराब प्रदर्शन करते हुए 44 सीटों पर आकर टिक गई. कांग्रेस इतनी संख्या भी नहीं जुटा पाई कि वे विपक्ष के नेता का पद हासिल कर सके. पांच साल बाद भी कांग्रेस तीन अंकों में नहीं पहुंच सकी और महज आठ सीटें हीं बढ़ाकर 52 सीटों तक ही पहुंच पाई. पचास सालों तक देश की सत्ता पर क़ाबिज़ रहने वाली कांग्रेस पचास सीटों पर सिमट गई.


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वामपंथ का अप्रांसगिक होना

35 सालों तक पश्चिम बंगाल में सत्ता पर क़ाबिज़ रहने वाली वामपंथी पार्टियों का राज्य और राष्ट्रीय फलक से अप्रासंगिक हो जाना इस सदी की बड़ी घटनाओं में एक है. किसी ने सोचा नहीं होगा कि देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री बनवाने वाले हरकिशन सिंह सुरजीत और प्रधानमंत्री पद लेने से मना करने वाले ज्योति बसु की पार्टी का हाल यह हो जाएगा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में लेफ़्ट 5 सीटों पर सिमट जाएगी. जिस पश्चिम बंगाल में वामपंथ ने 35 साल राज किया वहां एक भी लोकसभा की सीट नहीं जीत पाई, बंगाल में महज 6 प्रतिशत वोट पर लेफ़्ट सिमट गया. ममता बनर्जी ने अकेले दम पर लेफ़्ट का किला ढहा दिया.

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर केजरीवाल का आना

दशक की शुरूआत में एक तरफ वामपंथ विदा ले रहा था. ममता का पश्चिम बंगाल में आगमन हो रहा था. यूपीए सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी थी. अपने कार्यकाल के आधे समय में ही मनमोहन सिंह सरकार के मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे थे. अन्ना हज़ारे भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल के गठन के लिए बड़े राष्ट्रीय आंदोलन के साथ मैदान में थे. अन्ना के आंदोलन की रीढ़ थे आईएआरस ऑफिसर अरविन्द केजरीवाल.

आंदोलन चरम पर पहुंच चुका था, दिल्ली विधानसभा का चुनाव सामने था. केजरीवाल ने आंदोलन की जगह राजनीति को चुना और भ्रष्टाचार के खिलाफ जन-आंदोलन से केजरीवाल के रूप में एक नए राजनेता और आप के रूप में नई राजनीतिक पार्टी का जन्म हुआ, जिसे अपने बेस्ट फ़ार्म में रहते हुए मोदी सारे राज्यों में क्षत्रपों को हराने के बाद भी केजरीवाल को दिल्ली में परास्त नहीं कर सके.

द्रविड़ राजनीति से जयललिता और करूणानिधि का जाना

2016 में जयललिता की असामयिक मौत के बाद 2018 में करूणानिधि की मौत ने द्रविड़ राजनीति से कल्ट युग का ख़ात्मा कर दिया. 70 साल तक द्रविड़ राजनीति के केन्द्र में रहे करूणानिधि का जाना दक्षिण की राजनीति में वैसा ख़ालीपन पैदा कर गया जो स्टालिन और पनालीस्वामी भर नहीं सकते. पांच बार मुख्यमंत्री रहे करूणानिधि ने अपने जीवन में 13 चुनाव जीते और तीन बार बर्खास्त होने वाले मुख्यमंत्री बने पर सही समय पर राष्ट्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन कर राष्ट्रीय पार्टियों को अपने राज्य में समेट दिया.

एमजीआर की मौत के बाद एआईडीएमके की कमान संभालने वाली अम्मा तमिलनाडु की राजनीति में आते ही छा गई. 14 सालों तक मुख्यमंत्री रही जयललिता सबसे ज्यादा समय तक राज्य की बागडोर संभालने वाली महिला राजनेता बनी पर द्रविड़ राजनीति से दो आइकॉन का चले जाना तमिलनाडु की राजनीति में ख़ालीपन पैदा कर गया.


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नए क्षत्रपों का उदय

एक तरफ मुलायम-लालू जैसे पुराने क्षत्रप नेपथ्य में जा रहे थे तो जगन रेड्डी, चंद्रशेखर राव जैसे नए क्षत्रपों का उदय हो रहा था. राजशेखर रेड्डी के हेलीकाप्टर हादसे में मौत के बाद जगन को 10 साल लग गए अपनी राजनैतिक विरासत पाने में जब 2019 के चुनाव में जगन ने चंद्रबाबू नायडू और कांग्रेस को निपटाते हुए विधानसभा और लोकसभा दोनो में क़ब्ज़ा जमाया. जगन के पिता की मौत के बाद 2009 में विधायकों की पहली पसंद होने के कारण मुख्यमंत्री बन सकते थे. लेकिन, कांग्रेस की दिल्ली लॉबी ने उन्हें मुख्यमंत्री बनने नहीं दिया और इस तरह एक नए क्षत्रप का जन्म हुआ. ऐसा ही कुछ तेलंगाना में हुआ. राज्य विभाजित करने के बाद भी कांग्रेस को न आंध्रप्रदेश में सत्ता मिली न तेलंगाना में. केसीआर ने तेलांगाना की गद्दी संभाल ली.

 अनुच्छेद 370 का जम्मू कश्मीर से हटना

इस दशक के अंत में जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 का हट जाना, जम्मू कश्मीर से लद्दाख का अलग होना और कश्मीर में बीजेपी-पीडीपी की सरकार बनना कुछ ऐसे प्रयोग हुए, जो कश्मीर की राजनीति में भारी उलट पुलट करने वाले बदलाव रहे. 50 साल से ज्यादा दो प्रधान दो निशान के खिलाफ आंदोलन चलाने वाली बीजेपी ने भारी बहुमत हासिल करते ही कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म कर पूरी दुनिया को चौका दिया. सैकड़ों राजनेता राजनीतिक बंदी बनाए गए लेकिन, अनुच्छेद 370 का हटना कश्मीर को लेकर एक नई तरह की राजनीति की शुरूआत मानी गई.


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अयोध्या विवाद का अंत

600 सालों तक हिन्दू और मुसलमानों के बीच विवाद का केन्द्र रहे अयोध्या विवाद का हल सुप्रीम कोर्ट से निकल जाएगा इस दशक के बड़े चमत्कार से कम नहीं है. बाबरी मस्जिद का गिराया जाना अगर 1990 के दशक की त्रासदी थी तो बिना किसी विवाद और हिंसा के न्यायालय का फैसले से विवाद का सुलटना नए दशक के लिए एक बड़ी उम्मीद की किरण लेकर आया.

राजनीति में नई जेनेरेशन का आग़ाज़

देश की राजनीति को कई दशकों से मथने वाले स्टेटसमैन वाजपेयी का 2018 में चले जाना एक बड़ा राजनीतिक ख़ालीपन पैदा कर गया तो आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज बीजेपी की राजनीति से किनारे कर दिए गए.

अरूण जेटली और सुषमा स्वराज, अनंत कुमार, मनोहर पर्रिकर जैसे नेताओं के अचानक मौत ने बीजेपी के केन्द्रीय नेतृत्व की दूसरी जेनेरेशन को लगभग खत्म कर दिया. पीयूष गोयल, धर्मेन्द्र प्रधान, गजेन्द्र शेखावत जैसे तीसरी पीढ़ी के नेताओं ने दूसरी पीढ़ी की जगह लेना शुरू कर दिया. राज्यों में अखिलेश, तेजस्वी, हेमंत सोरेन, सचिन पायलट राज्यों की राजनीति के केन्द्र में आ गए.

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