नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल जून में मथुरा के श्री कृष्ण जन्मभूमि और श्री द्वारकाधीश मंदिर के पास खुदाई और निर्माण काम के मामले में पकड़े गए एक व्यक्ति को रिहा कर दिया क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार ने उसकी अर्जी (representation) पर फैसला लेने में देरी की.
जस्टिस एम.एम. सुंद्रेश और एन. कोटिस्वर सिंह की दो जजों की बेंच ने 2 फरवरी को इलाहाबाद हाई कोर्ट की दो जजों की बेंच के आदेश को रद्द कर दिया. हाई कोर्ट ने पिछले साल 2 जुलाई को मथुरा के जिलाधिकारी द्वारा नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (एनएसए), 1980 के तहत सुनील कुमार गुप्ता को हिरासत में रखने के आदेश को सही ठहराया था.
हाई कोर्ट ने कहा था कि गुप्ता ने पब्लिक ऑर्डर (सार्वजनिक व्यवस्था) बिगाड़ी, इसलिए हिरासत का आदेश सही है, लेकिन 27 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट का फैसला एनएसए के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) के नियमों के मामले में एक अहम फैसला है.
पिछले साल जून में गुप्ता के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी, क्योंकि उसने इलाके के लोगों के विरोध के बावजूद मंदिर के पास खुदाई और निर्माण काम किया. इस गैरकानूनी काम की वजह से पांच घर गिर गए, जिसमें तीन लोगों की मौत हो गई और विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए.
इस घटना से अफरा-तफरी, डर और ट्रैफिक जाम की स्थिति बन गई, जिसके कारण सरकार को नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स एनडीआरएफ) और स्टेट डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स (एसडीआरएफ) को बुलाना पड़ा. प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए और गुप्ता की वजह से मारे गए लोगों के परिवारों के लिए मुआवजे की मांग करने लगे. इन प्रदर्शनों की वजह से मंदिर आने वाले पर्यटकों पर भी असर पड़ा, क्योंकि रास्ते बंद हो गए थे.
गुप्ता को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 105 के तहत गिरफ्तार किया गया था. उस पर गैर-इरादतन हत्या (जो हत्या नहीं मानी जाती) का आरोप था, जिसमें उम्रकैद या 10 साल तक की सज़ा हो सकती है. जमानत की अर्जी देने के दो दिन बाद ही जिलाधिकारी ने एनएसए की धारा 3 के तहत उसे हिरासत में रखने का आदेश दे दिया.
हिरासत के आदेश कैसे काम करते हैं
नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (एनएसए) की धारा 3 के तहत केंद्र या राज्य सरकार को यह अधिकार है कि अगर उन्हें लगे कि कोई व्यक्ति देश की सुरक्षा, विदेशी देशों से रिश्तों या अन्य मामलों को नुकसान पहुंचा सकता है, तो उसे हिरासत में रखा जा सकता है.
इसी के तहत जिलाधिकारी और अधिकृत पुलिस कमिश्नर किसी व्यक्ति को हिरासत में ले सकते हैं, ताकि वह देश की सुरक्षा, विदेशी संबंध, पब्लिक ऑर्डर या जरूरी सप्लाई को नुकसान पहुंचाने वाले काम न करे.
गुप्ता ने इस आदेश को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन उसे कोई राहत नहीं मिली. उसने कहा कि उसके खिलाफ एनएसए लगाना गलत है, क्योंकि वह पहले से ही जेल में था. उसने यह भी कहा कि उसकी अर्जी पर फैसला लेने में अधिकारियों ने बहुत ज्यादा देरी की.
गुप्ता के अनुसार, उसने 7 जुलाई को अपनी अर्जी भेजी थी, जिसमें उसने 2 जुलाई को जिलाधिकारी के आदेश को चुनौती दी थी. यह अर्जी मथुरा जेल के सुपरिंटेंडेंट को दी गई, जिसने इसे जिलाधिकारी को भेजा. फिर जिलाधिकारी ने इसे अपनी टिप्पणी के साथ राज्य के एडवाइजरी बोर्ड (जो एनएसए के तहत बना एक सरकारी निकाय है) और केंद्र सरकार को भेज दिया.
12 जुलाई को उत्तर प्रदेश सरकार ने हिरासत के आदेश को मंजूरी दे दी, लेकिन गुप्ता की अर्जी पर फैसला लेने में दो हफ्ते से ज्यादा समय लगा. बाद में 23 जुलाई को यूपी सरकार के गृह विभाग ने उसकी अर्जी खारिज कर दी. पांच दिन बाद केंद्र सरकार ने भी उसकी अर्जी खारिज कर दी.
हाई कोर्ट ने गुप्ता की इस दलील को नहीं माना कि अर्जी पर फैसला लेने में देरी हुई. कोर्ट ने कहा कि अगर सरकार को लगता है कि किसी को हिरासत में रखना देश की सुरक्षा या विदेशी संबंधों के लिए जरूरी है, तो वह ऐसा कर सकती है. अगर अधिकारियों को यह “वाजिब शक” हो कि कोई व्यक्ति रिहा होकर पब्लिक ऑर्डर खराब कर सकता है, तो उसे हिरासत में रखा जा सकता है, हाई कोर्ट ने कहा था.
अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने गुप्ता की अर्जी पर फैसला लेने में 16 दिन की देरी को गंभीर माना. कोर्ट ने कहा कि यह अधिकारियों की जिम्मेदारी का उल्लंघन है, क्योंकि उन्हें अर्जी पर जल्द से जल्द फैसला लेना चाहिए था.
कोर्ट ने कहा, “सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हिरासत में रखे गए व्यक्ति की अर्जी पर जल्द से जल्द फैसला करे. इस मामले में, हिरासत देने वाले अधिकारी ने अर्जी को तुरंत राज्य सरकार को नहीं भेजा, जबकि जेल प्रशासन ने उसे समय पर भेज दिया था.”
कोर्ट ने आगे कहा, “दुर्भाग्य से अर्जी पर जल्द फैसला नहीं लिया गया. इससे हिरासत का आदेश और उसकी मंजूरी दोनों ही गलत हो जाते हैं.”
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