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Sunday, 31 May, 2026
होमदेशराजगद्दी Vs निजी संपत्ति: कपूरथला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तय की शाही उत्तराधिकार की सीमा

राजगद्दी Vs निजी संपत्ति: कपूरथला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तय की शाही उत्तराधिकार की सीमा

धौलपुर और रामपुर से लेकर कपूरथला तक, अदालतें शाही संपत्तियों के मामलों से जूझ रही हैं. 50 साल पुराने प्रॉपर्टी विवाद में सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा आदेश अब तक का सबसे साफ़ समाधान देता है.

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कपूरथला के पूर्व शाही परिवार की दो शाखाओं के बीच 50 साल पुराने संपत्ति विवाद पर फैसला सुनाया. अदालत ने कहा कि किसी नाममात्र के शासक (टिट्युलर रूलर) की निजी संपत्तियों के उत्तराधिकार पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होगा, न कि ज्येष्ठाधिकार (प्राइमोजेनिचर) का नियम.

अदालत ने कहा कि शाही संपत्ति को अविभाज्य (इम्पार्टिबल) नहीं माना जा सकता. यानी यह पूरी की पूरी सिर्फ ज्येष्ठाधिकार के आधार पर या उस परंपरागत अधिकार के तहत नहीं जाएगी जिसमें पहला वैध संतान अपने माता-पिता की पूरी या अधिकांश संपत्ति, उपाधियां या सत्ता का उत्तराधिकारी बनता है.

अदालत ने आगे “गद्दी” (सत्ता की सीट या सिंहासन) और “निजी संपत्ति” के अधिकार के बीच अंतर भी स्पष्ट किया. अदालत ने कहा कि गद्दी का उत्तराधिकार ज्येष्ठाधिकार के नियम के अनुसार तय किया जा सकता है.

लेकिन यदि स्वतंत्रता के बाद भी ज्येष्ठाधिकार का नियम किसी रूप में बचा रहा हो, तब भी वह पूर्व रियासतों की निजी संपत्तियों के उत्तराधिकार में व्यक्तिगत कानूनों को नहीं हटा सकता.

अदालत ने कहा, “चार अचल संपत्तियों में से तीन, जैसा कि पहले बताया गया है, परिवार के सदस्यों के संयुक्त नाम पर हैं. इसलिए, ज्येष्ठाधिकार का नियम लागू हो या हिंदू कानून, इनका बंटवारा संयुक्त मालिकों के बीच होगा.” अदालत ने आगे कहा कि मसूरी वाली संपत्ति हिंदू कानून के तहत उत्तराधिकारियों को मिलेगी और परिवार के सदस्यों के बीच विभाजित की जा सकती है.

इस आदेश के साथ अदालत ने लगभग पांच दशक पुराने उत्तराधिकार विवाद का अंत कर दिया.

मामले के एक पक्ष ब्रिगेडियर सुखजीत सिंह हैं, जिन्हें सरकार द्वारा “महाराजा ऑफ कपूरथला” के रूप में मान्यता दी गई है. उनकी उम्र 92 वर्ष है. दूसरे पक्ष का प्रतिनिधित्व मूल याचिकाकर्ता की संतानों द्वारा किया जा रहा है. उनकी पत्नी इस मामले के फैसले तक जीवित नहीं रहीं. वर्षों के दौरान इस मामले को सुनने वाले कई वकील और न्यायाधीश भी या तो अब इस दुनिया में नहीं हैं या इस मामले से जुड़े नहीं हैं. आखिरकार अब इस मामले का भी अंत हो गया.

दिप्रिंट इस मामले के इतिहास और शाही संपत्ति के बंटवारे पर अदालतों के फैसलों पर नजर डालता है.

शाही संपत्ति का सवाल

यह मामला 1977 का है, जब सिंह ने पैतृक संपत्तियों सहित कई बड़ी संपत्तियों पर अपना व्यक्तिगत अधिकार जताया. उनकी अलग रह रही पत्नी गीता देवी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि यह पारिवारिक संपत्ति है. उनके बच्चों ने भी मुकदमों में हिस्सा लिया और कहा कि हिंदू कानून के तहत उन्हें भी उत्तराधिकार में हिस्सा मांगने का अधिकार है.

सिंह का मुख्य तर्क था कि भारत की रियासतों में लागू ज्येष्ठाधिकार के नियम के अनुसार सार्वजनिक और निजी दोनों तरह की संपत्तियां उन्हें व्यक्तिगत संपत्ति के रूप में मिली थीं और वे उनके साथ अपनी इच्छा के अनुसार व्यवहार कर सकते हैं.

इस विवाद की जड़ें स्वतंत्रता-पूर्व भारत में हैं. अक्सर यह बात नजरअंदाज हो जाती है कि ब्रिटिश भारत एक एकीकृत इकाई नहीं था. यह ब्रिटिश शासन वाले इलाकों और 500 से अधिक रियासतों का समूह था. ये रियासतें ब्रिटिश प्रभुत्व स्वीकार करती थीं, लेकिन अपने आंतरिक मामलों का संचालन खुद करती थीं.

इन रियासतों में तीन प्रमुख विशेषताएं थीं. पहली, राज्य की संपत्ति और शासक की व्यक्तिगत संपत्ति के बीच बहुत कम अंतर होता था. अधिकांश मामलों में दोनों को एक ही माना जाता था.

दूसरी, उत्तराधिकार पुरुष ज्येष्ठाधिकार के आधार पर होता था. यानी संपत्ति बड़े बेटे को मिलती थी, यदि कोई बड़ा बेटा हो.

तीसरी, पूरी संपत्ति एक ही उत्तराधिकारी को मिलती थी और उसे वारिसों के बीच बांटा नहीं जाता था. यानी उत्तराधिकार आमतौर पर विभाज्य नहीं होता था.

भारत के स्वतंत्र होने के बाद रियासतों का विलय देश में कर दिया गया. यह अक्सर विलय समझौतों के माध्यम से हुआ.

कपूरथला सहित कई रियासतों के शासकों ने ऐसे समझौतों पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते के अनुच्छेद 12 में राज्य की संपत्ति और निजी संपत्ति के बीच स्पष्ट अंतर किया गया था. राज्य की संपत्ति भारत में विलय होनी थी, जबकि निजी संपत्ति अलग मानी गई.

भारतीय रियासतों पर 1950 के एक श्वेत पत्र में इस समझौते का उल्लेख करते हुए कहा गया है:

(1) प्रत्येक समझौता करने वाले राज्य का शासक उन सभी निजी संपत्तियों (राज्य संपत्तियों से अलग) का पूर्ण स्वामी होगा और उन्हें उपयोग व उपभोग करने का अधिकार रखेगा, जो राज्य का प्रशासन राजप्रमुख को सौंपने की तारीख पर उसके पास निजी संपत्ति के रूप में थीं.

(2) उसे 20 सितंबर 1948 से पहले राजप्रमुख को अपनी सभी अचल संपत्तियों, प्रतिभूतियों और नकद राशि की सूची देनी होगी, जिन्हें वह निजी संपत्ति के रूप में रखता है.

इस अंतर को सुप्रीम कोर्ट के शुरुआती फैसलों ने और मजबूत किया.

1952 के विश्‍वेश्वर राव बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में अदालत ने साफ किया कि पूर्व रियासतों की संपत्ति अब सामान्य निजी संपत्ति है और उसे किसी भी अन्य निजी जमीन की तरह माना जाएगा.

1960 में श्री सुधांशु शेखर सिंह देव बनाम उड़ीसा राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुष्टि की कि पूर्व रियासतों की संपत्ति पर सामान्य कानून लागू होगा. यह विवाद इस बात पर था कि क्या ऐसी संपत्ति पर राज्य कर लगा सकता है.

हालांकि अदालत ने तब तक उत्तराधिकार के सवाल पर विशेष रूप से फैसला नहीं दिया था.

यह अवसर 1969 में आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने धौलपुर मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया. यह मामला धौलपुर राज्य के अंतिम आधिकारिक शासक महाराज राणा उदय भान सिंह के परिवार से जुड़ा था. उनकी मृत्यु बिना किसी प्रत्यक्ष पुरुष उत्तराधिकारी के हो गई थी. इसके बाद उनके दत्तक पुत्र और परिवार की दूसरी शाखा के एक वरिष्ठ सदस्य के बीच उत्तराधिकार विवाद खड़ा हो गया. दोनों ही उपाधि, उससे जुड़ी सुविधाओं (जिसमें उस समय तक मिलने वाला प्रिवी पर्स भी शामिल था) और दिवंगत महाराजा की विशाल संपत्ति पर दावा कर रहे थे.

अपने फैसले में अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 366 के तहत भारत के राष्ट्रपति के किसी विशेष शासक को मान्यता देने के अधिकार को सही ठहराया. राष्ट्रपति जिस व्यक्ति को मान्यता देंगे, वही गद्दी से जुड़े औपचारिक विशेषाधिकारों, जिनमें प्रिवी पर्स भी शामिल था, का हकदार होगा.

लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि इस उपाधि से दिवंगत महाराजा की निजी संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं मिलता. अदालत ने कहा, “शासक के रूप में मान्यता और शासक की निजी संपत्ति के उत्तराधिकार के बीच अंतर को हमेशा ध्यान में रखना होगा. शासक के रूप में मान्यता संपत्ति के अधिकार का संकेत नहीं है.”

अदालत ने निजी संपत्ति के मुद्दे पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया. उसने सिर्फ इतना कहा कि याचिकाकर्ता, जो दिवंगत महाराजा का रिश्तेदार था, “किसी अदालत में ऐसा दावा साबित नहीं कर सका.”

यह टिप्पणी महत्वपूर्ण थी. इससे संकेत मिलता था कि शाही संपत्ति से जुड़े उत्तराधिकार विवादों का फैसला भी किसी अन्य संपत्ति विवाद की तरह अदालत में ही होगा.

लेकिन सवाल यह था कि किस कानून के तहत? उस समय लागू सामान्य दीवानी और व्यक्तिगत कानूनों के तहत या संबंधित रियासत की परंपराओं के अनुसार? अदालत ने तब इस सवाल का जवाब नहीं दिया था और काफी समय तक नहीं दिया.

न्यायिक मतभेद

2019 के तलत फातिमा हसन बनाम सैयद मुर्तजा अली खान मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रामपुर के पूर्व नवाब की संपत्ति को लेकर एक विवाद पर फैसला दिया. एक बार फिर बहस इस बात पर थी कि उत्तराधिकार का फैसला रियासती परंपरा के आधार पर होगा या मुस्लिम पर्सनल लॉ के आधार पर.

सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने फैसला दिया कि संपत्तियों का बंटवारा मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार होगा.

1969 के धौलपुर फैसले (जो पांच जजों की बेंच ने दिया था) पर काफी हद तक भरोसा करते हुए अदालत ने कहा, “इसलिए हमें यह मानने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि 1966 में शासक नवाब रजा अली खान की मृत्यु के बाद उनकी निजी संपत्तियों का उत्तराधिकार पर्सनल लॉ के अनुसार तय होगा.”

यह फैसला अंतिम और स्पष्ट लगता था. लेकिन कुछ ही महीनों बाद एक दूसरे फैसले ने इससे अलग राय रखी.

2019 के त्रिजुगी नारायण बनाम सांकू मामले में एक परिवार की दो शाखाओं के बीच पूर्व मैहर रियासत की संपत्ति के उत्तराधिकार को लेकर विवाद था. एक पक्ष का कहना था कि चूंकि यह पूर्व रियासती संपत्ति है, इसलिए अविभाज्य ज्येष्ठाधिकार (impartible primogeniture) की परंपरा लागू होनी चाहिए और संपत्ति का बंटवारा नहीं किया जा सकता. दूसरे पक्ष का तर्क था कि हिंदू पारिवारिक कानून लागू होना चाहिए.

अदालत की दो जजों की बेंच ने फैसला दिया कि मैहर जैसी संपत्तियां हिंदू पारिवारिक कानून से अपवाद हैं और ज्येष्ठाधिकार को प्राथमिकता मिलेगी. अदालत ने कहा कि “पूर्व शासकों की जो संपत्ति अब निजी संपत्ति के रूप में है, उसका उत्तराधिकार विलय समझौते और संविधान के अनुसार उन परंपराओं के आधार पर होगा जो पूर्व शासकों पर लागू थीं.”

अब दो अलग-अलग फैसले मौजूद थे. मैहर मामला और रामपुर मामला. रामपुर मामले में कहा गया था कि पूर्व शासक की निजी संपत्ति का उत्तराधिकार पर्सनल लॉ के अनुसार होगा. इस विरोधाभास ने भ्रम की स्थिति पैदा कर दी. क्या रामपुर फैसला एक सामान्य सिद्धांत तय करता था, या सिर्फ उस खास मामले तक सीमित था, या केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ तक?

कपूरथला विवाद का समाधान

और अधिक स्पष्टता 2022 के महारानी दीपिंदर कौर बनाम राजकुमारी अमृत कौर फैसले से आई.

एक बार फिर विवाद दिवंगत फरीदकोट महाराजा की संपत्ति के उत्तराधिकार को लेकर था. क्या संपत्ति उनकी बेटी की शाखा को मिलेगी या उनके सबसे करीबी पुरुष रिश्तेदार की शाखा को?

सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने इस तर्क को साफ तौर पर खारिज कर दिया कि रियासत के विलय के बाद भी संपत्ति की अविभाज्यता और ज्येष्ठाधिकार की परंपरा जारी रही.

अदालत ने कहा, “हिंदू अविभाजित परिवार की अविभाज्य संपत्ति, अगर कोई थी भी, तो शासक द्वारा किए गए समझौते के बाद राज्य की कार्रवाई के कारण समाप्त हो गई.”

यह फैसला सीधे तौर पर 2019 के मैहर फैसले से अलग दिखाई देता था. लेकिन अदालत ने ऐसा साफ तौर पर नहीं कहा. वास्तव में इस फैसले में मैहर मामले का कोई उल्लेख ही नहीं किया गया. इसलिए फैसला काफी स्पष्ट होने के बावजूद कुछ हद तक भ्रम की गुंजाइश बनी रही.

इस सप्ताह के फैसले ने उस गुंजाइश को काफी हद तक खत्म कर दिया. अदालत ने तय किया कि कपूरथला की संपत्ति के उत्तराधिकार पर हिंदू कानून लागू होगा.

अदालत ने मैहर फैसले का जवाब देते हुए कहा कि उस फैसले में “तलत फ़ातिमा हसन मामले के सिद्धांत को उसके सभी पहलुओं में नहीं समझा गया.”

अदालत ने मूल रूप से कहा कि मैहर बेंच ने रामपुर फैसले को बहुत सीमित तरीके से पढ़ा. अदालत ने कहा, “त्रियुगी नारायण मामले में इस अदालत ने उस मुख्य प्रश्न पर विचार नहीं किया जो तलत फ़ातिमा हसन मामले में था. केवल यह कह दिया गया कि वह फैसला मुस्लिम पर्सनल लॉ तक सीमित था.”

अदालत ने कहा कि वास्तव में रामपुर मामले ने एक सामान्य सिद्धांत तय किया था. अदालत ने कहा, “सवाल पर्सनल लॉ के लागू होने का नहीं है, बल्कि यह है कि क्या ज्येष्ठाधिकार का नियम लागू होगा और पर्सनल लॉ को बाहर कर देगा.”

दूसरे शब्दों में, क्या पूर्व रियासतों की निजी संपत्तियों के उत्तराधिकार में ज्येष्ठाधिकार की परंपरा पूरी तरह समाप्त हो चुकी है?

बेंच ने इस सवाल का जवाब हां में दिया. उसने पुराने धौलपुर फैसले पर काफी भरोसा करते हुए कहा कि “गद्दी के उत्तराधिकार का अधिकार और निजी संपत्ति के उत्तराधिकार का अधिकार अलग-अलग हैं. निजी संपत्ति का उत्तराधिकार उत्तराधिकार संबंधी पर्सनल लॉ के अनुसार होगा.”

अदालत ने अपने तर्क के समर्थन में हाल के फरीदकोट फैसले का भी हवाला दिया और स्पष्ट शब्दों में कहा कि “ज्येष्ठाधिकार का नियम, यदि कभी था भी, तो राज्य की कार्रवाई के कारण समाप्त हो गया.”

बेंच ने कहा कि ये फैसले मैहर फैसले की तुलना में अधिक प्रभावशाली हैं. इसलिए “त्रियुगी नारायण मामले में डिवीजन बेंच का फैसला, महारानी दीपिंदर कौर और तलत फातिमा हसन मामलों में तीन जजों की बेंच के फैसलों पर प्राथमिकता नहीं पा सकता.”

बुधवार के आदेश की भाषा ने किसी भी तरह के भ्रम की बहुत कम गुंजाइश छोड़ी है.

हालांकि अदालत ने मैहर फैसले को औपचारिक रूप से रद्द नहीं किया है, लेकिन उसे लगभग अकेला छोड़ दिया है. अदालत ने साफ कर दिया है कि अब उसकी न्यायिक सोच रियासती परंपरा की तुलना में पर्सनल लॉ को अधिक महत्व देती है.

इस तरह अदालत ने उस कानूनी बदलाव की प्रक्रिया को पूरा किया है जो रियासतों के भारतीय संघ में विलय के साथ शुरू हुई थी. दशकों से अदालतें संप्रभुता, उपाधि और संपत्ति के बीच के संबंधों को धीरे-धीरे अलग करती रही हैं. पूर्व शासकों को एक अलग संवैधानिक व्यवस्था के अवशेष के रूप में नहीं, बल्कि सामान्य कानून के अधीन सामान्य नागरिकों के रूप में देखा गया है.

यह फैसला देकर कि निजी संपत्ति का उत्तराधिकार रियासती परंपरा नहीं बल्कि पर्सनल लॉ के अनुसार होगा, अदालत ने दोबारा स्पष्ट किया है कि विलय समझौतों ने गद्दी की गरिमा को तो सुरक्षित रखा, लेकिन संप्रभुता से जुड़े कानूनी विशेषाधिकारों को नहीं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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