scorecardresearch
Friday, 8 May, 2026
होमदेशसोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर केस: बॉम्बे हाईकोर्ट ने 22 आरोपियों की बरी होने का फैसला बरकरार रखा

सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर केस: बॉम्बे हाईकोर्ट ने 22 आरोपियों की बरी होने का फैसला बरकरार रखा

हाईकोर्ट ने 2018 के सीबीआई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा. गैंगस्टर सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और सहयोगी तुलसीराम प्रजापति की 2005 और 2006 में राजस्थान और गुजरात पुलिस के कथित फर्जी एनकाउंटर में मौत हुई थी.

Text Size:

नई दिल्ली: बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के मामले की “पूरी नींव” ही टूट चुकी है और आपराधिक साजिश की थ्योरी साबित नहीं हो पाई है. इसके साथ ही हाईकोर्ट ने 2005 के सोहराबुद्दीन शेख कथित फर्जी एनकाउंटर मामले में 21 पुलिसकर्मियों समेत सभी 22 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा.

मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम ए. अंखड ने गुरुवार को अपने 50 पन्नों के फैसले में कहा कि बरी किए जाने का फैसला “आरोपी के निर्दोष होने की धारणा को और मजबूत करता है”. इसे पलटने के लिए “स्पष्ट गैरकानूनी कार्रवाई या गंभीर त्रुटि” का ऊंचा स्तर साबित करना जरूरी होता है, जिसे अभियोजन पक्ष साबित नहीं कर पाया. इसलिए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में दखल देने का कोई आधार नहीं पाया.

मृतकों के परिवार ने 2018 में मुंबई की ट्रायल कोर्ट द्वारा गुजरात और राजस्थान के 21 पुलिसकर्मियों को बरी किए जाने के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.

गैंगस्टर सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और सहयोगी तुलसीराम प्रजापति की 2005 और 2006 में राजस्थान और गुजरात पुलिस के कथित फर्जी एनकाउंटर में मौत हुई थी.

बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को 2018 की विशेष सीबीआई अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें 21 पुलिसकर्मियों समेत 22 आरोपियों को बरी किया गया था.

यह चर्चित मामला राजनीतिक और कानूनी विवादों से घिरा रहा है. उस समय गुजरात के गृह मंत्री रहे अमित शाह का नाम भी शुरुआत में आरोपियों में शामिल था. बाद में 30 दिसंबर 2014 को उन्हें मामले से बरी कर दिया गया. इससे कुछ समय पहले, 1 दिसंबर 2014 को मुंबई की विशेष सीबीआई अदालत के जज बृजगोपाल हरकिशन लोया की मौत हो गई थी.

अमित शाह के साथ-साथ विशेष अदालत ने 2014 में 16 अन्य आरोपियों को भी मामले से बरी कर दिया था, जिनमें बीजेपी नेता और राजस्थान के पूर्व गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया तथा कई वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी शामिल थे.

ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए शेख परिवार ने हाईकोर्ट में कहा कि “कई गवाहों ने अभियोजन पक्ष के महत्वपूर्ण पहलुओं पर बयान दिए थे, लेकिन ट्रायल जज ने उनकी गवाही को सही नजरिए से नहीं देखा.” परिवार ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला “बिना जरूरी आधार वाली धारणाओं और सबूतों की गलत व्याख्या” पर आधारित था.

हाईकोर्ट की ‘दो नज़रियों’ वाली थ्योरी

बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ इसलिए ट्रायल कोर्ट के फैसले में दखल नहीं दिया जा सकता क्योंकि “दूसरा नजरिया भी संभव है”. अदालत ने “दो नज़रियों वाली थ्योरी” लागू की, जिसे मल्लप्पा एवं अन्य बनाम कर्नाटक राज्य में सुप्रीम कोर्ट ने विस्तार से समझाया था. इसमें कहा गया था कि जब सबूतों से दो समान रूप से संभव निष्कर्ष निकलते हों, तब “आरोपी के निर्दोष होने वाले नजरिए को मानना सबसे सुरक्षित तरीका होता है.”

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने “सबूतों को पूरी तरह से समझकर देखा” था और उसके निष्कर्ष गलत या तर्कहीन नहीं थे. बेंच ने कहा कि परिस्थितिजन्य सबूतों की कड़ी कई जगह टूटती हुई दिखी और अभियोजन पक्ष न तो आरोपियों का मकसद साबित कर पाया और न ही अपराध वाली जगह पर उनकी मौजूदगी.

सीबीआई का कहना था कि ये हत्याएं “राजनेताओं और पुलिस के गठजोड़” का नतीजा थीं. अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि कुछ राजनेता सोहराबुद्दीन शेख को खत्म करना चाहते थे क्योंकि वह “राजस्थान के मार्बल कारोबारियों से वसूली” कर रहा था. इसके अलावा ट्रायल के दौरान 1996 से चली आ रही गांव की राजनीतिक दुश्मनी और गैंगवार की बात भी सामने आई.

लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष की थ्योरी कई बार “राजनीतिक रंग वाली एक खास कहानी” के मुताबिक लगती थी और पर्याप्त सबूतों के बिना कुछ खास राजनीतिक लोगों पर जिम्मेदारी डालने की कोशिश की गई. अदालत ने खास तौर पर कहा कि “मार्बल लॉबी से वसूली साबित करने के लिए तो दूर, पहली नजर में भी कोई सामग्री मौजूद नहीं थी.”

आखिर में अदालत ने कहा कि जनहित में न्याय के लिए ट्रायल कोर्ट के फैसले में दखल देने की जरूरत नहीं है, क्योंकि अभियोजन पक्ष का मामला सुनी-सुनाई बातों और ऐसे गवाहों के “रटे-रटाए बयानों” पर आधारित था, जिनका आपराधिक रिकॉर्ड भी रहा है.

कथित फर्जी एनकाउंटर

यह मामला नवंबर 2005 का है, जब अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि सोहराबुद्दीन शेख, पत्नी कौसर बी और उनके सहयोगी तुलसीराम प्रजापति का गुजरात और राजस्थान पुलिस की एक टीम ने अपहरण कर लिया था. अभियोजन के अनुसार, ये तीनों 22 नवंबर 2005 की रात हैदराबाद से सांगली जा रही एक लग्जरी बस में सफर कर रहे थे. कौसर बी के इलाज और ईद मनाने के लिए वे यात्रा कर रहे थे. आरोप है कि उन्हें ज़हीराबाद के पास रोका गया, अहमदाबाद के फार्महाउसों में ले जाया गया और बाद में उनकी हत्या कर दी गई.

सोहराबुद्दीन शेख की 26 नवंबर 2005 को मौत हो गई. पुलिस ने इसे विशाला सर्कल के पास हुआ एनकाउंटर बताया था. कौसर बी का शव कभी नहीं मिला, हालांकि अभियोजन पक्ष का दावा था कि उनकी हत्या कर शव को नर्मदा नदी में फेंक दिया गया. एक साल से ज्यादा समय बाद, 28 दिसंबर 2006 को तुलसीराम प्रजापति की भी मौत हो गई. पुलिस ने दावा किया था कि हिरासत से भागने की कोशिश के बाद हिम्मतनगर के पास एनकाउंटर में उन्हें मार गिराया गया.

शुरुआत में इस मामले की जांच गुजरात की एंटी-टेररिज्म स्क्वॉड और सीआईडी (क्राइम) ने की थी. बाद में जनवरी 2010 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जांच सीबीआई को सौंप दी गई. बाद में सीबीआई ने ही केस दर्ज किया और चार्जशीट दाखिल की. परिवार की कई मांगों के बाद मामला गुजरात से मुंबई ट्रांसफर कर दिया गया.

ट्रायल कोर्ट ने पुलिसकर्मियों को क्यों बरी किया

विशेष सत्र अदालत ने दिसंबर 2018 में सबूतों और भरोसेमंद गवाहों की भारी कमी के कारण आरोपियों को बरी कर दिया था. 210 गवाहों में से 92 गवाह अपने बयान से पलट गए थे. इनमें लग्जरी बस के यात्री और ड्राइवर जैसे अहम गवाह भी शामिल थे. इन लोगों ने बस से किसी के अपहरण की बात से पूरी तरह इनकार कर दिया था, जबकि यही अभियोजन पक्ष के मामले की बुनियाद थी.

ट्रायल जज ने कहा था कि “राजनेता-पुलिस गठजोड़” साबित करने या यह साबित करने के लिए “रत्तीभर भी सबूत नहीं” है कि बरामद हथियारों का इस्तेमाल एनकाउंटर में हुआ था. फॉरेंसिक जांच में भी बड़ी खामियां सामने आईं. आरोपियों से बरामद कारतूस उनके सर्विस पिस्टल से मैच नहीं हुए.

इसके अलावा मेडिकल सबूतों ने भी अभियोजन के उस दावे को गलत बताया, जिसमें कहा गया था कि एक पुलिस अधिकारी (जो आरोपी भी था) ने एनकाउंटर को असली दिखाने के लिए खुद को चोट पहुंचाई थी. मेडिकल रिपोर्ट से पता चला कि चोट असली झड़प के दौरान लगी थी.

अंत में ट्रायल कोर्ट ने कहा कि ज्यादातर आरोपी सरकारी कर्मचारी थे और उन्होंने ड्यूटी के दौरान कार्रवाई की थी. इसलिए सीआरपीसी की धारा 197 के तहत राज्य सरकार की मंजूरी के बिना उनके खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता था.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

share & View comments