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Saturday, 24 October, 2026
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‘पीस बॉन्ड साइन करना लोकतांत्रिक असहमति के अधिकार को छोड़ना’: AISA की नेहा बोरा

AISA अध्यक्ष ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को रोकने के लिए पीस बॉन्ड का इस्तेमाल हो रहा; संगठन इन्हें सामान्य बनाने का हिस्सा नहीं बनेगा.

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नई दिल्ली: ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने शनिवार को कहा कि संविधान लोगों को असहमति जताने का अधिकार देता है, लेकिन कार्यपालिका की ओर से पीस बॉन्ड जारी किए जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को रोकने के लिए इन बॉन्ड का इस्तेमाल किया जा रहा है.

सीपीआई (एमएल) लिबरेशन की छात्र इकाई AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि संगठन पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने को “सामान्य” बनाने का हिस्सा नहीं बनेगा. बोरा ने कहा कि ऐसे बॉन्ड पर हस्ताक्षर करना लोकतांत्रिक तरीके से असहमति जताने के अधिकार को छोड़ने जैसा है.

उन्होंने यहां एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “एक तरफ संविधान हमें असहमति जताने का अधिकार देता है. दूसरी तरफ पीस बॉन्ड का इस्तेमाल लोगों को शांति भंग करने के नाम पर हिरासत में लेने के लिए किया जाता है. 16 अक्टूबर को मंडी हाउस में प्रदर्शन करने के 10 मिनट के भीतर हमें हिरासत में ले लिया गया और कहा गया कि हमने शांति भंग की है. शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को रोकने के लिए पीस बॉन्ड का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसलिए हमारे लिए ऐसे पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करना सिद्धांत रूप से गलत फैसला है. यह हमारे लोकतांत्रिक असहमति के अधिकार को छोड़ने जैसा है.”

बोरा ने कहा कि AISA भविष्य में भी ऐसे पीस बॉन्ड को चुनौती देता रहेगा. उन्होंने कहा कि अदालतों या कानून और संवैधानिक नैतिकता के “रखवालों” को इससे पैदा होने वाले विरोधाभास को समझना चाहिए.

उन्होंने कहा, “हमें उम्मीद है कि कानून और संवैधानिक नैतिकता के रखवाले यानी अदालतें इस मूल विरोधाभास को समझेंगी. वे समझेंगी कि ऐसे पीस बॉन्ड लागू करने से हमारे असहमति जताने के अधिकार को छीना जा रहा है.”

उन्होंने आगे कहा, “इसी उम्मीद के साथ हम पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे और उन्हें चुनौती देते रहेंगे. क्योंकि अगर हम इन पर हस्ताक्षर करते हैं तो इसका मतलब होगा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को रोकने के लिए ऐसे पीस बॉन्ड का इस्तेमाल किया जा सकता है. AISA इसे सामान्य बनाने का हिस्सा नहीं बनेगा. शांति सिर्फ सरकार के लिए नहीं, बल्कि लोगों के लिए भी होनी चाहिए.”

AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि अदालत ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) की ओर से जारी नोटिस को चुनौती देने वाली उनकी याचिका खारिज नहीं की है. उन्होंने कहा कि अदालत ने चुनौती के आधार पर मामले की योग्यता पर सुनवाई नहीं की.

बोरा ने कहा कि SEM कारण बताओ नोटिस जारी करके लोगों से किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसे मामलों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत लागू होते हैं.

उन्होंने कहा, “ज्यादातर मीडिया संस्थानों ने बताया कि नोटिस को हमारी चुनौती खारिज कर दी गई. अदालत ने सिर्फ यह कहा कि वह मामले की योग्यता पर नहीं जाएगी, बल्कि नोटिस को लेकर होने वाली जांच में हिस्सा लेने को कहा. अदालत ने कहा है कि SEM कारण बताओ नोटिस जारी करके किसी को किसी चीज पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता. प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत लागू होंगे.”

बोरा ने कहा कि लोकतंत्र कोई अमूर्त विचार नहीं है. उन्होंने कहा कि भारत जैसे देश में लोग लोकतंत्र को मुख्य रूप से दो चीजों से समझते हैं- वोट देने का अधिकार और अपने अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाने का अधिकार.

उन्होंने कहा, “लोकतंत्र कोई अमूर्त चीज नहीं है. भारत जैसे देश में लोग लोकतंत्र को दो बड़ी चीजों से समझते हैं- एक वोट देने का अधिकार और दूसरा अपने अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार. आज SIR के जरिए वोट देने का अधिकार छीना जा रहा है. 13 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं.”

उन्होंने आगे कहा, “मीडिया और ग्राउंड रिपोर्ट्स, BLO और दो चुनाव आयुक्तों के बयान भी इस सवाल को उठा रहे हैं कि चुनाव प्रक्रिया लोकतांत्रिक है या नहीं. वोट के नाम हटाए जाने से प्रभावित लोगों समेत सभी लोग यही सवाल पूछ रहे हैं कि इतनी बड़ी गड़बड़ियों के बीच जिस चुनाव से यह देश लोकतंत्र बनता है, वह चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से नहीं हो रहा है.”

बोरा ने “शांति भंग” की अवधारणा पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले लोग शांति भंग नहीं कर रहे थे, बल्कि प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस का व्यवहार इस दायरे में आ सकता है.

उन्होंने कहा, “जब इस देश की मूल भावना यानी वोट देने के अधिकार पर हमला हो रहा है, तब सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करना सिर्फ नागरिकों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उनका कर्तव्य भी है. आप सभी ने देखा कि सड़कों पर आए लोगों ने कोई अलोकतांत्रिक कार्रवाई नहीं की. हिंसा पुलिस की ओर से हुई. प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था संभालने के लिए तैनात सुरक्षा कर्मियों ने लाठियों का इस्तेमाल किया. उन्होंने महिलाओं के कपड़े फाड़े. पत्रकारों और मीडिया के साथ भी हिंसा हुई.”

उन्होंने कहा, “अगर इस आंदोलन के दौरान किसी चीज को शांति भंग कहा जा सकता है, तो वह आम नागरिकों का शांतिपूर्ण प्रदर्शन नहीं, बल्कि प्रदर्शनकारियों और स्वतंत्र मीडिया के साथ पुलिस और सुरक्षा कर्मियों का व्यवहार है.”

उन्होंने सवाल किया कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना क्या शांति भंग करना है. बोरा ने कहा कि आम लोगों के पास संवैधानिक रास्ते के अलावा शांतिपूर्ण प्रदर्शन ही एक तरीका है.

उन्होंने कहा, “जब आप शांति की बात करते हैं तो किसकी शांति और किसके लिए शांति की बात कर रहे हैं? 13 करोड़ लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं- क्या उन लोगों को चुप रहना चाहिए? क्या उन्हें सड़कों पर नहीं आना चाहिए? क्या यही शांति है? क्या सड़कों पर लोकतांत्रिक तरीके से असहमति जताना और प्रदर्शन करना शांति भंग करना है? जब किसी व्यवस्था में लोगों से उनका अधिकार छीन लिया जाता है, तो आम जनता के पास संवैधानिक रास्ते के अलावा शांतिपूर्ण प्रदर्शन ही एक रास्ता होता है.”

उन्होंने आगे कहा, “जिन लोगों के पास सही दस्तावेज हैं और जो पिछले चुनावों में वोट देते रहे हैं, उनका अधिकार छीन लिया गया है. ऐसे लोग शांतिपूर्ण प्रदर्शन के जरिए सवाल पूछें तो क्या यह शांति भंग है? फिर शांति क्या है? अगर अन्याय हो रहा है तो सवाल उठाने की इजाजत नहीं है. क्या यही शांति है? क्या सरकार के खिलाफ सवाल न उठाए जाएं तो इसे शांति कहा जाएगा? अभी हम जो कर रहे हैं, उसके केंद्र में यही मूल सवाल है.”


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