नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने भोजशाला मामले में पहले जैसी व्यवस्था (स्टेटस क्वो एंटे) बहाल करने से इनकार कर दिया. यानी फिलहाल हिंदुओं और मुस्लिमों को पहले की तरह तय दिनों पर अपनी-अपनी पूजा और नमाज करने की अनुमति नहीं दी जाएगी.
हालांकि, भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने अंतरिम व्यवस्था बनाई. इसके तहत मुस्लिमों को विवादित परिसर के पास स्थित खुले स्थान पर हर शुक्रवार नमाज अदा करने की अनुमति दी गई.
बेंच ने मंगलवार को कहा, “यह व्यवस्था दोनों पक्षों के हितों में संतुलन बनाए रखने के लिए की जा रही है. इससे किसी भी पक्ष के अधिकार या भविष्य में आदेश में बदलाव की मांग पर कोई असर नहीं पड़ेगा.” साथ ही मध्य प्रदेश सरकार को ज़रूरी व्यवस्था करने का निर्देश दिया.
नमाज का समय दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक तय किया गया है.
अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था अस्थायी (एड-हॉक) होगी और मामले के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगी. इस मामले की अगली सुनवाई तीन हफ्ते बाद होगी. सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश उन कई अपीलों पर आया है, जिनमें मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें धार जिले के भोजशाला-कमाल मौला परिसर को सरस्वती मंदिर घोषित किया गया था. 15 मई को आए हाई कोर्ट के फैसले से 23 साल पुरानी व्यवस्था खत्म हो गई थी, जिसके तहत हिंदू और मुस्लिम दोनों तय दिनों पर इस धार्मिक स्थल पर पूजा और नमाज कर सकते थे.
हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह भी निर्देश दिया था कि सरस्वती की मूल प्रतिमा, जो फिलहाल लंदन के एक संग्रहालय में रखी है, उसे वापस लाया जाए.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हम ऐसा कोई आदेश नहीं देना चाहते जिससे तनाव पैदा हो.” इसी वजह से अदालत ने 15 मई से पहले की व्यवस्था बहाल करने की मांग ठुकरा दी. इसके बजाय बेंच ने कहा कि इस मामले की सुनवाई के लिए एक तारीख तय की जाएगी और इसे ऐसी बेंच को सौंपा जाएगा, जो अंतिम फैसला आने तक लगातार इसकी सुनवाई करेगी.
सीजेआई ने कहा, “अगर यह मामला इसी बेंच के सामने नहीं रहा, तो दूसरी बेंच को भेजा जाएगा और हम अनुरोध करेंगे कि मामले की सुनवाई बिना किसी रुकावट के पूरी की जाए.”
मुस्लिम पक्ष की मांग स्वीकार करते हुए बेंच ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को निर्देश दिया कि भोजशाला परिसर में कोई भी ढांचागत बदलाव न किया जाए. अगर वहां कोई काम करना हो, तो पहले अदालत से अनुमति लेनी होगी. मुस्लिम पक्ष ने शुरुआत से ही हाई कोर्ट के फैसले का विरोध किया. उनका कहना था कि हिंदू पक्ष की ओर से दायर की गई रिट याचिका सुनवाई योग्य ही नहीं थी.
उनका कहना था कि हाई कोर्ट ने करीब 800 साल से चली आ रही स्थिति बदल दी और एएसआई द्वारा 2003 में बनाई गई उस संतुलित व्यवस्था को खत्म कर दिया, जिसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों को तय दिनों पर पूजा और नमाज की अनुमति थी.
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील ए.एम. सिंहवी, हुजेफा अहमदी और मीनाक्षी अरोड़ा ने कहा कि यह स्थल सांप्रदायिक सौहार्द का बेहतरीन उदाहरण रहा है. उन्होंने अंतरिम आदेश देने की जोरदार मांग की.
वहीं, मध्य प्रदेश सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से फिलहाल हस्तक्षेप न करने का अनुरोध किया. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने इलाके में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए ज़रूरी कदम उठाए हैं. अगर मौजूदा व्यवस्था बदली गई तो प्रशासनिक दिक्कतें पैदा हो सकती हैं और तनाव बढ़ सकता है.
मेहता ने कहा कि याचिकाकर्ता काफी देर से सुप्रीम कोर्ट आए हैं. ऐसे में अगर उन्हें कुछ और दिन इंतज़ार करना पड़े, तो इससे उन्हें कोई नुकसान नहीं होगा.
इस पर याचिकाकर्ताओं ने आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि उनमें से कुछ ने हाई कोर्ट के फैसले के चार-पांच दिन के भीतर ही सुप्रीम कोर्ट का रुख कर लिया था, लेकिन गर्मी की छुट्टियों की वजह से उनकी याचिका सूचीबद्ध नहीं हो सकी.
हुजेफा अहमदी ने अदालत से पहले वाली व्यवस्था बहाल करने की मांग करते हुए कहा कि हाई कोर्ट ने भी माना है कि यह जगह सदियों से मस्जिद के रूप में इस्तेमाल होती रही है. इसलिए अंतरिम राहत उनके पक्ष में दी जानी चाहिए.
हिंदू पक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ वकील गुरु कृष्णकुमार ने पहले वाली व्यवस्था बहाल करने का विरोध किया. उनका कहना था कि ऐसा करना याचिकाओं को बिना अंतिम सुनवाई के ही मंजूर करने जैसा होगा.
ए.एम. सिंहवी ने धार्मिक स्थलों से जुड़े पुराने विवादों को फिर से खोलने पर चिंता जताई. उन्होंने ताजमहल से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के हालिया नोटिस का भी ज़िक्र किया.
उन्होंने कहा कि पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 होने के बावजूद धार्मिक स्थलों से जुड़े विवाद अब भी लंबित हैं. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि 1991 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर एक बार में इस मुद्दे का फैसला कर दिया जाए, ताकि निचली अदालतें इतिहास की परतें बार-बार न खंगालें.
1991 का कानून किसी भी पूजा स्थल का धर्म बदलने की अनुमति नहीं देता और यह कहता है कि 15 अगस्त 1947 को जिस रूप में पूजा स्थल था, उसी रूप में उसे बनाए रखा जाएगा. हालांकि, यह कानून पुरातात्विक स्थलों पर लागू नहीं होता.
हाई कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की एक मुख्य दलील यह भी थी कि फैसले में अंदरूनी विरोधाभास है और उसकी दलीलें खुद एक-दूसरे का खंडन करती हैं.
उनका कहना था कि हाई कोर्ट ने कई बार कहा कि वह विवादित संपत्ति के मालिकाना हक का फैसला नहीं कर रहा है, लेकिन फैसले के अंतिम हिस्से में उसने अप्रत्यक्ष रूप से संपत्ति के मालिकाना हक और उसके धार्मिक स्वरूप पर फैसला दे दिया.
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