गुरुग्राम: सुप्रीम कोर्ट के वकील नवीन बामेल के दिमाग में 29 दिसंबर को हरियाणा के हांसी में पुलिस अधीक्षक (SP) के ऑफिस में जाते समय सिर्फ एक बात थी: वह शहर में बढ़ते नशे के इस्तेमाल और उससे जुड़े अपराधों का मुद्दा उठाना चाहते थे, लेकिन वह ऑफिस के अंदर नहीं जा सके.
बामेल अपने वकील दोस्त और हिसार कोर्ट के वकील शुभम घंघस के साथ एसपी के ऑफिस पहुंचे थे. दोनों ने अपना विजिटिंग कार्ड दिया, जिसके बाद उस समय के एसपी अमित यशवर्धन ने उन्हें अंदर बुलाया, लेकिन दरवाजे पर तैनात सुरक्षा कर्मचारियों की एक शर्त थी: उन्हें अपने मोबाइल फोन बाहर छोड़ने होंगे.
बामेल ने मंगलवार को दिप्रिंट को बताया, “मैंने इसका विरोध किया और कहा कि मुझे अधिकारी को अपने मोबाइल से कुछ दिखाना पड़ सकता है, लेकिन वह नहीं माना. जब मैंने उससे अधिकारी से इसकी पुष्टि करने को कहा, तो वह अंदर गया और बाहर आकर बताया कि मुझे अंदर जाकर अधिकारी से मिलने की अनुमति नहीं है.”
करीब नौ महीने बाद यह मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) तक पहुंचा. आयोग ने सोमवार को हरियाणा के पुलिस महानिदेशक को मामले की जांच करने और चार हफ्ते के अंदर कार्रवाई की रिपोर्ट देने का निर्देश दिया.
बामेल के मुताबिक, जब उन्होंने हांसी में अपने मीडिया के दोस्तों से इस घटना के बारे में बात की, तो उन्होंने बताया कि एसपी ऑफिस जाते समय उनसे भी मोबाइल फोन जमा करने को कहा गया था. हालांकि, उन्होंने कहा कि यह नियम तब लागू नहीं किया गया जब एसपी “मीडिया और सोशल मीडिया पर अपने वीडियो बाइट को ज्यादा से ज्यादा दिखाना चाहते थे” और मीडिया के लोगों को अपने फोन अंदर ले जाने की अनुमति थी.
उन्होंने कहा, “मुझे लगा कि एसपी ऑफिस के अंदर फोन ले जाने को लेकर कोई पक्की नीति या नियम नहीं था. वे इसे अपने आदेश की तरह इस्तेमाल कर रहे थे और जब उन्हें सही लगता था, तभी इसकी अनुमति देते थे.”
शिकायत का सिलसिला
अंदर जाने से रोके जाने के अगले दिन बामेल ने हांसी एसपी ऑफिस में लिखित शिकायत दी. उन्होंने पूछा कि कोई अधिकारी सरकारी काम के समय किसी मिलने आए व्यक्ति से मिलने से कैसे मना कर सकता है और किस कानून के तहत स्टाफ को ऑफिस में प्रवेश से पहले लोगों से अपने फोन जमा कराने की मांग करने का अधिकार था. शिकायत दर्ज की गई और उन्हें एक CCTNS नंबर दिया गया. रसीद पर यह भरोसा भी दिया गया था कि 15 दिनों के अंदर कार्रवाई की जाएगी.
CCTNS यानी Crime and Criminal Tracking Network System एक देशभर में इस्तेमाल होने वाला ऑनलाइन प्लेटफॉर्म है. हरियाणा पुलिस इसका इस्तेमाल पुलिस के काम को डिजिटल बनाने के लिए करती है. इसमें एफआईआर दर्ज करना, जांच और चार्जशीट जैसी चीजें शामिल हैं.
बामेल ने कहा, “मेरी शिकायत के लिए मुझे एक नंबर दिया गया था, लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला.”
एसपी के ऑफिस की ओर से एक महीने से ज्यादा समय तक कोई कार्रवाई नहीं होने के बाद बामेल ने 2 फरवरी को हरियाणा स्टेट पुलिस कंप्लेंट अथॉरिटी के चेयरपर्सन आर.सी. मिश्रा, IPS (सेवानिवृत्त), को शिकायत भेजी. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 2006 के प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले, (2006) 8 SCC 1 के फैसले का हवाला दिया. इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को स्वतंत्र पुलिस शिकायत प्राधिकरण बनाने का निर्देश दिया था, ताकि एसपी और उससे ऊपर के रैंक के अधिकारियों के गंभीर गलत आचरण की जांच की जा सके.
बामेल की शिकायत में एसपी ऑफिस के इस नियम की कानूनी वैधता पर सवाल उठाया गया था. उन्होंने कहा कि किसी सरकारी अधिकारी से मिलने की शर्त के तौर पर किसी व्यक्ति से उसका निजी फोन जमा कराने की मांग का हरियाणा पुलिस अधिनियम या किसी अधिसूचित सर्कुलर या स्थायी आदेश में कोई आधार नहीं है. इसलिए यह नियम “खुद बनाया गया, कानून से बाहर और असंवैधानिक” था.
उन्होंने आगे कहा कि बिना किसी लिखित आदेश या कारण बताए मौखिक रूप से उन्हें अंदर जाने से रोकना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन था. उन्होंने कहा कि यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि वह सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकील हैं और इससे एक “खतरनाक मिसाल” कायम हुई, जिससे आम नागरिक पुलिस के पास जाने से डर सकते हैं.
12 मार्च को प्राधिकरण ने अपने डिप्टी सुपरिंटेंडेंट के हस्ताक्षर वाले एक पत्र में बामेल को बताया कि उसने उनकी शिकायत की जांच की और पाया कि यह 2007 के हरियाणा पुलिस अधिनियम की धारा 65 के तहत नहीं आती. इस कानून में 2014 में संशोधन किया गया था और इसी धारा के तहत प्राधिकरण को कार्रवाई करने का अधिकार है.
NHRC ने दिया दखल
स्थानीय पुलिस और राज्य की निगरानी करने वाली संस्था, दोनों जगह से कोई कार्रवाई नहीं होने के बाद बामेल दिल्ली में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग पहुंचे. आयोग ने 3 सितंबर को उनकी शिकायत पर मामला लिया.
21 सितंबर के अपने आदेश में NHRC ने बामेल की ओर से बताई गई घटना को दर्ज किया. इसमें यह भी बताया गया कि जब उन्होंने अपना फोन देने से मना किया, तो स्टाफ ने एसपी से बात की और वापस आकर उन्हें बताया कि उन्हें अधिकारी से मिलने की अनुमति नहीं दी जाएगी. इसके बाद उनका विजिटिंग कार्ड उन्हें वापस कर दिया गया.
आयोग ने इसके बाद हुई घटनाओं को भी दर्ज किया. इसमें दर्ज की गई शिकायत पर कोई जांच रिपोर्ट या कारण बताया गया जवाब नहीं मिला और बाद में राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण ने शिकायत खारिज कर दी. बामेल ने स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच, उनके मुताबिक सरकारी पद के गलत इस्तेमाल के लिए जवाबदेही और प्रभावी समाधान की मांग की थी.
आयोग ने निर्देश दिया कि शिकायत की एक कॉपी ऑनलाइन हरियाणा के पुलिस महानिदेशक को भेजी जाए, ताकि “जरूरी कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके”. साथ ही, पत्र मिलने के चार हफ्ते के अंदर कार्रवाई की रिपोर्ट जमा करने को कहा गया. आदेश में खास तौर पर कहा गया कि रिपोर्ट का “अंग्रेज़ी में सही तरीके से अनुवाद” होना चाहिए.
इस बीच, घटना के बारे में पूछे जाने पर यशवर्धन ने कहा कि उन्हें इसकी पूरी जानकारी याद नहीं है. उन्होंने मंगलवार को दिप्रिंट से कहा, “मुझे नहीं पता कि उस दिन हांसी ऑफिस के अधिकारियों ने वकील को अंदर जाने से क्यों और कैसे रोका था. अगर मेरे वरिष्ठ अधिकारी या आयोग मुझसे जवाब देने को कहेंगे, तो मैं रिकॉर्ड चेक करके जवाब दूंगा.”
2018 बैच के आईपीएस अधिकारी यशवर्धन अब हांसी से दूसरी जगह जा चुके हैं. वह फिलहाल पंचकुला में पुलिस मुख्यालय के क्राइम इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट में एसपी सिक्योरिटी के पद पर तैनात हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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