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Tuesday, 22 September, 2026
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सिक्योरिटी गार्ड बनाम डिलीवरी एजेंट. दिल्ली-NCR की सोसाइटियों में तनाव की नई वजह

कुछ साल पहले सोसाइटी के गेट पर डिलीवरी राइडर बहुत कम दिखाई देते थे. अब हर दिन सैकड़ों डिलीवरी राइडर इन गेटों से गुज़रते हैं, जिससे वहां रहने वालों, गार्ड और काम करने वालों के बीच तनाव की नई स्थितियां पैदा हो रही हैं.

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नोएडा/गुरुग्राम: नोएडा के सेक्टर 50 की एक हाउसिंग सोसायटी के गेट पर 27 साल के सिक्योरिटी गार्ड सूरज कुमार अपनी 12 घंटे की शिफ्ट का काफी समय एक ऐसे काम में बिताते हैं, जो पांच साल पहले जब उन्होंने काम शुरू किया था, तब इस तरह से लगभग होता ही नहीं था: डिलीवरी वर्करों की आवाजाही संभालना.

सिक्योरिटी हेड के तौर पर कुमार अपनी शिफ्ट में सोसायटी में आने वाले निवासियों और मेहमानों के साथ-साथ लगातार आने-जाने वाले डिलीवरी वर्करों को भी संभालते हैं.

रविवार की दोपहर, उन्होंने गेट पर एक दूसरे गार्ड और खाना पहुंचाने वाले एक डिलीवरी वर्कर के बीच बहस सुनी.

गार्ड ने कहा, “घर का नंबर गलत है, इसे दोबारा चेक करो और मुझे बताओ.”

डिलीवरी वर्कर ने जवाब दिया, “नहीं, मैं आपको सही नंबर दे रहा हूं. मेरा समय बर्बाद मत करो, मुझे अंदर जाने दो.”

कुमार बीच में आए. डिलीवरी वर्कर घर के नंबर को लेकर बहस कर रहा था, जबकि गार्ड ने जानकारी चेक कर ली थी और पाया कि निवासी ने अंदर आने की मंजूरी देने से मना कर दिया था.

कुमार ने डिलीवरी वर्कर से नाम और घर का नंबर दोबारा बताने को कहा. पता चला कि उसने गलत नंबर दिया था. जिस निवासी का उसने नाम बताया था, वह दूसरे घर में रहता था.

कुमार ने कहा, “वे सोसायटी में अंदर जाने की इतनी जल्दी में होते हैं कि सही जानकारी चेक करने या देने की भी परवाह नहीं करते.”

“एक गलती की वजह से मुझे दोनों निवासियों के फोन और शिकायतों से निपटना पड़ा–एक गुस्से में था क्योंकि डिलीवरी देर से हुई थी, जबकि दूसरे को ऐसे ऑर्डर के लिए मंजूरी का मैसेज मिला था, जो उसका था ही नहीं.”

दिल्ली-एनसीआर की गेटेड सोसाइटियों में यह अब एक आम होता जा रहा दृश्य है. यह बदलाव दिल्ली-एनसीआर में घर तक सामान पहुंचाने और क्विक-कॉमर्स डिलीवरी के तेज़ी से बढ़ने के बाद आया है. सिक्योरिटी गार्ड का पारंपरिक काम मेहमानों की आवाजाही को नियंत्रित करना और निवासियों की सुरक्षा करना था, लेकिन अब सोसायटी का गेट तेजी से एक लॉजिस्टिक्स चेकपॉइंट बन गया है. यहां गार्ड निवासियों की सुविधा की मांग, समय की कमी में भाग रहे डिलीवरी वर्करों और रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन के बनाए नियमों के बीच फंस जाते हैं.

नोएडा के सेक्टर 50 स्थित स्टेलर किंग्स कोर्ट सोसाइटी के सिक्योरिटी गार्ड ने बताया कि गलत या साफ तौर पर न दिए गए घर के नंबरों को लेकर डिलीवरी एजेंट के साथ सबसे ज्यादा बहस होती है | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट
नोएडा के सेक्टर 50 स्थित स्टेलर किंग्स कोर्ट सोसायटी के सिक्योरिटी गार्ड ने बताया कि गलत या साफ तौर पर न दिए गए घर के नंबरों को लेकर डिलीवरी एजेंट के साथ सबसे ज्यादा बहस होती है | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट

नोएडा के सेक्टर 50 में सिक्योरिटी गार्ड 58 साल के सुशील कुमार ने कहा, “हम मंदिर की घंटी जैसे हैं, कोई भी आए, हमें बजा देता है, चाहे गलती किसी की भी हो.”

नोएडा के सेक्टर 150 स्थित महागुन मेदोज़ के निवासी सुमित कश्यप ने कहा, “सिक्योरिटी गार्ड को कभी-कभी निजी नौकर की तरह समझा जाता है, जबकि डिलीवरी वर्करों को भी सुरक्षा की कमी का सामना करना पड़ता है. दोनों समूह दबाव में काम करते हैं और कई वजहों से अक्सर उनकी अनदेखी होती है. इससे काम के दौरान उनमें निराशा पैदा हो सकती है और आखिर में टकराव की स्थिति बन सकती है.”

कश्यप ने आगे कहा कि कई बार सामान लेने वाले लोगों का व्यवहार भी स्थिति को खराब कर देता है, खासकर जब वे डिलीवरी वर्करों के साथ सख्ती या अधीरता से पेश आते हैं. उनके मुताबिक, पूरे डिलीवरी सिस्टम को मजबूत करने की जरूरत है. डिलीवरी वर्करों को देरी, ऑर्डर रद्द होने या सामान लेने वाले के जवाब न देने जैसी स्थितियों से निपटने की सही ट्रेनिंग दी जानी चाहिए.

कश्यप ने कहा, “कुछ काउंसलिंग सेशन या ट्रेनिंग से वर्करों को मुश्किल स्थितियों से ज्यादा शांति से निपटने और घबराने या बहस में पड़ने से बचने में मदद मिल सकती है. यही बात सिक्योरिटी कर्मचारियों पर भी लागू होती है.”

कश्यप ने कहा, “निवासी भी इस पूरी व्यवस्था का एक ज़रूरी हिस्सा हैं. उन्हें धैर्य रखना और डिलीवरी वर्करों और सिक्योरिटी कर्मचारियों, दोनों के साथ सम्मान से पेश आना सीखना होगा.”

डिलीवरी बढ़ने के साथ सोसाइटियों और RWAs ने भी गेट पर होने वाले तनाव को कम करने के तरीके तलाशने शुरू कर दिए हैं. इनमें गेट-मैनेजमेंट ऐप के जरिए आने वाली डिलीवरी को पहले से मंजूरी देने के लिए निवासियों से कहना और सिक्योरिटी कर्मचारियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार के नियम लागू करना शामिल है.

कई सोसाइटियों ने गेट के ठीक बाहर या उसके पास डिलीवरी बाइक के लिए अलग और चिन्हित पार्किंग की जगह भी बनाई है, ताकि आने-जाने का रास्ता साफ रहे.

सिंह ने कहा, “छोटी और मध्यम आकार की सोसाइटियों में इन स्थितियों को अपेक्षाकृत आसानी से संभाला जा सकता है. लेकिन बड़ी सोसाइटियों में ज्यादा पेशेवर तरीके की जरूरत है. डिलीवरी के सबसे पीक टाइम में जैसे सुबह किराने की डिलीवरी, दोपहर में खाने के ऑर्डर और शाम को पार्सल अलग से ‘लॉजिस्टिक्स मार्शल’ या अतिरिक्त गेट स्टाफ तैनात किया जाना चाहिए. इससे डिलीवरी की एंट्री को सिक्योरिटी के मुख्य काम से अलग संभाला जा सकेगा.”

जब स्कूटर बना विवाद की वजह

सुरक्षा गार्ड सुशील कुमार कुछ दिन पहले हुई एक और घटना को याद करते हैं. उस समय एक डिलीवरी कर्मचारी ने उनसे बहस शुरू कर दी थी. वजह यह थी कि उसे सोसायटी के अंदर अपने इलेक्ट्रिक वाहन से जाने से रोक दिया गया था. सोसायटी के नियमों के मुताबिक, डिलीवरी कर्मचारियों को इलेक्ट्रिक वाहन लेकर अंदर जाने की अनुमति नहीं है.

कुमार ने डिलीवरी कर्मचारी को गेट पर ही रोक दिया, लेकिन वह अपनी बात पर अड़ा रहा. उसका कहना था कि वह इतनी दूर पैदल चलकर नहीं जा सकता और इसलिए उसे अपने इलेक्ट्रिक स्कूटर से अंदर जाने दिया जाए.

गेट पर ही दोनों के बीच बहस शुरू हो गई. सुरक्षा गार्ड सोसायटी के नियमों का पालन कराने की कोशिश कर रहे थे, जबकि डिलीवरी कर्मचारी अपना स्कूटर बाहर छोड़ने के लिए तैयार नहीं था.

कुमार ने कहा, “डिलीवरी करने वाले, खासकर ये कम उम्र के लड़के, अपनी नौकरी जाने की बिल्कुल परवाह नहीं करते. ऐसे घूमते हैं जैसे कोई दबंग हों और किसी की इज्ज़त भी नहीं करते. बस, छोटी-सी बात पर लड़ने लगते हैं.”

नोएडा के सेक्टर 50 में स्टेलर किंग्स कोर्ट सोसाइटी के सिक्योरिटी गार्ड हर दिन 1,000 से ज़्यादा डिलीवरी मैनेज करते हैं | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट
नोएडा के सेक्टर 50 में स्टेलर किंग्स कोर्ट सोसायटी के सिक्योरिटी गार्ड हर दिन 1,000 से ज़्यादा डिलीवरी मैनेज करते हैं | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट

उन्होंने आगे कहा, “ये सोसायटी के नियम हैं. हम भी यहां काम करते हैं, लेकिन डिलीवरी करने वाले बहुत अलग तरह की जल्दबाजी और रवैये के साथ आते हैं.”

आखिरकार, जब सोसायटी के एक निवासी से संपर्क किया गया, तब मामला सुलझा. डिलीवरी कर्मचारी से कहा गया कि वह सोसायटी के नियमों का पालन करे और अपना पार्सल पैदल जाकर पहुंचाए.

कुमार ने बताया, “उसने हमारे साथ 15 मिनट से ज्यादा बहस की. उसकी वजह से गेट पर आने वाले लोगों और दूसरे डिलीवरी कर्मचारियों की लाइन लग गई. इससे ट्रैफिक बढ़ गया और हमारा तनाव और काम दोनों बढ़ गए.”

जब हज़ारों डिलीवरी से गेट पर लग जाती है भीड़

हालांकि, सुरक्षा गार्डों और डिलीवरी कर्मचारियों के बीच होने वाले विवाद हमेशा गेट पर ही सुपरवाइजर या आरडब्ल्यूए (RWA) के पदाधिकारियों की मदद से नहीं सुलझते. कई बार ये विवाद सोशल मीडिया तक पहुंच जाते हैं, सुर्खियां बन जाते हैं और यहां तक कि सुरक्षा एजेंसी के अधिकारियों और पुलिस को भी हस्तक्षेप करना पड़ता है.

इस साल जनवरी में ग्रेटर नोएडा की निंबस सोसायटी में एक डिलीवरी एजेंट के गलत दरवाजे की घंटी बजाने के बाद हिंसक झड़प हो गई थी. डिलीवरी कर्मचारी वहां से जाने के लिए तैयार नहीं था और उसने दरवाजा खोलने वाले निवासी से कहा कि वह पता चेक कर ले.

इसके बाद फ्लैट के मालिक ने सुरक्षा गार्डों को बुलाया. देखते ही देखते सुरक्षा गार्डों और डिलीवरी एजेंट के बीच तीखी बहस शुरू हो गई.

घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. इसमें सुरक्षा गार्डों और डिलीवरी एजेंटों को डंडों और लोहे की रॉड से एक-दूसरे पर हमला करते हुए देखा गया. हालात बिगड़ने के साथ ही कई निवासी और सुरक्षाकर्मी सोसायटी के गेट पर इधर-उधर भागते नजर आए.

बाद में पुलिस मौके पर पहुंची, लेकिन तब तक घटना में शामिल लोग वहां से जा चुके थे और अपनी मोटरसाइकिलें पीछे छोड़ गए थे. रिपोर्ट के मुताबिक, बाद में डिलीवरी कर्मचारी को गिरफ्तार किया गया और उसके खिलाफ तथा कुछ अज्ञात लोगों के खिलाफ दंगा करने, हथियारों का इस्तेमाल करने, गैरकानूनी तरीके से एकत्र होने, चोट पहुंचाने और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत अन्य धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई.

गुरुग्राम और नोएडा के पुलिस थानों में सुरक्षा गार्डों और डिलीवरी एजेंटों से जुड़े विवादों की शिकायतें और एफआईआर आम नहीं हैं. ज्यादातर मामलों में बहस या कहासुनी को सुरक्षा प्रबंधक, एओए (AOA) या आरडब्ल्यूए के सदस्य आपस में ही सुलझा लेते हैं. यहां तक कि जब पुलिस को बुलाया जाता है, तब भी कई बार सोसायटी के सदस्यों की मध्यस्थता से दोनों पक्षों के बीच आपसी समझौता हो जाता है.

नोएडा के सेक्टर 50 में स्टेलर किंग्स कोर्ट सोसाइटी के सिक्योरिटी गार्ड्स ने बताया कि सिक्योरिटी गार्ड्स और डिलीवरी एजेंट्स के बीच अक्सर गलत या साफ न लिखे गए हाउस नंबर की वजह से बहस होती है | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट
नोएडा के सेक्टर 50 में स्टेलर किंग्स कोर्ट सोसायटी के सिक्योरिटी गार्ड्स ने बताया कि सिक्योरिटी गार्ड्स और डिलीवरी एजेंट्स के बीच अक्सर गलत या साफ न लिखे गए हाउस नंबर की वजह से बहस होती है | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट

गुरुग्राम पुलिस के एक अधिकारी ने कहा, “हर मौखिक विवाद पुलिस थाने तक नहीं पहुंचता. जब सुरक्षा गार्ड और डिलीवरी कर्मचारी आपस में उलझते हैं, तो ज्यादातर मामलों को सोसायटी के सदस्य खुद ही सुलझा लेते हैं.”

नोएडा सेक्टर 49 थाने के एक पुलिस अधिकारी ने भी बताया कि हाउसिंग सोसायटियों से जुड़ी शिकायतें, खासकर डिलीवरी कर्मचारियों और सुरक्षा गार्डों के बीच होने वाले विवाद, आमतौर पर पुलिस थाने तक नहीं पहुंचते. पुलिस तभी शामिल होती है जब मामला बढ़कर मारपीट या हिंसा तक पहुंच जाए.

दबाव सोसायटी के गेट पर ही खत्म नहीं होता

26-वर्षीय जहांगीर नोएडा के सेक्टर-50 और 51 में डिलीवरी पार्टनर के तौर पर काम करता है. वह ब्लिंकिट और जेप्टो का सामान पहुंचाने से लेकर जोमैटो के खाने के ऑर्डर तक डिलीवर करता है. सेक्टर 150 की गेटेड सोसायटियों में तैनात कई सुरक्षा गार्ड उसे सिर्फ चेहरे से ही नहीं, बल्कि उसके नाम से भी पहचानते हैं. इसके बावजूद, यह जान-पहचान उसे सुरक्षा गार्डों के साथ होने वाली बहस और टकराव से हमेशा नहीं बचा पाती.

गुरुग्राम में डिलीवरी का काम करने वाले राजू सिंह ने कहा, “हर बार हमारी गलती नहीं होती. हम भी सख्त समय-सीमा के दबाव में काम करते हैं और तय समय के भीतर डिलीवरी पूरी करनी होती है, लेकिन गार्ड और निवासी अक्सर हमारी स्थिति समझने की कोशिश नहीं करते, यहां तक कि हमसे शांति से बात भी नहीं करते.”

उन्होंने कहा, “जैसे ही डिलीवरी में थोड़ी देर होती है, लोग हमें फोन करके चिल्लाना शुरू कर देते हैं, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि हम भी दबाव में काम कर रहे हैं और हमें भी तय समय के भीतर डिलीवरी पूरी करनी होती है.”

ऐसी ही एक घटना को याद करते हुए जहांगीर ने बताया कि एक डिलीवरी पूरी करने के बाद जब वह गेट पर वापस पहुंचा, तो गार्ड्स ने उसे रोक लिया. गार्ड उससे पूछने लगे कि उसे इतनी देर क्यों लगी. जहांगीर ने जब बताया कि जिस व्यक्ति को डिलीवरी देनी थी, उसे दरवाजा खोलने में समय लगा, तो आरोप है कि एक गार्ड उस पर चिल्लाने लगा और देरी के लिए उसे ही जिम्मेदार ठहराने लगा.

जहांगीर ने बताया, “मैंने उससे कहा कि रिसीवर दरवाजा नहीं खोल रहा था, लेकिन वह फिर भी बहस करने लगा. उसने कहा, ‘तुम लोग सोसायटी के अंदर पार्कों में बैठकर फोन पर बातें करने लगते हो.’”

उन्होंने कहा, “हमारे काम में समय की इतनी पाबंदी है कि एक डिलीवरी पूरी करने के बाद अगली जगह पहुंचने के लिए मुश्किल से पांच से 10 मिनट मिलते हैं. वह फिर भी बहस करता जा रहा था. तो क्या मैं चुपचाप खड़ा रहता? क्या मैं जवाब नहीं देता या अपनी आवाज नहीं उठाता?”

जहांगीर ने बताया कि पार्किंग भी अक्सर विवाद की वजह बनती है. खासकर तब, जब किसी डिलीवरी पार्टनर को एक ही सोसायटी में कई ऑर्डर पहुंचाने हों. कुछ निवासी डिलीवरी वाहन को अंदर जाने की अनुमति दे देते हैं, लेकिन कुछ जवाब देने में ज्यादा समय लगाते हैं. ऐसे में डिलीवरी पार्टनर गेट पर इंतजार करता रहता है, जबकि सुरक्षा गार्ड जरूरी मंजूरी मिलने का इंतज़ार करते हैं.

क्विक डिलीवरी बढ़ने से सिक्योरिटी गार्ड्स का काम का बोझ बढ़ गया है | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट
क्विक डिलीवरी बढ़ने से सिक्योरिटी गार्ड्स का काम का बोझ बढ़ गया है | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट

जहांगीर ने कहा, “अगर वे अपना काम कर रहे हैं, तो हम भी अपना काम कर रहे हैं. हमारे वाहनों को खड़ा करने के लिए कोई उचित जगह नहीं है. इतने भारी पार्सल लेकर हम पैदल कैसे घूम सकते हैं? नियम बनाने से पहले क्या कोई इन बातों के बारे में सोचता है?”

जब सुरक्षा गार्ड और डिलीवरी पार्टनर के बीच कोई विवाद होता है, तो आमतौर पर सबसे पहले सुरक्षा प्रबंधक मामले को संभालते हैं. अगर वहां बात नहीं बनती, तो मामला सोसायटी की आरडब्ल्यूए (RWA) या अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन (AOA) के पास पहुंचता है.

एनओएफएफए के अध्यक्ष पुनीत शर्मा ने कहा, “लाइफस्टाइल में बदलाव, खासकर क्विक-डिलीवरी ई-कॉमर्स के बढ़ते चलन के कारण, ऊंची इमारतों वाली सोसायटियों में डिलीवरी से जुड़ी अव्यवस्था तेजी से बढ़ी है. जैसा कि हमने एओए के तौर पर देखा है, डिलीवरी करने वाले कर्मचारियों का एक बड़ा हिस्सा बिना पर्याप्त प्रशिक्षण के काम करता है. ऐसे में डिलीवरी कर्मचारियों और सोसायटी के अंदर उनकी आवाजाही पर सख्ती से नजर रखना सुरक्षा गार्डों के लिए काफी मुश्किल काम है.”

गेट से आगे

गुरुग्राम के सेक्टर 24 स्थित एंबियंस लैगून में सुरक्षा व्यवस्था सिर्फ मुख्य गेट तक सीमित नहीं है. हर ब्लॉक में सुरक्षा गार्ड तैनात हैं और डिलीवरी कर्मचारियों तथा सुरक्षा कर्मियों के बीच होने वाला तनाव गेट से आगे बढ़कर लोगों के घर के दरवाजे तक पहुंच सकता है.

42 वर्षीय कुंवर सिंह यादव पिछले आठ साल से सुरक्षा गार्ड के तौर पर काम कर रहे हैं. वह के ब्लॉक में लिफ्ट के पास प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठते हैं. उनके सामने एक मेज रखी है, जिस पर कुछ बिजनेस मैगजीन और एक अखबार रखा रहता है.

यादव ने बताया, “कई बार डिलीवरी वाले मुझसे कहते हैं कि मैं सामान घर के दरवाजे तक पहुंचा दूं. लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि मुझे सुरक्षा व्यवस्था संभालनी होती है और मैं अपनी ड्यूटी की जगह छोड़कर कहीं नहीं जा सकता. इसके बावजूद डिलीवरी वाला बहस करने लगता है और कहता है, ‘मैं सामान आपकी मेज पर रख देता हूं, निवासी खुद ले लेंगे.’ लेकिन जब मैं निवासी को फोन करता हूं, तो वे उल्टा मुझ पर ही चिल्लाने लगते हैं और पूछते हैं कि मैंने उनका पार्सल क्यों लिया.”

यादव एक बड़ी समस्या की ओर भी इशारा करते हैं. उनके मुताबिक, ऐसा कोई मंच या व्यवस्था नहीं है जहां सुरक्षा गार्ड अपनी रोजमर्रा की परेशानियों से लेकर इन टकरावों, वेतन में देरी, कई सोसायटियों में पीएफ (भविष्य निधि) की सुविधा न मिलने और छुट्टियों से जुड़ी समस्याओं तक अपनी शिकायतें उठा सकें.

यादव ने कहा, “कोई समूह या मंच नहीं है, क्योंकि किसी के पास अपनी आवाज उठाने और नौकरी खोने का जोखिम उठाने की हिम्मत या सहूलियत नहीं है.”

उन्होंने कहा, “हमें अपने लिए भी कुछ चाहिए, लेकिन हम अपनी ही समस्याओं के बारे में बोलने से डरते हैं.”

सूरज कुमार भी सुरक्षा गार्डों के बीच एकजुटता की कमी को लेकर इसी तरह का सवाल उठाते हैं. वह 12 घंटे की शिफ्ट में काम करते हैं और न तो उनकी एजेंसी और न ही सोसायटी उन्हें पीएफ या छुट्टी की सुविधा देती है. उनका कहना है कि इन मुद्दों को मिलकर उठाने की जरूरत है.

उन्होंने यह भी बताया कि सुरक्षा एजेंसियों की संख्या बढ़ने के साथ कम वेतन पर नए कर्मचारियों को काम पर रखना भी आम होता जा रहा है.

सूरज कुमार ने कहा, “मैं इन सभी मुद्दों को उठाना चाहता हूं, लेकिन कोई आगे नहीं आता और मैं अकेले कुछ नहीं बदल सकता.”

उन्होंने कहा, “गार्डों के बीच एकजुटता होनी चाहिए, ताकि हमें वह सम्मान और वे सुविधाएं मिल सकें, जिनके हम हकदार हैं.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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