Sunday, 3 July, 2022
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पिनाकी मिश्रा, नवनीत कृष्णन, गल्ला जयदेव, विजयसाई रेड्डी- दिल्ली में क्षेत्रीय छत्रपों के राजनीतिक दूत

शिवसेना के संजय राउत से लेकर डीएमके के टी आर बालू तक ये राजनेता दिल्ली में अपने नेताओं के आंख और कान के रूप में काम करते हैं और साथ ही केंद्र सरकार के साथ समन्वय रखते हैं.

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नई दिल्ली: नागरिकता संशोधन क़ानून पर राज्यसभा में सरकार का सबसे ज्यादा विरोध करने वाले सबसे प्रमुख चेहरों में अगर कोई एक था तो वो थे तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओ ब्रायन. डेरेक ने अपने बयान में कहा, ‘धर्म के आधार पर नागरिकता देने वाला यह क़ानून राष्ट्रपिता की समाधि पर स्वर्ण अक्षरों पर लिखा जाएगा, पर हिन्दुस्तान के नहीं पाकिस्तान के राष्ट्रपिता जिन्ना की समाधि पर.’

डेरेक देश की सत्ता नगरी दिल्ली में संसद से सड़क तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की आवाज़ हैं, पर केन्द्र की ताक़तवर सरकार में बंगाल की किसी अटकी फाइल को जल्दी निपटाने के लिए डेरेक उतने मुफ़ीद व्यक्ति नहीं है  जितने दिनेश त्रिवेदी.

दिनेश त्रिवेदी अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से लेकर यूपीए तक में रेलमंत्री से लेकर कई मंत्रालयों को संभाल चुके हैं. लेकिन, बीच के समय में ममता के गुडबुक्स से बाहर हो गए. अब दिनेश त्रिवेदी ने फिर से ममता के गुडबुक्स में इंट्री मारी है. अभी नागरिकता क़ानून के विरोध में हुई हिंसा में मारे गए लोगों के परिवारों से मिलने वाली तृणमूल टीम के लिए ममता ने दिनेश त्रिवेदी को यूपी भेजा. एक समय में ममता के दिल्ली पाइंटपर्सन मुकुल राय भी थे. लेकिन, यह सिर्फ मुकुल राय दिनेश त्रिवेदी की कहानी नहीं है, हर क्षेत्रीय दल का मुखिया पावर कैपिटल दिल्ली में सरकार, संसद और उद्योग जगत से समन्वय के लिए एक भरोसेमंद राजनेता रखता है, जो सेंट्रल हाल से लेकर रायसिना हिल्स तक अपने मुखिया के हितों की रक्षा करता है, जरूरत पड़ने पर विपक्ष में रहने पर भी सरकार का समर्थन और बदले में राजनीतिक कीमत इनका मुख्य काम होता है. मुख्यमंत्री की प्रधानमंत्री, गृहमंत्री से मुलाकात कराना. मंत्रालयों में अटकी राज्य की परियोजनाओं को पारित कराना, संसद में विधेयक पर सरकार से राजनैतिक हितों के हिसाब से समन्वय करना मुख्य काम है. एक नज़र डालतें है कौन हैं ये राजनीतिक मैनेजर.

शिवसेना संजय राउत

वाजपेयी सरकार में शिवसेना के प्रतिनिधि के रूप में दिल्ली का काम मनोहर जोशी और अनंत गीते के हवाले था. लेकिन, उद्धव के सेना की कमान संभालने के बाद मोदी सरकार में अरविन्द सावंत के मंत्री होने के बाद भी उद्भव की दिल्ली में आवाज़ संजय राउत ही थे. नागरिकता क़ानून पर लोकसभा में सरकार के पक्ष में मतदान करने के समय भी सांसद संजय राउत से दिशा निर्देश लेते पाए गए. सरकार के फ्लोर मैनेजर संजय राउत से विचार विमर्श करते रहे. अनिल देसाई और अरविन्द सावंत की बात पर कोई भरोसा करने को कोई तैयार नहीं था.

विजयसाई रेड्डी (वाईएसएसआर)

पेशे से चार्टेड एकाउंटेंट 62 वर्षीय विजयसाई रेड्डी जगन रेड्डी के पिता वाईएसआर के करीबी लोगों में रहें है और तब से उनके वित्तीय मामलों को देखने के अलावा उनके राजनैतिक समन्वय को देखते रहें है. राज्यसभा सांसद विजयसाई रेड्डी आंघ्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन रेड्डी के दिल्ली में राजनैतिक दूत कहे जा सकते है. सदन में पार्टी का रूख तय करने ,सरकार से समन्वय करने और ईडी सीबीआई के लंबित मामलों को निपटाने के काम इनके हवाले है.

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जगन रेड्डी की कंपनी संडूर पावर के शेयर की बिक्री के मामले में सीबीआई इन्हें 2012 में गिरफ़्तार भी कर चुकी है. जगन के खिलाफ सारे ईडी के केस में आरोपी नंबर 1 अगर जगन थे तो आरोपी नंबर 2 विजयसाई रेड्डी थे. इससे जगन रेड्डी से उनकी निकटता का अंदाजा आप लगा सकते है. विजयसाई 1978 से रेड्डी परिवार के साथ रहे है. वित्तीय प्रबंधन से लेकर राजनैतिक प्रबंधन में वे जगन के मैन फ़्राइडे हैं.

धारा 370 और नागरिकता संशोधन विधेयक पर सरकार के फ़्लोर मैनेजर विजयसाई के संपर्क में लगातार बने रहे. विजयसाई ने दोनो मसलों पर गृहमंत्री अमित शाह की मुख्यमंत्री जगनरेड्डी से बात कराई. सरकार से निकटता का अंदाजा इस बात से लगा सकते है कि सरकार ने विपक्ष के नेताओं के कोटे ख़ासकर कांग्रेस में कटौती कर विजयसाई को वाणिज्य की स्थायी समिति का अध्यक्ष बनाया है.

आरसीपी सिंह 

26 साल तक आईएसएस रहे रामचंद्र प्रसाद सिंह जो आरसीपी के नाम से जाने जातें है. नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू में नंबर 2 की पोज़ीशन रखते है वे नीतीश की आंख और कान है. एक समय में यह काम राजीव रंजन सिंह उर्फ़ लल्लन सिंह के पास था. लेकिन राजीव रंजन सिंह से मतभेद होने और फिर वापसी के दौरान आरसीपी ने अपनी जगह मजबूत कर ली . राजीव रंजन सिंह की जेटली से नज़दीकी भी उनके ताक़तवर होने की वजह थी. लेकिन जेटली के न रहने से समीकरण में बदलाव आ गया है. अब आरसीपी लल्लन सिंह से ज्यादा पावरफुल हैं. प्रशांत किशोर को जेडीयू में किनारे लगाने के पीछे आरसीपी को ही वजह माना जाता है. नीतीश के निजी सचिव रहे आरसीसी जेडीयू कोटे से रेल मंत्रालय पाने के दावेदार थे.

नीतीश ने आरसीपी का नाम रेलमंत्री के लिए बढ़ाया था. लेकिन केवल एक कैबिनेट मिलने से नाराज जेडीयू ने उसे लेने से मना कर दिया. आरसीपी नीतीश के मित्र, सलाहकार और प्रबंधक के रूप में काम करते हैं. लेकिन, एक ब्यूरोक्रेट की आदत के मुताबिक मीडिया से दूर रहते है.


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पिनाकी मिश्रा

प्यारी मोहन पात्रा, बैजयंत पांडा के नवीन पटनायक की नज़रों से उतरने के बाद पुरी से सांसद और वक़ील पिनाकी मिश्रा नवीन पटनायक के दिल्ली में मैन फ़्राइडे है. कांग्रेस से बीजेडी में आए पिनाकी मिश्रा ने बहुत कम समय में अपने दिल्ली में फैले अपने नेटवर्क की वजह से नवीन के पसंदीदा मैनेजर बन गए. पेशे से सुप्रीम कोर्ट में वक़ील पिनाकी मिश्रा की अहमियत का अंदाजा इस बात से लगा सकते है कि सुप्रीम कोर्ट के दो मुख्य न्यायधीश पिनाकी मिश्रा के परिवार से रहे है, थोड़े दिन पहले सेवानिवृत हुए मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा और रंगनाथ मिश्रा पिनाकी मिश्रा के सर्वोच्च न्यायालय और वकालत में बड़े नेटवर्क की वजह है, पिनाकी मिश्रा के पिता लोकनाथ मिश्रा राज्यसभा सांसद और तीन राज्यों के राज्यपाल रहें हैं. ओडिशा खनन घोटाले के छींटे जब नवीन पटनायक तक पहुचने लगी तो पिनाकी मिश्रा ने नवीन को बचाने के लिए वकीलों की फौज लगा दी थी. इस काम में पिनाकी मिश्रा के दोस्त रहे अरूण जेटली ने भी मदद की. यही कारण था पटनायक ने 2019 में बीजेडी संसदीय दल का नेता पांच बार के सांसद और संसदीय राजनीति के धुरंधर भृतहरि महताब को ना बनाकर पिनाकी मिश्रा को बनाया.

रामगोपाल यादव

अमर सिंह के सपा से निकलने के बाद संसद की रणनीति से लेकर सरकार से समन्वय का काम प्रोफ़ेसर रामगोपाल यादव के पास रहा है. अमर सिंह को पार्टी से निकलवाने में रामगोपाल यादव के योगदान को अमर सिंह पूरे रस के साथ सुनाते है. सपा में दो फाड़ की वजह से रामगोपाल यादव को मुलायम सिंह पार्टी से निकाल चुके हैं. लेकिन, अखिलेश के करीबी रामगोपाल अखिलेश के दिल्ली में भरोसेमंद राजनैतिक गुरू है. मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में कई विधेयकों को पारित कराने में रामगोपाल यादव ने बड़ी भूमिका निभाई, बदले में मुलायम, अखिलेश के खिलाफ केस में रियायत पाई.

सतीश चंद्र मिश्रा

बीएसपी सुप्रीमो मायावती के दिल्ली दरबार का दारोमदार सतीश चंद्र मिश्रा के पास है. पेशे से वक़ील रहे मिश्रा मायावती की ब्राह्मण दलित राजनीति के मुख्य चेहरे रहे है और बहनजी की 2007 में उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों के सहारे सत्ता में वापसी का श्रेय सतीश चंद्र मिश्रा को जाता है. 2002 में मायावती जब ताज कॉरिडोर मामले में फंसी थी, सतीश चंद्र मिश्रा ने अपने क़ानूनी नेटवर्क का इस्तेमाल कर बहनजी को क़ानूनी शिकंजे से बचाने में एडी-चोटी का जोर लगाया था. तब से मायावती के दिल्ली का सारा प्रबंधन सतीश चंद्र मिश्रा के हवाले है.

केशवराव

टीआरएस सुप्रीमो और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के दिल्ली में मुख्य कर्ता धर्ता संसदीय दल के नेता केशवराव हैं, जो लोकसभा चुनाव के समय पूरे देश भर में फ़ेडरल फ़्रंट की संभावनाएं टटोलने में साथ रहे, बेटी कविता के चुनाव हारने के बाद अपने भांजे राज्यसभा सांसद संतोष कुमार को केसीआर दिल्ली के पावर कॉरिडोर में ग्रूम कर रहे है. दोनों महत्वपूर्ण मामलों में केसीआर के वारिस और उनके बेटे केटीआर को अपडेट रखते है.

ग़ल्ला जयदेव

चार टीडीपी राज्यसभा सांसद के बीजेपी में शामिल होने के बाद अमारा राजा बैटरी कंपनी के मालिक जो बहुराष्ट्रीय कंपनी एमरान के लिए बैटरी बनाती है. उसके मालिक ग़ल्ला जयदेव टीडीपी सुप्रीमो चंद्रबाबू नायडू के दिल्ली में नए प्रबंधक हैं. गंटुर से चुने हए ग़ल्ला सबसे घनपति सांसदों में एक थे. 680 करोड़ की संपत्ति के मालिक ग़ल्ला जयदेव इनकम टैक्स के छापे के शिकार हो चुके है जीएमआर के मालिक जीएमआर राव ,सीएम रमेश के पाला बदलने के बाद ग़ल्ला बाबू की सरकार से नज़दीकी बनाने में लगे है अक्सर संसद भवन में इन्हें पीयूष गोयल के कमरे के आस-पास देखा जा सकता है इनकी गोयल से दोस्ती है और तब से सरकार बाबू के उपर नरमी दिखा रही है.


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सुखबीर बादल

चूंकि अकाली दल की अब पंजाब में सरकार नहीं है और सुखबीर बादल खुद संसद आ चुके हैं. सुखबीर बादल की पत्नी हरसिमरत कौर केन्द्र सरकार में मंत्री हैं. नरेश गुजराल अकाली दल की तरफ़ से मीडिया में पार्टी का पक्ष रखते हैं. लेकिन, सरकार से समन्वय और प्रबंधन का काम खुद बादल फैमली अपने हाथ में रखता है. सुखबीर बादल यह सारा काम खुद देखते है.

प्रफुल्ल पटेल

महाराष्ट्र के चुनावों ने भले प्रफुल्ल पटेल और मोदी सरकार की केमिस्ट्री में थोड़ा मट्ठा डाला हो, लेकिन प्रफुल्ल पटेल की नितिन गड़करी, पीयूष गोयल से दोस्ती में कमी नहीं आई है. प्रधानमंत्री मोदी के गुजरात में मुख्यमंत्री रहते शरद पवार से घनिष्ठता की कड़ी प्रफुल्ल पटेल रहे है. प्रमोद महाजन से लेकर जेटली तक प्रफुल्ल सबके गुडबुक्स में रहें हैं. यूपीए के 10 सालों के कार्यकाल में अगर तीन राजनैतिक मैनेजरों ने मनमोहन सिंह सरकार को 2008 में न्यूक्लियर डील पर गिरने से बचाया था. उसमें अमर सिंह सबसे महत्वपूर्ण थे, लेकिन प्रफुल्ल पटेल और प्रेमचंद गुप्ता के योगदान को कांग्रेस नकार नहीं सकती. पटेल पिछले तीन दशकों से शरद पवार के भरोसेमंद होने के साथ दिल्ली की पावर कॉरिडोर की नब्ज पहचानने वाले इक्के रहे है. महाराष्ट्र में एनसीपी कांग्रेस सेना की सरकार आने के बाद प्रफुल्ल फिर से फार्म में वापस लौट रहे हैं.

ए नवनीत कृष्णन

जयललिता के असामयिक मृत्यु के बाद दो गुटों में बंटी एआईडीएमके के लिए मुख्यत राजनैतिक प्रबंधन का काम राज्यसभा सांसद और संसदीय दल के नेता नवनीत कृष्णन देखते हैं ये मुख्यमंत्री के. पलानीस्वामी के सबसे भरोसेमंद लोगों में हैं. पेशे से वक़ील रहे नवनीत राज्य में एडवोकेट जनरल भी रह चुके हैं और अम्मा के ज्यादातर केस में बचाव करने और रणनीति बनाने का ज़िम्मा इनके पास रहा है. लेकिन, दूसरे गुट का प्रतिनिधित्व कर रहे उप-मुख्यमंत्री पनीरसेल्वम का प्रतिनिधित्व और मैनेजमेंट पनीरसेल्वम के बेटे ओ पी रवीन्द्रनाथ के हवाले है.

टीआर बालू

करुणानिधि परिवार के ढेर सारे सांसद होने के बाद भी स्टालिन टीआर बालू पर ज्यादा भरोसा करते है. बालू पुराने नेता है और दिल्ली की पावर गलियारों से भली भांति परिचित हैं. दयानिधि मारण, ए राजा, करुणानिधि की बेटी कनिमोझी के होने के बाद भी बालू की बात अंतिम मानी जाती है.

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में सरकार के सामने राज्यसभा में संख्याबल का जबर्दस्त दबाब था. सरकार संख्या बल न होने के कारण भूमि अधिग्रहण से लेकर 18 से ज्यादा विधेयक पारित कराने में असफल रही. सरकार के संकटमोचक रहे वित्त मंत्री और राज्यसभा में सदन के नेता रहे अरूण जेटली इन मैनेजरों को ख़ुश रखने के लिए हर संसद सत्र के खत्म होने वाले दिन इन राजनैतिक मैनेजरों को अपने कमरे में विशेष लंच दिया करते थे. इन संकटमोचक दूतों के मांगपत्र को लेने में जेटली कभी आनाकानी नहीं करते थे. लेकिन मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में जेटली की असामयिक मौत से अब यह सारा काम गृहमंत्री अमित शाह खुद देखते है और वैसे भी सरकार को राज्यसभा लोकसभा में अब संख्याबल का वैसा टोटा नहीं है.

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