नयी दिल्ली, 21 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि दिव्यांग कैदियों के अधिकारों को मानवीय और अधिकार-आधारित नजरिए के अनुरूप मान्यता दी जानी चाहिए और उन्हें प्रभावी बनाया जाना चाहिए।
न्यायालय ने कहा कि यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कैद किसी भी तरह से संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत निहित मौलिक सुरक्षाओं को कमजोर न करे।
संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा से संबंधित है।
न्यायाधीश विक्रम नाथ और न्यायाधीश संदीप मेहता की पीठ ने देश भर की जेलों में दिव्यांग कैदियों के अधिकारों, हिरासत की स्थिति और संस्थागत सुरक्षा उपायों से संबंधित मुद्दे को उठाने वाली याचिका पर अपना आदेश पारित किया।
पीठ ने कहा कि याचिका में उठाए गए मुद्दों का फरवरी 2026 में गठित सुधार संबंधी उच्चाधिकार समिति द्वारा एक अलग याचिका में अधिक उपयुक्त और प्रभावी ढंग से हल किया जा सकता है।
उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट उच्चाधिकार समिति के कार्यकारी अध्यक्ष हैं।
पीठ ने मंगलवार को पारित अपने आदेश में समिति को निर्देश दिया कि वह दिव्यांग कैदियों को उपयुक्त सहायक उपकरण और अन्य आवश्यक सहायता उपकरण उपलब्ध कराने के लिए एक व्यापक कार्य योजना तैयार करे तथा यह सुनिश्चित करे कि ये उपाय उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप हों।
भाषा अविनाश माधव
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