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Monday, 15 July, 2024
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‘रेत माफिया, गुंडा टैक्स’: अवैध खनन कोई राज की बात नहीं, फिर भी पंजाब में बन रहा है चुनावी मुद्दा

रेत के अवैध खनन के एक चुनावी मुद्दा बनने के साथ ही दिप्रिंट ने एसबीएस नगर और रूपनगर जिलों का दौरा किया और यह पता लगाया कि ऐसी साइटें कैसे और क्यों काम करती हैं, और स्थानीय अधिकारी इस बारे में क्या कर रहे हैं?

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शहीद भगत सिंह नगर / रूपनगर: पंजाब के शहीद भगत सिंह नगर जिले के चांदपुर रुरकी गांव, जहां 15 फुट गहरे गड्ढों के पास पत्थरों के ढेर लगे हैं, में खनन गतिविधियों का केंद्र होने के सारे निशान मौजूद हैं. हालांकि, यहां ऐसी किसी भी साइट (खनन स्थल) को मौजूद नहीं होना चाहिए. दरअसल, चांदपुर रुड़की पंजाब में चल रहे कई अवैध पत्थर/बजरी/रेत खनन स्थलों में से एक है.

दरअसल, रेत का खनन अगले महीने होने वाले चुनावों से पहले इसके सबसे बड़े चुनावी मुद्दों में से एक के रूप में उभरा है और मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी इसके वजह से उठे विवादों के तूफान की केंद में हैं.

इस महीने की शुरुआत में, अवैध रेत खनन मामले में प्रवर्तन निदेशालय द्वारा की गई छापेमारी में सीएम चन्नी के भतीजे भूपिंदर सिंह ‘हनी’ और उनके सहयोगियों के परिसरों से सोना और अन्य कीमती सामान के साथ करीब 10 करोड़ रुपये नगद बरामद किए गए थे.

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि रेत माफिया अक्सर स्थानीय प्रशासन और सत्ता में काबिज सरकार के साथ मिलकर काम करते हैं. अधिवक्ता आर.एस.बैंस, जो पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में अवैध रेत खनन के खिलाफ मामले लड़ रहे हैं, उन्होंने ने दावा किया कि राज्य के सर्वोच्च स्तर का प्राधिकारी वर्ग इसमें शामिल हैं. बैंस ने आरोप लगाया, ‘रेत माफिया ही राज्य मंत्रिमंडल का मालिक हैं. इस वजह से राज्य मंत्रिमंडल नियमों को इतने अस्पष्ट रूप से बनाता है कि वे आसानी से अवैध गतिविधियों को अंजाम देने के लिए तोड़े-मरोडे जा सकते हैं.’

पंजाब के जल निकासी, खनन और भूविज्ञान के प्रभारी मुख्य अभियंता देवेंद्र सिंह ने दिप्रिंट द्वारा फोन कॉल के माध्यम से संपर्क किये जाने पर अवैध रेत खनन कार्यों के खिलाफ दर्ज मामलों की संख्या या आपराधिक कार्रवाई की किसी विशेष जानकारी पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. मुख्य अभियंता ने उल्टा सवाल किया, ‘मुझे कैसे पता चलेगा? कई सारे अपराधी सड़क पर घूम रहे हैं. क्या मैं उन्हें जाकर पकडूं?’

दिप्रिंट ने यह पता लगाने के लिए पंजाब के कई रेत खनन स्थलों का दौरा किया कि यह अवैध गतिविधि कैसे और क्यों होती है, तथा स्थानीय अधिकारी इसके बारे में क्या कर रहे हैं.

‘जब आप वैध रूप से काम करना मुश्किल बना देते हैं, तो अवैधता पनपती है’

मोटे तौर पर रेत खनन नदी के किनारों और झीलों से निर्माण और विनिर्माण कार्य में उपयोग के लिए रेत की निकासी को संदर्भित करता है, लेकिन जब यही काम मानदंडों और दिशानिर्देशों का पालन किए बिना किया जाता है, तो इसके गंभीर पारिस्थितिक दुष्परिणाम होते है.

हालांकि, वैध रूप से मंजूरी प्राप्त करना और नियमों का पालन करना उतना आकर्षक या आसान नहीं होता है जितना कि उन्हें दरकिनार करना या फिर उन्हें तोड़ना.

कंडी संघर्ष समिति के सदस्य परमजीत सिंह, जिसे 2018 में रेत और बजरी माफिया से लड़ने के लिए बनाया गया था, उनके अनुसार, रेत माफिया के काम करने के तौर-तरीके अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन सरकार द्वारा स्वीकृत भूमि से परे खनन कार्यों का विस्तार करना एक अक्सर इस्तेमाल किया जाने वाला तरीका है, वे कहते हैं, ‘अगर सरकार ने कार जितनी बड़ी जमीन के टुकड़े पर खनन करने की अनुमति दी है, तो माफिया तत्व पूरे गैरेज जितनी जगह पर अवैध रूप से खनन करते हैं.’

परमजीत सिंह चांदपुर राउरके, बलाचौर निर्वाचन क्षेत्र, शहीद भगत सिंह नगर के पास एक अवैध खनन स्थल की ओर इशारा करते हैं | फोटो: शुभांगी मिश्रा/दिप्रिंट

सरकार के सस्टेनेबल सैंड माइनिंग मैनेजमेंट गाइडलाइन्स 2016 के अनुसार नदी के किनारों से रेत खनन का कम 3 मीटर की गहराई या नदी की चौड़ाई के 10 प्रतिशत, जो भी कम हो, तक सीमित होना चाहिए,और इसमें यह भी कहा गया है कि रेत या बजरी किसी भी महत्वपूर्ण जलीय संरचना के 200 से 500 मीटर के भीतर से नहीं निकाली जा सकती है.

दिप्रिंट ने तीन रेत खनन स्थलों का दौरा किया और उनमें से प्रत्येक में ऐसे गड्ढे थे जो स्पष्ट रूप से 3 मीटर से अधिक गहरे थे तथा वे सतलुज नदी के बहुत करीब स्थित थे.

अवैध रेत खनन के खिलाफ काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता माखन सिंह ने दिप्रिंट को बताया, ‘खनन कर्मी इस नियम की परवाह नहीं करते हैं. वैसे भी इसे लागू करवाने के लिए यहां आ ही कौन रहा है? वे रेत की खुदाई के लिए 25 फीट (7.62 मीटर) तक का गहरा गड्ढा खोदते हैं.’

उनके अनुसार, मानसून के मौसम में खनन कार्य प्रतिबंधित है, लेकिन यही वह समय होता है जब अवैध गतिविधियां अपने चरम पर होती हैं. माखन सिंह ने दावा किया, ‘मानसून में भी काम कर रहे माफिया को कोई नहीं रोकता. उसी समय वे सबसे ज्यादा पैसा कमाते हैं.’

एडवोकेट बैंस का मानना है कि खनन कार्य के सम्बन्ध में बने कड़े नियमों ने भी इस समस्या में योगदान दिया है क्योंकि उनका पालन करने की तुलना में उनसे बच कर निकलना ज्यादा आसान है. वैध माइनिंग साइटों को पर्यावरण मंजूरी की आवश्यकता होती है, जिसे प्रोसेस होने में एक वर्ष से भी अधिक का समय लग सकता है. एक खनन योजना (माइनिंग प्लान) होना भी आवश्यक है, जिसे अनिवार्य रूप से किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा तैयार किया जाना चाहिए जो या तो इंजीनियरिंग की डिग्री या फिर भूविज्ञान (जियोलॉजी) में स्नातकोत्तर डिग्री रखता हो.

बैंस ने कहा, ‘जब आप वैध रूप से काम करना मुश्किल बना देते हैं, तो अवैधता पनपती है – चाहे वह ड्रग्स हो, शराब हो फिर कुछ और हो. कानूनी प्रक्रियाएं इतनी कठिन हैं कि सरकार को रॉयल्टी देने के प्रति  इच्छुक ईमानदार और मेहनती लोग इस माहौल में काम ही नहीं कर सकते.’ उनका यह भी कहना था कि यदि वैध साइटों को संचालित करना आसान होता, तो अवैध खनन के संचालन के व्यापार का फलना-फूलना बंद हो जाता और समय के साथ यह गायब भी हो सकता था.


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 राजकोष की लगा रही है चपत’

खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957, के तहत यह निर्धारित किया गया है कि कोई भी ठेकेदार जो खनिजों के लिए खनन कार्य करता है, उसे भारत सरकार को रॉयल्टी का भुगतान करना होगा. पंजाब डिस्टिक्ट माइनिंग फाउंडेशन रूल्स, 2018 के अनुसार इस रॉयल्टी का एक तिहाई हिस्सा राज्य सरकार को दिया जाना चाहिए.

पिछले नवंबर महीने में, पंजाब में रेत की कीमत 9 रुपये प्रति क्यूबिक फीट से कम कर  5.50 रुपये प्रति क्यूबिक फीट कर दी गई थी. इसी के साथ राज्य सरकार ने रेत और बजरी के लिए रॉयल्टी को भी 60 रुपये प्रति टन से घटाकर 18.25 रुपये प्रति टन कर दिया है. पंजाब राज्य रेत और बजरी नीति, 2018 (पंजाब स्टेट सैंड एंड ग्रेवल पालिसी, 2018)  के अनुसार राज्य में हर तीन साल में कुल 400 लाख मीट्रिक टन रेत और बजरी के खनन की अनुमति है. अगर यह सारा खनन कानूनी रूप से किया जाता है, तो इससे हर साल सैकड़ों करोड़ की रॉयल्टी प्राप्त होगी.

हालांकि, अवैध खनन रॉयल्टी का भुगतान करने की आवश्यकता को समाप्त कर देता है और इस प्रकार बड़ा व्यक्तिगत लाभ प्रदान करता है. सामाजिक कार्यकर्त्ता बछितर सिंह ने दावा किया कि खनन माफिया एक दिन में करोड़ों रुपये बना रहे हैं. उन्होंने दावा किया, ‘ दो साल पहले जब मैं अदालत में याचिका दायर कर रहा था, तब मैंने एक सर्वेक्षण किया था. इसमें मैंने अदालत में प्रस्तुत किया था कि रेत माफिया  खनन के माध्यम से दैनिक तौर पर औसतन 14.5 करोड़ रुपये कमा रहा है.’ बछितर भी रूपनगर से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं.

‘गुंडा टैक्स’, ग्रामीणों का शोषण’

सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार रेत माफिया ग्रामीणों का कई तरह से शोषण करते हैं. इन्हीं में से एक तरीका है स्टोन क्रशर (पत्थर तोड़ने की मशीन) के मालिकों पर ‘गुंडा टैक्स’ लगाया जाना. संक्षेप में कहे तो, खनन माफिया एक अतिरिक्त ‘कर’ के साथ स्टोन-क्रशर को बजरी में बदलने के लिए कच्चा माल (पत्थर) प्रदान करते हैं.

2015 में खुद एक क्रशर चलाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता माखन सिंह ने बताया कि स्टोन क्रशर वाले अक्सर करोड़ों रुपये के कर्ज में डूब जाते हैं, इसलिए वे हताशा में आकर इसे माफिया के हवाले कर देते हैं.

रूपनगर में स्टोन क्रशर चलाने वाले एक व्यक्ति ने अपना नाम न जाहिर करने की शर्त पर दिप्रिंट को बताया कि वह अपना काम करने के लिए माफिया को 3.5 रुपये प्रति फुट का भुगतान करता है. उसने कहा, ‘अगर हम उनकी आज्ञा का पालन नहीं करते हैं, तो वे हमें धमकाते हैं. हमारे परिवार का जीवन दांव पर है. डर के मारे हम उन्हें वह सब दे देते हैं जो वे चाहते हैं.’

चांदपुर राउरकी, एसबीएस नगर में एक अवैध बजरी खनन स्थल | फोटो: शुभांगी मिश्रा

रूपनगर की उपायुक्त सोनाली गिरी ने कहा कि ‘गुंडा टैक्स’ के खिलाफ कार्रवाई करना मुश्किल है क्योंकि कोई भी पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं करवाता है.

उन्होंने दिप्रिंट को बताया, ‘कई बार स्टोन क्रशर वाले खुद अवैध रूप से पत्थर की खदान का काम करते हैं, इसलिए यह पूरा धंधा स्टोन क्रशर वालों की मिलीभगत से ठेकेदारों द्वारा चलाया जा रहा है. इसका कोई पेपर ट्रेल (कागजी निशान) नहीं है. और बिना एफआईआर के हम कोई कानूनी कार्रवाई नहीं कर सकते.’

परमजीत सिंह का कहना है कि गुंडा टैक्स लगाने के अलावा, माफिया लोग नौकरी के संदिग्ध अवसर देकर और आपसी समझौतों से मुकरकर भी ग्रामीणों का फायदा उठाते हैं. उन्होंने कहा, ‘वे गांवों के बेरोजगार युवाओं को आराम से ईएमआई चुकाने की सुविधा के साथ एक ट्रैक्टर-ट्रॉली देने की पेशकश करते हैं और फिर उन्हें माइनिंग साइट से अवैध रूप से खनन सामग्री को ले जाने के लिए 500 रुपये प्रति दिन और शराब की एक बोतल का भुगतान करते हैं.’

यदि किसी भूखंड पर खनन का काम किया जाता है तो उसके मालिक को 2 रुपये प्रति क्यूबिक फुट का मुआवजा दिया जाना चाहिए, लेकिन माफिया, निश्चित रूप से, कभी इस नियम का पालन नहीं करते हैं.  परमजीत सिंह ने कहा, ‘वे ग्रामीणों से कहते हैं कि वे उनकी जमीन से पत्थरों को हटाने में उनकी मदद करेंगे और बदले में किसानों के खेतों को ताज़ी मिट्टी से भर देंगे. पर ये माफिया न तो ग्रामीणों को भुगतान करते हैं, ना ही वे उनके खेतों को फिर से भरते हैं.’

सामाजिक कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न

इन माफिया तत्वों के खिलाफ काम करने वाले कार्यकर्ताओं का आरोप है कि उनकी शिकायतों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है और उन्हें, अधिकारियों सहित, अन्य लोगों द्वारा अक्सर परेशान किया जाता है.

2020 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में याचिका दायर करने वाले परमजीत सिंह के खिलाफ फिलहाल सात एफआईआर (प्राथमिकियां) दर्ज हैं, जबकि उनके पिता पर 10.प्राथमिकियां दर्ज है.

इन माफिया तत्वों के गुंडे सामाजिक कार्यकर्ताओं को रिश्वत देने या फिर उन्हें डराने-धमकाने का भी प्रयास करते हैं. बछितर सिंह ने दावा किया, ‘माफिया के सदस्यों ने उनका साथ देने के लिए 15 करोड़ रुपये की पेशकश की. मुझ पर तीन बार हमला भी किया गया है.’

पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने इस महीने की शुरुआत में दावा किया था कि वह 40 ऐसे कांग्रेस विधायकों को जानते हैं जो रेत खनन वाली गतिविधियों में शामिल हैं. उन्होंने कहा था, ‘मेरे लिए एक स्थायी रूप से अफसोस करने की बातों में से एक यह है कि मैंने उनमें से कुछ को दंडित क्यों नहीं किया.’  पिछले साल मई में, रूपनगर के एक खनन अधिकारी और उसके दो सहयोगियों को कथित तौर पर वर्षों तक रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.

अवैध खनन पर अंकुश लगाने के लिए रूपनगर, एसबीएस नगर जिले क्या कर रहे हैं?

रूपनगर और एसबीएस नगर जिलों के उपायुक्तों का कहना है कि वे अवैध खनन के मुद्दे से अवगत हैं और इसे रोकने के उपाय करने की कोशिश कर रहे हैं.

एसबीएस नगर के उपायुक्त विशेष सारंगल ने दिप्रिंट को बताया कि रेत खनन के खिलाफ शिकायत दर्ज करने के लिए जिले में एक टोल-फ्री नंबर खोला गया है और अवैध खनन स्थलों की तलाश के लिए ड्रोन भी भेजे जा रहे हैं.

रूपनगर में भी एक टोल फ्री नंबर खोला गया है. वहां की उपायुक्त सोनाली गिरि ने बताया कि जिले में नाका (चेकपॉइंट) टीमें बनाई हैं जो ऐसे ट्रकों, ट्रैक्टरों और ट्रॉलियों के लिए सड़कों की निगरानी करती हैं जो संदिग्ध दिखने वाले माल को ले जा रहे हों. नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए नाका टीमें अक्सर खनन स्थलों पर भी जाती हैं.

हालांकि, उपायुक्त गिरी ने स्वीकार किया कि नाका टीमें केवल ट्रैक्टर या ट्रॉली चालकों को पकड़ने पाने में ही सक्षम हो रही हैं, जबकि उनके मालिकों को कोई छू भी नहीं पा रहा है. गिरी ने कहा, ‘असली किंगपिन अभी पकड़ से बाहर बने हुए हैं.’

फिर भी, रूपनगर जिले में जनवरी 2021 से अब तक अवैध खनन के संबंध में 130 से 40 प्राथमिकियां दर्ज की गई है. गिरी ने कहा,  ‘हमने ग्रामीणों से यह भी कहा है कि अगर पंचायत की जमीन पर कोई अवैध गतिविधि होती है तो हमें तुरंत सूचित करें. कभी-कभी पंचायतें खुद रेत के अवैध खनन में शामिल होती हैं, इसलिए यदि पंचायत भूमि पर खनन की शिकायत हम तक नहीं पहुंचती है, तो हम आवश्यक कार्रवाई करते हैं.‘

सारंगल ने कहा कि एसबीएस नगर में भी यदि कोई अवैध साइट संज्ञान में आती है तो उस पर सख्त कार्रवाई की जाती है.

पिछले हफ्ते 21 जनवरी को बैर साल में एक खनन स्थल पर अवैध खनन के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गयी थी. उस दिन, दिप्रिंट ने इस साइट के पास जाकर देखा कि इलाके में खुलेआम अवैध गतिविधि हो रही है. दसियों ट्रैक्टर ट्रॉलियां खनन स्थल से 4 किमी दूर इंतजार कर रही थीं, और दिप्रिंट ने देखा कि तीन रेत से भरे हुए ट्रक वहां से जा रहे हैं. पुलिस ने इनमें से केवल एक ट्रक को पकड़कर उसके चालक के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है. 22 जनवरी को कुछ अज्ञात लोगों के खिलाफ एक और प्राथमिकी दर्ज की गई.

जब दिप्रिंट ने इस बारे में उपायुक्त सारंगल को बताया, तो उन्होंने तुरंत अपने खनन मामलों के अनुमंडल अधिकारी (एसडीओ) को बुलाया और उनसे ‘सख्त से सख्त संभव कार्रवाई’ करने को कहा.

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