प्रतीकात्मक तस्वीर
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नई दिल्ली: ‘आलू की खेती में एक लाख 90 हज़ार की लागत लगाने के बाद 19 टन आलू की उपज हुई थी. लेकिन 19 टन आलू बेचने के बाद मेरे पास सिर्फ 490 रुपये मिले. हमने उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेज दिया ताकि उनको अपने वादे याद आ जाएं कि हम किसानों की आय दोगुना बढ़ा देंगे.’ ये शब्द हैं आगरा निवासी प्रदीप शर्मा के, जिन्होंने दो दिन पहले ही अपनी कमाई के मात्र 490 रुपये प्रधानमंत्री को भेजे हैं.

प्रदीप शर्मा को पिछले चार सालों से आलू की खेती में लगातार नुकसान हो रहा है. उन्होंने दिप्रिंट को फोन पर बताया, ‘मैंने एक हेक्टेयर में 19 टन आलू उपजाया था. उसका ट्रक भाड़ा, कोल्ड स्टोरेज, बोरी और मंडी का खर्च काटकर 490 रुपये बचे थे. हमें न तो सरकार से कोई मदद मिलती है, न खरीद में, न बीज में, न कीटनाशक में, बस वे लोग किसान किसान चिल्लाते हैं. तो हमने बचे हुए 490 रुपये भी प्रधानमंत्री को भेज दिए.’

प्रदीप शर्मा को आलू बेचने के लिए महाराष्ट्र ले जाना पड़ा क्योंकि आगरा में कोई भी आलू खरीद नहीं रहा. उन्होंने कहा, ‘मुझे अपनी उपज ले जाकर महाराष्ट्र के अकोला में बेचनी पड़ी. हमने दो तरह के भाव में, चार रुपये और छह रुपये किलो में बेचा. इसका कुल दाम हमें मिला 94677 रुपये का. हमारा सारा खर्च काटकर 490 रुपये बचे. जो मिला था वह तो तुरंत भाड़ा और मंडी के खर्च में चला गया, जबकि हमारी लागत ही एक लाख 90 हज़ार थी. आलू की खेती में 1200 रुपये प्रति क्विंटल की लागत आती है. मतलब कि हमारा शुद्ध घाटा एक लाख 90 हज़ार का हुआ. आलू बेचकर जो मिले, वे पूरे तुरंत के खर्च में चले गए. मुझे पूरे सौ प्रतिशत का नुकसान हुआ.’


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अपनी यह कमाई प्रधानमंत्री को भेजने का कारण बताते हुए प्रदीप शर्मा ने कहा, ‘मेरे इलाके में किसानों पर बहुत कर्ज़ है. मुझ पर खुद 32 लाख का कर्ज़ है. किसानों के पास मरने के अलावा कोई चारा नहीं है. मैं चार साल से परेशान हूं. मैंने कसम खा ली है कि मरूंगा तो कलेक्ट्रेट में मरूंगा, लखनऊ या दिल्ली जाकर मरूंगा, मैं अपने घर में नहीं मरूंगा. ये मेरा संकल्प है. पिछले चार सालों में खेती पर संकट बढ़ गया है. आर्थिक तंगी आई है. इन्हीं चार सालों में मेरे दादा जी और मेरे पिता जी का देहांत हुआ. उनके अंतिम संस्कार में एक डेढ़ लाख का खर्च आया. छोटी बहन की शादी की. इसके चलते हमारी आर्थिक हालत और खराब हुई.’

प्रदीप ने जुलाई में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री और डीएम से इच्छामृत्यु मांगी थी, लेकिन उनकी मांगों पर किसी ने भी ध्यान नहीं दिया. वे कहते हैं, ‘अधिकारी हमारा मज़ाक उड़ाते हैं कि पंडित जी क्यों मरने जा रहे हो? हमारे यहां के किसानों पर कर्ज़ है. सभी किसानों पर दस पांच लाख का कर्ज़ है. पहले ये था कि कर्ज़ बढ़ता था तो ज़मीन बेचकर कर्ज़ चुका देते थे. लेकिन नोटबंदी के बाद ज़मीन बिकनी बंद हो गई. आज 30 लाख की ज़मीन को कोई 12 लाख में भी लेने वाला नहीं है.’

प्रदीप शर्मा पर 32 लाख का बैंक कर्ज़ है और उन्होंने कुछ लाख रुपये इधर-उधर से भी कर्ज़ ले रखे हैं. वे आलू और धान की खेती करते हैं. इतना कर्ज़ क्यों लिया, इसके जवाब में प्रदीप शर्मा ने कहते हैं, ‘2015 में मैंने खेती की थी जिसमें मुझे 14 लाख का नुकसान हुआ. सरकार ने फसल में छिड़काव के लिए जो दवा दी, उससे फायदा की जगह नुकसान हुआ. 18 एकड़ आलू की खेती की थी, लेकिन सब नष्ट हो गई.’


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उनके साथ दो साल बाद फिर से यही हुआ. वे बताते हैं, ‘2017 में मैंने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत बीमा कराया. इसके लिए मैंने 34 हज़ार रुपये बीमा कंपनी को दिए. आलू खोदने पर फसल खराब निकली. इस बार भी मुझे 12 लाख का नुकसान हुआ. इसकी मैंने शिकायत की लेकिन आजतक वह बीमा कंपनी हमारे घर नहीं आई. इसकी शिकायत मैंने सबसे की, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई.’

उत्तर प्रदेश में आवारा जानवर भी ऐसी समस्या हैं जिनसे किसान तबाह हो रहे हैं. प्रदीप शिकायत करते हैं, ‘तीन चार साल से आवारा जानवर इतने बढ़ गए हैं कि जो भी खेती करो, सब खा जाती हैं. इस बार भी एक बीघा आलू गायों ने बर्बाद कर दिया.’

प्रदीप शर्मा 2015 से प्रशासन और सरकार के सामने कृषि समस्या का मुद्दा उठा रहा हैं. वे अकेले नहीं हैं. उनके साथ अन्य कई किसान भी हैं. आलू किसानों का संगठन भी है जो उनके साथ खड़ा है, लेकिन यह उतना प्रभावशाली नहीं है जो कि उनका समाधान कर सके.

प्रदीप शर्मा ने अपने अनसुने होने की व्यथा साझा करते हुए कहा, ‘मैंने इतनी जगह शिकायतें की हैं, इतना सरकार को ज्ञापन दिया है, इतनी मांगें रखी हैं कि मेरे पास कागज़ों का भंडार लग गया है. मेरे पास इतने कागज़ात इकट्ठा हैं कि इनसे किसी आदमी की चिता जला दी जाए, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है. आगरा सीडीओ के दफ्तर में हमसे संबंधित कम से कम दो हज़ार कागज़ होंगे. लेकिन आज तक कोई मुझसे पूछने नहीं आया कि क्या परेशानी है.’

प्रदीप ने अपनी समस्याओं और ज्ञापनों की एक फाइल बनाई है जो 100 पेज की है. जब भी कोई बड़ा नेता आता है वे अपनी यह फाइल उसे पकड़ा देते हैं. उन्होंने बताया, ‘मुख्यमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री को यह फाइल दे चुका हूं. उपमुख्यमंत्री को पांच बार यह फाइल दे चुका हूं कि मेरी समस्याएं सुनें.’


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क्या पहले खेती में समस्याएं नहीं थीं, यह पूछने पर प्रदीप शर्मा ने कहा, ‘पहले हम लोगों को इतनी समस्या नहीं थी. दो चार लाख रुपया कर्ज़ हो गया तो एकाध बीघा खेत बेचकर उबर जाते थे. 2015 में मेरी पूरी फसल नष्ट हो गई और बैंकों ने हमें कर्ज़ दे दिया. बैंक न होता तो हम मर गए होते. बैंक ने अच्छा काम किया. हमने सोचा था कि कुछ ज़मीन बेचकर यह कर्ज़ चुका देंगे, लेकिन 2015 में नोटबंदी हुई और अब यह ज़मीन भी खरीदने वाला कोई नहीं है. पिछले तीन चार सालों से हमें किसी भी तरीके से राहत नहीं है.’

उनके दोस्त और किसान आलमगीर ने कहा, ‘सरकार की गलत नीतियों के कारण आलू के किसानों की हालत खराब है. सरकार के पास जो आलू है उसे सरकार 2480 रुपये क्विंटल बेच रही है, लेकिन हमारे आलू के लिए 570 का रेट निकाला है और वह भी खरीद नहीं रही है. इस रेट पर किसी किसान की खरीद नहीं हुई. इस बार इतना उत्पादन हुआ है, कि पूरे इलाके में किसी का भी आलू नहीं बिक रहा है. सरकार ने खरीद की कोई व्यवस्था नहीं की. उत्पादन ज़्यादा हुआ है तो सरकार को इसे खरीद कर निर्यात करना चाहिए लेकिन सरकार की कोई नीति नहीं है. सारे किसानों पर लोन है और सब परेशान हैं.’

प्रदीप शर्मा कहते हैं, आलू की खेती करने वालों का उत्तर प्रदेश में कोई नेता नहीं है. जबकि देश का 40 प्रतिशत आलू उत्तर प्रदेश पैदा करता है. मैं प्रधानमंत्री से कहना चाहता हूं कि वे कोई ऐसी व्यवस्था करें कि हम ज़्यादा उत्पादन करें तो सरकार उसे बर्बाद न होने दे.’

एक ऐसे समय में जब किसान चुनावी राजनीति के केंद्र में हैं और भाजपा कांग्रेस में किसान हितैषी दिखने की होड़ मची है, ऐसे में प्रदीप शर्मा ने प्रधानमंत्री को अपनी इस सीजन की कमाई का 490 रुपया मनीआर्डर करके किसानों की आय दोगुनी करने की बहस ताज़ा कर दी है.


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