Monday, 27 June, 2022
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‘ठाकरे भाऊ’- उद्धव और राज ठाकरे की छाया तले कितनी बदली महाराष्ट्र की राजनीति

एक कार्टूनिस्ट की अभिव्यक्ति से निकली पार्टी से लेकर उत्तराधिकारी के लिए संघर्ष तक पार्टी किस रूप में बदली, इसे विस्तार से पत्रकार और लेखक धवल कुलकर्णी ने अपनी किताब 'ठाकरे भाऊ- उद्धव, राज और उनकी सेनाओं की छाया ' में जिक्र किया है.

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बीते दिनों कार्टूनिस्ट मंजुल को माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर द्वारा भेजे गए नोटिस के बाद बहस तेज हो चली कि किस तरह सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के एक माध्यम ‘कार्टून’ पर लगाम लगाने की कोशिश कर रही है. इसी का प्रतिकार करते हुए शिवसेना के साप्ताहिक मार्मिक में एक कार्टून छपा जिसमें फेसबुक, ट्विटर, मीडिया और कलम को सिर झुकाते दिखाया गया है वहीं कार्टूनिस्ट के ‘ब्रश ‘ को सिर उठाकर मुकाबला करते हुए चित्रित किया गया है.

मार्मिक  को केंद्र में रखकर बात आगे बढ़ाना इसलिए दिलचस्प है क्योंकि जब महाराष्ट्र की सबसे बड़ी पार्टियों में से एक शिवसेना को 19 जून को 55 साल पूरे हो रहे हैं तब उसके उभार और जनता से पहले-पहल रूबरू होने में ‘मार्मिक’ की ही अहम भूमिका रही थी.

ये बात सबको मालूम है कि शिवसेना के संस्थापक दिवंगत बाल ठाकरे कार्टूनिस्ट थे और उन्होंने पार्टी शुरू करने से पहले लंबे वक्त तक बतौर कार्टूनिस्ट काम किया था.

मार्मिक अपने कार्टूनों, व्यंग्य और स्तंभों के माध्यम से मराठी मानुस के मसलों को उठाता रहता था, इससे लोगों के साथ उनका रिश्ता जुड़ता गया, जो आगे चलकर 1966 में एक राजनीतिक पार्टी शिवसेना के रूप में सामने आई. तब से लेकर 2021 तक शिवसेना ने अपने राजनीतिक सफर में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं लेकिन फिर भी वो महाराष्ट्र में अपनी स्थिति को मजबूत किए हुए है.

1966 से लेकर 1990 तक जहां बाल ठाकरे ही शिवसेना की गतिविधियों को देख रहे थे वहीं उसके बाद उनके भतीजे राज ठाकरे और फिर उनके बेटे उद्धव ठाकरे की राजनीति में शुरुआत होती है. राज और उद्धव के आने से पार्टी में काफी बदलाव होता है क्योंकि दोनों ही अपने-अपने स्तर पर एक दूसरे से काफी भिन्न थे. एक मृदुभाषी और अंतर्मुखी तो दूसरा आक्रामक था.

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एक कार्टूनिस्ट की अभिव्यक्ति से निकली पार्टी से लेकर उत्तराधिकारी के लिए संघर्ष (राज और उद्धव) तक पार्टी किस रूप में बदली, इसे विस्तार से पत्रकार और लेखक धवल कुलकर्णी ने अपनी किताबठाकरे भाऊ- उद्धव, राज और उनकी सेनाओं की छाया ‘ में जिक्र किया है.


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शिवसेना और मराठी मानुस

शिवसेना हमेशा ही मराठी मानुस को लुभाने में लगी रही है. जब 1966 में पार्टी की शुरुआत हुई तब भी उसने महाराष्ट्रीय बनाम बाहरी लोगों  का मुद्दा उठाकर लोगों को अपनी तरफ खींचने का काम किया. उस दौर में दक्षिण भारत के कई राज्यों के लोग काम की तलाश में महाराष्ट्र आया करते थे. उस समय उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों की तादाद वहां कम थी जो आगे चलकर काफी बढ़ी और वहां की राजनीति को काफी हद तक प्रभावित किया.

लेखक अपनी किताब में बताते हैं कि बाल ठाकरे के पिता ‘प्रबोधनकार’ केशव सीताराम ठाकरे ने उन्हें एक राजनीतिक दल बनाने का विचार दिया और संगठन का नाम दिया- शिवसेना (शिवाजी महाराज की सेना). प्रबोधनकार का खुद का व्यक्तित्व भी काफी असरदार था.

5 जून 1966 को मार्मिक ने यह घोषणा की कि शिवसेना नामक संगठन की शुरुआत होने जा रही है. शुरुआती दौर में शिवसेना का पूरा जोर सिर्फ मराठी मानुस पर था और उनके भावनात्मक मुद्दों के सहारे वो राज्य में अपना प्रभाव बढ़ा रही थी.

महाराष्ट्र में बड़ी तादाद में बाहर के राज्यों से लोग काम की तलाश में आते रहे हैं और ये वहां की राजनीति का एक मुख्य मुद्दा बना रहा है. इसे समझाने के लिए लेखक ने विस्थापन का इतिहास, मिलों की अर्थव्यवस्था किस तरह चरमराई और विस्थापित बनाम मराठी का द्वंद कैसे शुरू हुआ इसे विस्तार से समझाया है.

लेखक अपनी किताब में बताते हैं, ‘भले ही शिवसेना मराठी भाषी लोगों की हितैषी होने का दावा करती रही हो लेकिन उनके जीवन में वो कोई बड़ा बदलाव नहीं ला सकी. शिवसेना ने महाराष्ट्र की समृद्ध संस्कृति, विरासत के लिए कुछ खास नहीं किया.’


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‘ठाकरे भाऊ’ की राजनीति में शुरुआत

कई सालों तक पार्टी इसी तरह चलती रही लेकिन 1985 के बाद कई तरह के बदलाव आने शुरू हुए. राष्ट्रीय राजनीति भी लगातार बदलती जा रही थी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) हिंदुत्व के सहारे देश में अपनी स्थिति मजबूत बनाने के प्रयास कर रही थी. बाद में शिवसेना ने हिंदुत्व के मुद्दे पर भाजपा से गठबंधन कर लिया जिस कारण उसे महाराष्ट्र में पहली बार सत्ता में आने का मौका मिला.

लेकिन इसी बीच राज ठाकरे की राजनीति में शुरुआत हो चुकी थी. 1988 में जब वो 20 साल के ही थे तब उन्हें भारतीय विद्यार्थी सेना (बीवीएस) का अध्यक्ष बनाया गया. राज अपने चाचा बाल ठाकरे के काफी करीबी थे और उन्हीं की तरह कार्टून बनाना पसंद करते थे. राजनीति में राज ने अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया. लेकिन बाल ठाकरे के बेटे उद्धव भी कुछ साल बाद राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने लगे.

लेखक बताते हैं कि पार्टी में उद्धव का धीरे-धीरे उभार राज के प्रभाव को कम करने के लिए था. राज और उद्धव के बीच दूरियां बढ़ने लगी और इसमें नाटकीय मोड़ तब आया जब 23 जुलाई 1996 को रमेश किणी नाम के एक व्यक्ति की रहस्यमयी ढंग से मौत हो गई. इसका आरोप राज ठाकरे पर लगा.

लेखक बताते हैं, ‘रमेश किणी हत्याकांड मामले ने शिवसेना के अंदर राज के उभार को एक तरह से सीमित कर दिया था. इसके अलावा, कुछ महीने के अंदर ही मीना ताई और बिंदा की मौत हो गई थी और बाल ठाकरे का स्वास्थ्य खराब था, जिसके कारण सेना प्रमुख भावनात्मक रूप से उद्धव के ऊपर अधिक निर्भर होते गए.’

इस बीच पार्टी में लगातार उथल-पुथल जारी रही और राज-उद्धव के बीच असंतोष बढ़ता रहा. लेकिन राज्य में अपने पहले कार्यकाल के बाद शिवसेना-भाजपा ने अपने दूसरे कार्यकाल की भी शुरुआत की.


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उद्धव का उभार और ‘मी मुंबईकर’ अभियान

1999 से लेकर 2004 तक शिवसेना में उठापटक जारी रही. बढ़ते असंतोष के बीच 30 जनवरी 2003 को महाबलेश्वर में राज ठाकरे ने शिवसेना की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का नया कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे को नियुक्त कर दिया.

उद्धव के आने के साथ ही शिवसेना ने बड़े बादलाव की तरफ कदम बढ़ा दिए. हमेशा मराठी मानुस पर जोर देने वाली पार्टी ने हिंदी भाषी लोगों को अपने पक्ष में करने का काम शुरू किया. मुंबई में मराठी से ज्यादा अन्य लोगों की संख्या ज्यादा होती जा रही थी, राजनीति के लिहाज से उन्हें साधना महत्वपूर्ण था.

2004 के विधानसभा चुनाव से करीब एक साल पहले उद्धव ठाकरे ने ‘मी मुंबईकर’ अभियान की शुरुआत की ताकि भाषायी सीमाओं से आगे बढ़कर लोगों के साथ जुड़ा जाए. इसका मूल मकसद उत्तर भारतीय लोगों के बीच पहुंचना था.

लेखक बताते हैं कि शिवसेना के कई नेता इस बात से नाराज थे कि पार्टी मराठी मानुस के एजेंडा से पीछे हट रही है. लेकिन तभी बीवीएस के कार्यकर्ताओं ने रेलवे भर्ती बोर्ड के दफ्तर पर हमला कर दिया और राज ने बाहरी लोगों की नियुक्त का विरोध किया. जिस कारण उद्धव का मी मुंबईकर अभियान सफल नहीं हो सका.

लेकिन बाद के सालों में और 2019 में मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उद्धव ने अन्य लोगों को अपने साथ जोड़ने की पहल जारी रखी.


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राज ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे)

उद्धव ठाकरे से बढ़ते असंतोष के कारण 2006 में राज ठाकरे ने शिवसेना से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने कहा, ‘कुछ लोग हैं जो राजनीति का एक अक्षर नहीं समझते हैं इसलिए मैं शिवसेना से इस्तीफा दे रहा हूं. बालासाहेब ठाकरे में मेरे देवता थे, हैं और बने रहेंगे.’

9 मार्च 2006 को राज ने मनसे के गठन की घोषणा की और 19 मार्च को उसी शिवाजी पार्क में पहली रैली की जहां उनके चाचा बाल ठाकरे ने 1966 में पार्टी की शुरुआत की थी.

जब मनसे बनी तो पार्टी का मुख्य जोर विकास आधारित था लेकिन उसने शिवसेना के ही मुद्दों को अपने मुद्दे बना लिए और उन्हें के सहारे उसे मात देने की कोशिश करने लगी. राज ठाकरे ने सार्वजनिक तौर पर अमिताभ बच्चन और उत्तर भारतीयों पर निशाना साधना शुरू कर दिया. ये राज की मराठी भाषी लोगों में पैठ बनाने की रणनीति का हिस्सा थी.

इसका फायदा मनसे को मिला भी और 2009 में हुए विधानसभा चुनाव में उसके 13 विधायक चुनकर आए जिसने शिवसेना की मुश्किलें बढ़ा दीं.

2009 के बाद मनसे का प्रभाव बढ़ने लगा और उसने कई तरह से राज्य की राजनीति को प्रभावित किया. इस बीच मनसे ने पथ-कर के विरोध में आंदोलन चलाया लेकिन जीत की आत्मुग्धता ने पार्टी को काफी नुकसान पहुंचाया. विचारधारा के लिहाज से स्पष्टता न होना पार्टी के लिए सबसे खतरनाक साबित हुआ, जो उसके पतन का कारण बनी.


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उद्धव और राज

लेखक बताते हैं कि उद्धव और राज के व्यक्तित्व एक दूसरे से भिन्न हैं. एक रूखे स्वभाव का है, आग उगलने वाला नेता है, हद दर्जे का अहंकारी है तो दूसरा भाई अंतर्मुखी है, मृदुभाषी है, रणनीति बनाने में माहिर है.

सार्वजनिक तौर पर देखा भी जाए तो उद्धव ठाकरे हमेशा ही स्थिर और शांत नज़र आते हैं वहीं राज ठाकरे के व्यक्तित्व में एक आक्रामकता दिखाई देती है जो उन्हें उनके चाचा बाल ठाकरे से ज्यादा करीब लाती है.

राज ने हमेशा ही जमीन पर उतरकर राजनीति की है जिसकी शुरुआत 1988 में बीवीएस के साथ हुई थी लेकिन उद्धव हमेशा ही पर्दे के पीछे से काम करते रहे हैं.

उद्धव के नेतृत्व में शिवसेना ने अपनी राजनीति में काफी बदलाव किया है. उसने 2019 में अपने वैचारिक साथी भाजपा को छोड़कर एनसीपी-कांग्रेस के साथ सरकार बनाई और उद्धव फिर से मराठी मानुस के परे जाकर दूसरे लोगों को पार्टी के साथ जोड़ने में लगे हुए हैं. ये कहा जा सकता है कि शिवसेना अब बाल ठाकरे के दौर वाली पार्टी नहीं है, उसने खुद को बदला है.

शिवसेना के उतार-चढ़ाव और 1990 के बाद की महाराष्ट्र की राजनीति को समझने के लिए धवल कुलकर्णी की किताब ठाकरे भाऊ काफी अच्छा दस्तावेज है.

ये किताब मुख्यत: पत्रकारीय दृष्टि से लिखी गई और इसकी लेखनी में ये बात झलकती भी है. इसमें सूत्रों, जानकारों और नेताओं के हवाले से तमाम जानकारियां हैं. किताब के संपादन में काफी कमियां हैं. इसे बेहतर किया जा सकता था. ये किताब पहले अंग्रेज़ी में आई थी. हिन्दी में प्रभात रंजन ने इसका अनुवाद किया है.

(‘ठाकरे भाऊ- उद्धव, राज और उनकी सेनाओं की छाया’ किताब को राजकमल प्रकाशन ने छापा है. धवल कुलकर्णी इस किताब के लेखक हैं और प्रभात रंजन अनुवादक हैं)


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