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Sunday, 1 March, 2026
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पीजीआईएमईआर के चिकित्सकों ने घातक सल्फ़ास विषाक्तता की काट खोजी

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चंडीगढ़, एक फरवरी (भाषा) केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ स्थित स्नातकोत्तर चिकित्सा एंव अनुसंधान (पीजीआईएमईआर) के चिकित्सकों ने एल्युमिनियम फॉस्फाइड (जिसे आमतौर पर सल्फास के नाम से जाना जाता है) नामक घातक कीटनाशक से होने वाली विषाक्तता के उपचार में एक बड़ी सफलता हासिल की है। अधिकारियों ने रविवार को यह जानकारी दी।

पीजीआईएमईआर ने एक बयान में बताया कि संस्थान के आंतरिक चिकित्सा विभाग द्वारा किये गए अनुसंधान में पहली बार प्रदर्शित किया गया कि सल्फास की विषाक्तता के इलाज में ‘‘इंट्रावेनस लिपिड इमल्शन’’ प्रभावी जीवन रक्षक तरीका है।

बयान के मुताबिक इन महत्वपूर्ण निष्कर्षों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित पत्रिका ‘यूरोपियन रिव्यू ऑफ मेडिकल एंड फार्माकोलॉजिकल साइंसेज’ में प्रकाशित किया गया है, जिससे इस अध्ययन को वैश्विक मान्यता मिली है।

पीजीआईएमईआर के मुताबिक ‘‘ अध्ययन के निष्कर्ष स्पष्ट होता कि इस इलाज पद्धति को तुरंत इस्तेमाल करने से एल्यूमीनियम फॉस्फाइड विषाक्तता के इलाज में अहम बदलाव आ सकता है।’’

इसमें कहा गया, ‘‘अध्ययन के परिणाम बेहद उत्साहजनक थे। जिन रोगियों को मानक चिकित्सा उपचार के अतिरिक्त अंतःशिरा लिपिड इमल्शन दिया गया, उनमें मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी देखी गई, साथ ही गंभीर चयापचय अम्लता का तेजी से सुधार हुआ, हेमोडायनामिक स्थिरता में सुधार हुआ तथा सदमे और हृदय संबंधी जटिलताओं से पीड़ित रोगियों सहित गंभीर रूप से बीमार रोगियों में बेहतर परिणाम प्राप्त हुए।’’

चिकित्सकों के मुताबिक इस नवीन उपचार का एक प्रमुख लाभ इसकी व्यावहारिकता है, क्योंकि ‘इंट्रावेनस लिपिड इमल्शन’ सस्ता है, व्यापक रूप से उपलब्ध है, और पहले से ही भारत भर के अधिकांश अस्पतालों में, जिनमें जिला अस्पताल और परिधीय स्वास्थ्य सुविधाएं शामिल हैं, स्टॉक में मौजूद है।

बयान में कहा गया है कि इसकी कम लागत और आसानी से उपलब्धता के कारण, इस चिकित्सा पद्धति में ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में भी लोगों की जान बचाने की क्षमता है, जहां सेल्फ़ोस विषाक्तता का बोझ सबसे अधिक है और उन्नत गहन देखभाल तक पहुंच अक्सर सीमित होती है।

संस्थान ने कहा कि कम लागत और आसानी से उपलब्धता के कारण, इस चिकित्सा पद्धति में ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में भी लोगों की जान बचाने की क्षमता है, जहां सेल्फ़ोस विषाक्तता के मामले सबसे अधिक आते हैं और उन्नत गहन देखभाल तक पहुंच अक्सर सीमित होती है।

इसमें कहा गया, ‘‘एल्युमिनियम फॉस्फाइड विषाक्तता एक गंभीर जन स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है, विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्यों में, जहां अनाज को संरक्षित रखने के लिए इस यौगिक का व्यापक इस्तेमाल होता है। इसलिए इन क्षेत्रों के लिए एक प्रभावी, किफायती और साक्ष्य-आधारित उपचार की उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण है।’’

बयान के अनुसार, यह अध्ययन पीजीआईएमईआर के आंतरिक चिकित्सा विभाग के डीन (अकादमिक), प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष डॉ. संजय जैन के मार्गदर्शन में किया गया था।

भाषा धीरज माधव

माधव

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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