Saturday, 25 June, 2022
होमदेशअंत नहीं, लेकिन ऐतिहासिक कदम-उर्दू प्रेस ने देशद्रोह कानून को निलंबित करने के SC के फैसले को सराहा

अंत नहीं, लेकिन ऐतिहासिक कदम-उर्दू प्रेस ने देशद्रोह कानून को निलंबित करने के SC के फैसले को सराहा

दिप्रिंट अपने राउंड-अप में बता रहा है कि इस सप्ताह उर्दू मीडिया ने विभिन्न घटनाएं कैसे कवर कीं और उनमें से कुछ पर उनका संपादकीय नजरिया क्या रहा.

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नई दिल्ली: केंद्र की तरफ से देशद्रोह कानून के प्रावधानों की फिर से समीक्षा करने तक इसे निलंबित करने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला, ताजमहल में ‘हिंदू मूर्तियां होने का पता लगाने’ के लिए ताजमहल के 22 कमरों को खोलने की याचिका इलाहाबाद हाई कोर्ट की तरफ से खारिज कर दिया जाना और ज्ञानवापी-काशी विश्वनाथ कानूनी विवाद आदि खबरें पिछले सप्ताह उर्दू अखबारों के पहले पन्नों पर सुर्खियों में रहीं.

दिप्रिंट इस सप्ताह के अपने राउंडअप में बता रहा है उर्दू प्रेस में क्या सुर्खियां रहीं और उन पर क्या संपादकीय रुख अपनाया गया.

देशद्रोह कानून पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

देशद्रोह कानून के तहत आरोपों के संबंध में लंबित सभी मुकदमों, अपीलों और कार्यवाही पर रोक लगाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को इंकलाब, सियासत और रोजनामा राष्ट्रीय सहारा ने अपने पहले पन्ने पर प्रमुखता से छापा.

तीनों अखबारों ने इस पूरी कार्यवाही पर बारीक नजर रखी. 10 मई को इंकलाब और सहारा दोनों ने विवादास्पद कानून पर केंद्र के यू-टर्न—इसका बचाव करने से लेकर शीर्ष अदालत को यह बताने तक कि वह भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 124ए के प्रावधानों पर पुनर्विचार करेगा—को पहले पन्ने पर छापा था.

एक दिन बाद, जब शीर्ष कोर्ट ने अपना आदेश पारित किया, तो इंकलाब ने एक लेख में इसे सरकार के लिए ‘झटका’ करार दिया.

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12 मई को इंकलाब में प्रकाशित एक फ्रंट-पेज ओपिनियन पीस में देश के चीफ जस्टिस एन.वी. रमना—जो आदेश पारित करने वाली तीन जजों की पीठ का हिस्सा थे—की यह कहते हुए सराहना की गई कि उन्होंने वो कर दिखाया जिसकी बात तमाम कुशाग्र कानूनविद आजादी के बाद से ही करते रहे हैं, और इसके लिए वह उन सभी लोगों की तरफ से सलाम के पात्र हैं, जिन्हें इस कानून के तहत प्रताड़ना झेलनी पड़ी. इस लेख में आगे यह भी कहा गया कि यह मामले का अंत नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक कदम है.

उसी दिन सहारा में प्रकाशित एक संपादकीय में कहा गया कि आदर्श स्थिति में तो सरकार को खुद ही देशद्रोह कानून पर संज्ञान लेना चाहिए था, जिसका दुरुपयोग किया जा रहा था और जिसके खिलाफ कोर्ट में याचिकाएं दायर की जा रही थी. इसने आगे कहा कि सरकार ने यह समझने में काफी देर लगा दी कि कानून की फिर से समीक्षा किए जाने की जरूरत है.

13 मई के सियासत के संपादकीय में कहा गया कि ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जिनमें राजद्रोह कानून का इस्तेमाल साधारण बयानों पर भी लोगों को गिरफ्तार करने के लिए किया गया और इसके जरिये अक्सर एक्टिविस्ट की आवाज दबाने की कोशिश की गई, जिस वजह से उनमें से कई लोगों को सालों जेल में बिताने पड़े.

ज्ञानवापी मस्जिद पर कानूनी लड़ाई और ताजमहल विवाद

वाराणसी में मालिकाना हक विवाद को लेकर काशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में कोर्ट के निर्देश पर होने वाले सर्वेक्षण को रोकना, और उसके बाद की अदालती कार्यवाही को भी तीनों अखबारों ने पहले पन्ने पर प्रमुखता से जगह दी.

8 मई को इंकलाब ने सर्वेक्षण टीम के ज्ञानवापी मस्जिद में प्रवेश के असफल प्रयास के बारे में खबर छापी. रिपोर्ट के साथ इनसेट में हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी के उस बयान को भी लगाया गया, जिन्होंने उन्होंने कहा था कि सर्वे करने का न्यायिक निर्देश धर्म स्थल अधिनियम, 1991 और बाबरी मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन है.

9 मई को सहारा ने ‘ज्ञानवापी मस्जिद: याचिकाकर्ताओं के बीच मत-भिन्नता’ शीर्षक से पहले पेज पर एक स्टोरी छापी, जिसमें बताया गया कि याचिकाकर्ताओं में से एक विश्व वैदिक सनातन संघ ने अपनी याचिका वापस लेने का फैसला किया है. सियासत ने भी यह खबर पहले पन्ने पर प्रमुखता से छापी.

12 मई को इंकलाब ने मामले की कार्यवाही से जुड़ी खबर छापी. अगले दिन, सियासत ने 17 मई तक सर्वेक्षण पूरा करने के कोर्ट के निर्देश की खबर पहले पन्ने पर छापी.

इस बीच, उसी तरह का एक और विवाद तब शुरू हुआ जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ताजमहल के अंदर 22 बंद कमरों को खोलने की मांग वाली एक याचिका खारिज कर दी. सियासत ने इस खबर को ज्ञानवापी विवाद से जुड़ी अपनी रिपोर्ट के साथ पहले पन्ने पर रखा. सहारा ने भी यह खबर पहले पन्ने पर छापी.


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जहांगीरपुरी और शाहीन बाग मामला

9 मई को इंकलाब और सहारा ने रोहिणी कोर्ट की उन कड़ी टिप्पणियों को प्रमुखता से छापा जो उसने पिछले महीने उत्तर पश्चिमी दिल्ली स्थित जहांगीरपुरी में भड़की सांप्रदायिक हिंसा की घटना को लेकर की थीं. अदालत ने हनुमान जयंती जुलूस को रोकने में दिल्ली पुलिस के ‘पूरी तरह से नाकाम’ रहने पर टिप्पणी की—जो कथित तौर पर बिना अनुमति के निकाला गया था और इसके दौरान ही हिंसा हुई थी. इसने साथ ही कहा कि ‘यदि किसी भी तरह से’ इसमें पुलिस की कोई मिलीभगत थी तो उसकी जांच की जानी चाहिए.

एक अन्य लेख में इंकलाब ने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट जमीयत उलमा-ए-हिंद की तरफ से दायर याचिका पर सुनवाई करेगा जो ‘बुलडोजर वाली उस घातक राजनीति के खिलाफ दायर की गई जिसे भाजपा शासित राज्यों में अपराधों को रोकने की आड़ में अल्पसंख्यकों, खासकर मुस्लिमों को खत्म करने के उद्देश्य से साथ शुरू किया गया है.’

10 मई को इंकलाब और सहारा ने दिल्ली के शाहीन बाग में कथित अतिक्रमण के खिलाफ एक नागरिक निकाय की कार्रवाई पर खबर छापी. इंकलाब ने अपने पहले पेज पर लिखा कि सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और जमीयत उलमा-ए-हिंद की याचिकाओं पर सुनवाई की थी, जिसमें अतिक्रमण विरोधी अभियान पर रोक लगाने की मांग की गई थी.

शीर्ष अदालत ने इस अभियान पर रोक लगाने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ताओं को दिल्ली हाई कोर्ट जाने को कहा. अदालत ने नागरिक निकाय से ‘बिना नोटिस जारी किए अतिक्रमण नहीं हटाने’ को भी कहा.

सहारा की रिपोर्ट में बताया कि अतिक्रमण हटाने शाहीन बाग पहुंचे निगम अधिकारियों को स्थानीय निवासियों की तरफ से बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए जाने के बीच अपने बुलडोजर लेकर लौटना पड़ा, जो अभियान का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतर आए थे.

मुस्लिम आबादी और जनगणना

9 मई को सहारा ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (एनएफएचएस-5) के आंकड़ों का हवाला देते हुए लिखा कि पिछले दो दशकों में भारत के मुसलमानों के बीच प्रजनन दर में सबसे तेज गिरावट दर्ज की है. प्रजनन दर में 47 फीसदी की गिरावट आई है, जो 1992-93 में 4.4 से घटकर 2019-2021 में 2.3 तक पहुंच गई, जब इस तरह का पहला सर्वेक्षण किया गया था.

10 मई के संपादकीय में इंकलाब ने लिखा कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की ताजा रिपोर्ट ने ‘हिंदुत्ववादी तत्वों के झूठ और उनके द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम को उजागर कर दिया है.’ इसने आगे कहा कि यह ‘संप्रदायवादियों की कोई नई रणनीति नहीं है’, जो काफी लंबे समय से ही ‘बहुसंख्यक लोगों के दिमाग में यह बात बैठाने में लगे हैं कि देश की मुस्लिम आबादी जल्द ही हिंदुओं से अधिक हो जाएगी.’

पेपर में 10 मई को एक लेख में भारत में पुलिस सुधारों पर लंबे समय से जारी बहस पर केंद्रित था. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अत्याचार के खिलाफ राष्ट्रीय अभियान की 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर दिन औसतन छह लोग हिरासत में दम तोड़ देते हैं.

उसी दिन एक लेख में सहारा ने बताया कि केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने घोषणा की थी कि अगली जनगणना ई-सेंसेस होगी, जो अगले 25 वर्षों के लिए देश की विकास योजना का खाका तैयार करेगी. उन्होंने यह भी कहा कि भारत के जन्म और मृत्यु रजिस्टर को जनगणना से जोड़ा जाएगा.

बिजली की कमी

पिछले एक सप्ताह से बढ़ता तापमान और बिजली की कमी उर्दू अखबारों में सुर्खियों का स्थायी विषय रहा. इंकलाब ने 7 मई को ‘आफ्टर हाई इन्फ्लेशन इट्स है हाय बिजली’ शीर्षक से प्रकाशित संपादकीय में लिखा कि पहले ही महंगाई से जूझ रही आबादी को अब ऐसे समय में बिजली की कमी की दोहरी मार झेलनी पड़ रही है जब तापमान लगातार बढ़ रहा है.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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