Friday, 27 May, 2022
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‘हिंदुस्तान से अब मन खट्टा हो गया’: ना दाम, ना सवारी और ना ही कमाई

एक तरफ जहां पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से लोग परेशान हैं वहीं कुछ इलाकों में सीएनजी की कीमत 100 रुपए तक भी पहुंचने वाली है.

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नई दिल्ली: दिल्ली की लाइफलाइन कहे जाने वाले ऑटो-रिक्शा के चालक इन दिनों महंगाई की मार झेल रहे हैं. पीले और हरे रंग के 80 हजार से ज्यादा ऑटो दिल्ली की सड़कों पर दिन रात दौड़ते हैं लेकिन सीएनजी की बढ़ती कीमतों ने उनकी रफ्तार थाम दी है.

पेट्रोल-डीजल के बाद सीएनजी की लगातार बढ़ती कीमतों के कारण दिल्ली में ऑटो-रिक्शा चालकों को अपने घर-बार चलाने की मुश्किलात का सामना करना पड़ रहा है. इसके साथ ही पड़ोसी देश नेपाल से भारत आकर ऑटो चलाने वाले राजेश पाण्डेय तो अब देश छोड़कर वापस अपने मुल्क जाने के बारे में सोचने लगे हैं.

दिल्ली के शाहदरा में बीते 4 दशक से रह रहे राजेश पाण्डेय मूलत: नेपाल के काठमांडू के रहने वाले हैं और राष्ट्रीय राजधानी में अपना गुजर-बसर करने के लिए लंबे समय से ऑटो चलाते हैं.

दिप्रिंट से बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘हिंदुस्तान से अब मन खट्टा हो गया है. अब अपने देश नेपाल जाकर रहूंगा. वहीं काम करूंगा, महंगाई के कारण अब यहां रहना बहुत मुश्किल हो रहा है.’

उन्होंने कहा, ‘सीएनजी की कीमतें लगातार बढ़ती ही जा रही है. उस हिसाब से कमाई नहीं हो पा रही है और सवारी भी उचित दाम नहीं देते और मोलभाव करते हैं.’

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पाण्डेय ने बताया कि दिन में 12 घंटे सड़क पर रहते हैं लेकिन आधे समय यानी की 6 घंटे खाली ही रहना पड़ता है क्योंकि काम ही बहुत कम है.

इसी तरह की बात रोहित नाम के एक ऑटो चालक ने बताई. उन्होंने दिप्रिंट को बताया, ‘रोड पर सवारियां हैं नहीं, जो मिलती भी है वो मीटर से चलने की बात करती है और ठीक दाम भी नहीं मिलता.’

वहीं दूसरी तरफ सीएनजी पर चलने वाली ओला और उबर की कैब्स भी सवारियों के लिए जल्दी उपलब्ध नहीं हो पा रही है.

राहुल नाम के एक सवारी ने बताया, ‘नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए जब उन्होंने कैब बुक की तो उनकी 4 बार कैब कैंसिल हुई जिसके बाद उन्होंने सामान्य ऑटो से सफर करना तय किया.’ उन्होंने बताया कि कैब समय से नहीं मिलती है.

दिल्ली में हाईवे पर ट्रैफिक / फोटो: प्रशांत विश्वनाथन

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बढ़ते ई-रिक्शा और कुछ आशंकाएं

हालांकि पाण्डेय का कहना है कि दिल्ली में जिस तेजी से ई-रिक्शा बढ़े हैं उससे उनकी कमाई पर बहुत बुरा असर पड़ा है. उन्होंने बताया, ‘अब कम दूरी के लिए लोग ई-रिक्शा का ही इस्तेमाल करते हैं जिसका सीधा असर ऑटो वालों पर पड़ा है.’

दिल्ली सरकार भी राजधानी को भारत की ईवी कैपिटल बनाने को लेकर ईवी पॉलिसी लेकर आई है जिसके तहत बैटरी इलेक्ट्रिक व्हिकल्स की बिक्री बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है. इसके तहत 30 हज़ार रुपए तक की सब्सिडी और लोन पर 5 प्रतिशत की छूट भी दी जा रही है ताकि ज्यादा लोग इसकी तरफ आकर्षित हो.

हालांकि इसे लेकर ऑटो चालकों के मन में कई आशंकाएं भी हैं.

पूर्वी दिल्ली में रहने वाले विनोद कुमार दो ऑटो-रिक्शा के मालिक हैं. ई-व्हिकल्स को लेकर चुनौती पर उन्होंने दिप्रिंट को बताया, ‘मेरे पास दो गाड़ियां हैं. एकतरफ सीएनजी के दाम बेतहाशा बढ़ रहे हैं दूसरी तरफ केजरीवाल सरकार ई-व्हिकल्स पर सब्सिडी दे रही है. सीएनजी के दाम ऐसे ही बढ़ते रहे तो मुझे दोनों गाड़ियां बेचनी पड़ेगी और ई-व्हिकल खरीदना पडे़गा, जो मेरे लिए आर्थिक बोझ लेकर आएगा.’

Representational image of an e-rickshaw in Delhi | Commons
ई-रिक्शा | कॉमन्स

गौरतलब है कि दिल्ली में सीएनजी की मौजूदा कीमत 71.61 रुपए प्रति किलो है. बीते महीने अप्रैल में ही दो-तीन बार सीएनजी की कीमतों में वृद्धि हुई थी जिसके बाद ऑटो, टैक्सी और कैब चालकों के विभिन्न संगठन 18 से लेकर 19 अप्रैल तक दो दिन के लिए हड़ताल पर थे.

एक तरफ जहां पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से लोग परेशान हैं वहीं कुछ इलाकों में सीएनजी की कीमत 100 रुपए तक भी पहुंचने वाली है. राजस्थान के चित्तौड़ और उदयपुर में सीएनजी की कीमत 93.95 रुपए प्रति किलो है.

रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर तेल के दाम बढ़ने के बाद लोग सीएनजी से चलने वाली गाड़ियों की तरफ काफी तेजी से शिफ्ट होने लगे हैं. साथ ही भारत में नई कार खरीदने वाले ग्राहकों के बीच सीएनजी गाड़ी खरीदने को लेकर भी काफी आकर्षण दिख रहा है.


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‘दिहाड़ी निकालनी भी मुश्किल’

किराए की गाड़ी चलाने वाले राजेश पाण्डेय का परिवार जब नेपाल छोड़कर संभावनाओं की तलाश में भारत आया था, तब वे महज 3-4 साल के थे. उनकी परवरिश और पढ़ाई लिखाई शाहदरा में ही हुई जिसके बाद वो अपना घर चलाने के लिए ऑटो-रिक्शा चलाने लगे.

उन्होंने दिप्रिंट को बताया, ‘नेपाल पहाड़ी इलाका है. वहां खेती-बाड़ी और रोजगार के अवसर भी काफी कम है इसलिए हमारा परिवार वहां से भारत आया था. लेकिन यहां अब स्थिति रहने लायक नहीं बची है. सबकुछ महंगा हो गया है.’

उन्होंने बताया, ‘सीएनजी के दाम बढ़ने से कमाई पर भी काफी असर पड़ा है. पहले गाड़ी की सीएनजी टंकी 150 रुपए तक में पूरी भर जाती थी लेकिन अब 250-300 रुपए तक लग जाते हैं.’

किराए की ऑटो-रिक्शा चलाने वाले पाण्डेय कहते हैं कि गाड़ी मालिक को 350 रुपए दिहाड़ी देना भी अब मुश्किल हो गया है.

रोहित भी किराए की गाड़ी चलाते हैं जिसकी दिहाड़ी 300 रुपए प्रतिदिन है. उनका कहना है कि दिहाड़ी निकालना भी एक बड़ी चुनौती हो चुकी है.

बता दें कि दिल्ली में करीब एक लाख ऑटो-रिक्शा चलते हैं वहीं 80 हज़ार से ज्यादा पंजीकृत टैक्सी भी है.

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दिल्ली ऑटोरिक्शा (प्रतीकात्मक तस्वीर) | फोटो: प्रवीण जैन/ दिप्रिंट

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हड़ताल से भी नहीं निकला समाधान

पाण्डेय एकमात्र ऑटो चालक नहीं हैं जो महंगाई से जूझ रहे हैं. दिल्ली के ऑटो चालकों का कहना है कि यूनियन के कहने पर दो दिन का हड़ताल तो किया लेकिन उससे कोई समाधान नहीं निकला. उन दो दिनों में भी कुछ कमाई नहीं हो पाई.

विक्रम नाम के एक ऑटो चालक ने बताया, ‘दो दिनों की हड़ताल से कोई फायदा तो नहीं हुआ. उन दिनों भी लोगों ने गाड़ियां चलाईं.’

विक्रम की शिकायत है कि ऑटो का कोई मजबूत यूनियन नहीं है जिस वजह से उनकी मांगों को ठीक से नहीं उठाया जाता है और उसका कोई असर भी नहीं पड़ता.

हालांकि रोहित नाम के ऑटो चालक का कहना है कि हड़ताल के बाद भी वही स्थितियां है लेकिन फर्क इतना जरूर पड़ा है कि उसके बाद सीएनजी की कीमतें नहीं बढ़ी है.

वे कहते हैं, ‘बढ़ती महंगाई के कारण परिवार चलाना तो काफी मुश्किल हो रहा है लेकिन अब क्या ही किया जा सकता है. किसी कंपनी में काम करेंगे तो 10-12 हजार रुपए मिलेंगे. उससे तो अच्छा है कि यही काम कर लिया जाए. थोड़ी मेहनत ज्यादा करते हैं तो गुजर बसर चल जाती है.’

गौरतलब है कि दिल्ली ऑटो रिक्शा संघ के महासचिव राजेंद्र सोनी ने बीते महीने 11 अप्रैल को दिल्ली सचिवालय के बाहर प्रदर्शन किया था और दिल्ली सरकार से सीएनजी की कीमत को घटाने और 35 रुपए प्रति किलो की दर से सब्सिडी देने की मांग की थी.

हालांकि दिल्ली के परिवहन मंत्री कैलाश गहलोत ने 15 अप्रैल को ऑटो-रिक्शा संगठनों से एक समिति बनाकर किराए में संशोधन करने की घोषणा की थी. लेकिन उस पर भी अभी तक कुछ नहीं हो पाया है.


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