शिमला: पंजाब के मैदानी इलाकों और हिमाचल प्रदेश की पहाड़ियों के बीच आने-जाने वाले पर्यटकों, व्यापारियों और परिवारों के लिए जीवनरेखा माने जाने वाले कीरतपुर साहिब-मनाली हाईवे पर बुधवार को एक अलग ही नज़ारा देखने को मिला. दोपहर की तेज़ धूप के बीच, पारंपरिक नीले वस्त्र पहने निहंग सिखों का एक समूह, जिनमें कुछ के पास भाले और कृपाण थीं, पंजाब के रोपड़ जिले में गारा मोरा टोल प्वाइंट के पास खड़ा था.
वह पूरी तरह से यातायात नहीं रोक रहे थे, लेकिन पंजाब में प्रवेश करने वाले हिमाचल प्रदेश नंबर वाले वाहनों को चुनकर रोक रहे थे. उनसे जिस चीज़ की मांग की जा रही थी, उसे “खालसा टैक्स” कहा गया. इसमें निजी कारों से 100 रुपये और ट्रक तथा बसों से इससे अधिक राशि “सरबत दा भला” यानी सभी के कल्याण के नाम पर स्वैच्छिक योगदान के रूप में मांगी जा रही थी.
कुछ लोगों ने जल्दी पैसे दे दिए. शायद उन्हें लगा कि बिना परेशानी आगे बढ़ने के लिए यह छोटी सी कीमत है या फिर उन्होंने निहंगों की पारंपरिक प्रतिष्ठा का सम्मान किया. वहीं कुछ लोग हैरान नज़र आए. उन्होंने सवाल पूछे और फिर योगदान दिया. जानकारी के अनुसार यह वसूली सिर्फ लगभग एक घंटे तक चली, सुबह 11:30 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक.
यह सिर्फ सड़क किनारे होने वाला कोई सामान्य प्रदर्शन या प्रतीकात्मक अभियान नहीं था, बल्कि हिमाचल प्रदेश और पंजाब दोनों सरकारों को एक साफ चेतावनी थी कि एंट्री टैक्स के विवादित मुद्दे पर सीमा क्षेत्रों के लोगों का धैर्य अब खत्म हो रहा है.
निहंग नेता अच्छर सिंह ने कहा कि यह पहल हिमाचल प्रदेश में प्रवेश करने वाले पंजाब के वाहनों पर लगाए गए एंट्री टैक्स के विरोध में शुरू की गई है. उनका दावा है कि यह मुद्दा लंबे समय से उठाया जा रहा है, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला है.
तरना दल सहित निहंग संगठनों ने कई हफ्तों से ऐसी कार्रवाई की चेतावनी दे रखी थी. यह आंदोलन हिमाचल एंट्री टैक्स संघर्ष समिति के व्यापक अभियान का हिस्सा है. परिवहन कारोबारियों, किसानों, व्यापारियों और धार्मिक संगठनों के समर्थन से चल रहे इस आंदोलन में प्रदर्शनकारियों का कहना है कि हिमाचल का यह टैक्स पड़ोसी राज्यों के उन लोगों पर अनुचित बोझ डालता है जो रोजाना काम, शिक्षा, इलाज, पारिवारिक मुलाकात या पर्यटन से जुड़े व्यवसाय के लिए सीमा पार करते हैं.
इस इलाके में कई परिवारों के रिश्तेदार और आर्थिक संबंध दोनों राज्यों में फैले हुए हैं. ऐसे में लोगों को यह टैक्स बुनियादी ढांचे के लिए धन जुटाने से ज्यादा, रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लगाए गए जुर्माने जैसा महसूस होता है.
संक्षिप्त वसूली अभियान के बाद किसान नेताओं और स्थानीय पुलिस की अपील पर संगठनों ने अपना अभियान फिलहाल रोक दिया. उन्होंने पर्यटन सीजन शुरू होने से पहले तनाव न बढ़ाने की सलाह दी थी, लेकिन निहंग समुदाय की प्रमुख आवाज़ बाबा अच्छर सिंह महाकाल ने साफ कर दिया कि यह सिर्फ अस्थायी विराम है.
पंजाब सरकार को कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए उन्होंने 10 दिन का अल्टीमेटम जारी किया. उन्होंने कहा, “पंजाब सरकार को 10 दिन का अल्टीमेटम…हिमाचल को ‘जैसे को तैसा’ जवाब देते हुए समान (रिसिप्रोकल) टैक्स लगाने की घोषणा करे या संगठनों के साथ बैठक कर अपना रुख साफ करे. अगर ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो बॉर्डर पर मजबूरन स्थायी मोर्चा लगा दिया जाएगा और आंदोलन को और तेज किया जाएगा.”
उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया—चाहे हिमाचल के वाहनों पर समान टैक्स लगाने की घोषणा हो या स्पष्ट बातचीत के लिए बैठक—तो निहंगों के पास सीमा पर स्थायी मोर्चा लगाने और आंदोलन को और तेज़ करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा.
ज़मीन पर लोग कैसे झेल रहे हैं यह विवाद
आम लोगों के लिए यह सिर्फ नीतियों पर होने वाली बहस नहीं है. चंडीगढ़ और मनाली के बीच नियमित रूप से सामान ढोने वाले ट्रांसपोर्टर बलविंदर सिंह इस पूरे घटनाक्रम को देखते हुए कहते हैं, “हर बार जब मैं हिमाचल में प्रवेश करता हूं, तो इसका असर महसूस करता हूं. वहां की सड़कें मुश्किल हैं, मैं समझता हूं—भूस्खलन होता है, बर्फ पड़ती है और दूसरी प्राकृतिक चुनौतियां भी हैं, लेकिन जब रोजी-रोटी के लिए हफ्ते में कई बार सीमा पार करनी पड़ती है, तो ये शुल्क जेब और मन दोनों पर बोझ डालने लगते हैं. अब निहंगों की यह जवाबी कार्रवाई…यह दिखाती है कि लोग कितने परेशान हो चुके हैं.”
यह विवाद इस साल फिर तब भड़क गया जब हिमाचल प्रदेश ने 1975 के हिमाचल प्रदेश टोल अधिनियम के तहत एंट्री टैक्स की दरों में संशोधन किया. हालांकि, बाद में राज्य सरकार ने कुछ प्रस्तावित बढ़ोतरी वापस ले ली, खासकर निजी वाहनों के लिए, लेकिन टैक्स को पूरी तरह खत्म करने की मुख्य मांग अब भी पूरी नहीं हुई है.
1 जून को यह विरोध और तेज़ हो गया, जब पंजाब-हिमाचल सीमा के कई प्रवेश बिंदुओं पर प्रदर्शनकारियों ने जाम लगाया. इससे प्रमुख मार्गों पर घंटों तक यातायात प्रभावित रहा. निहंग समूहों के इस आंदोलन में शामिल होने से, जो पहले मुख्य रूप से आर्थिक मुद्दा था, उसमें सांस्कृतिक और अधिक मुखर स्वर भी जुड़ गया है.
हिमाचल प्रदेश के अधिकारी अपने रुख पर कायम हैं. उनका कहना है कि पहाड़ी राज्य में बुनियादी ढांचे के रखरखाव के लिए यह टैक्स बेहद जरूरी है. हर साल लाखों पर्यटक राज्य में आते हैं और इस टैक्स से मिलने वाली आय का उपयोग भूस्खलन, भारी बर्फबारी और अनियमित मौसम जैसी प्राकृतिक चुनौतियों से होने वाले नुकसान की मरम्मत पर किया जाता है.
राज्य के राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने इस मुद्दे पर खास तौर पर खुलकर अपनी बात रखी है. उन्होंने “खालसा टैक्स” विरोध को भाजपा की साजिश बताया है, जिसका उद्देश्य असली समस्याओं का समाधान करना नहीं बल्कि अस्थिरता और राजनीतिक परेशानी पैदा करना है.
नेगी ने दिप्रिंट से कहा, “यह सब भाजपा करवा रही है. राज्यों को एंट्री टैक्स लगाने का अपना अधिकार है. अब भाजपा कुछ लोगों को उकसाकर मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है. अगर हमारे लोगों को परेशानी होगी, तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए हम हर ज़रूरी कदम उठाएंगे.”
पंजाब की ओर से फिलहाल प्रशासन का ध्यान कानून-व्यवस्था बनाए रखने पर है. बुधवार को वसूली के दौरान पुलिस मौके पर मौजूद थी, लेकिन किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं मिली.
अब राज्य सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है, क्योंकि निहंगों द्वारा दिया गया 10 दिन का अल्टीमेटम धीरे-धीरे खत्म होने की ओर बढ़ रहा है. चंडीगढ़ और शिमला के बीच सक्रिय मध्यस्थता की मांग भी तेज होती जा रही है.
पंजाब सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दिप्रिंट से कहा, “इस मुद्दे को कैसे सुलझाना है, यह दोनों राज्यों की सरकारों को तय करना है. इसके लिए किसी असाधारण प्रयास की जरूरत नहीं है, बल्कि सिर्फ ईमानदारी से समस्या का समाधान करने की जरूरत है.”
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