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आर्कबिशप ओस्‍वाल्‍ड ग्रेसिअस | कॉमंस
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मुंबई: जब मुंबई के आर्कबिशप कार्डिनल ओस्वाल्ड ग्रेशस गुरुवार को वेटिकन द्वारा आयोजित यौन उत्पीड़न पर आयोजित पहले शिखर सम्मेलन में व्यस्त थे, मुंबई की एक अदालत बाल यौन उत्पीड़न के एक मामले में कार्रवाई नहीं करने के आरोप में उनके और दो अन्य चर्च पदाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई किए जाने की याचिका पर सुनवाई कर रही थी.

मुंबई के एक सेशन कोर्ट में दाखिल याचिका में, जिसकी प्रति दिप्रिंट के पास है, पीड़ित के पिता ने आरोप लगाया है कि उनके परिवार ने अगला पोप बनने की कतार में शामिल कार्डिनल ग्रेशस से मुलाकात कर उन्हें घटना की जानकारी दी थी, पर न तो उन्होंने इस पर कोई कार्रवाई की, और न ही पुलिस को इसकी सूचना दी.


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‘पादरी द्वारा शोषण’

दिसंबर 2015 में पीड़ित के परिवार ने पुलिस में रपट लिखाई कि शिवाजी नगर, गोवंडी के एक चर्च के मुख्य पादरी फादर लॉरेंस जॉन्सन ने चर्च के भीतर उनके बच्चे का यौन शौषण किया.

परिवार को कथित यौन उत्पीड़न की जानकारी 27 नवंबर 2015 को पता चली थी.

पुलिस में दर्ज़ रिपोर्ट के अनुसार जॉन्सन ने चर्च आए किशोर को एक बक्सा हटाने के लिए स्टोररूम में बुलाया. फिर उन्होंने अंदर से दरवाज़ा बंद कर उसके साथ यौन दुराचार किया. एक मेडिकल रिपोर्ट में भी लड़के के गुप्तांगों में चोट के निशान मिलने की बात लिखी गई है.

2017 में अदालत ने जॉन्सन के खिलाफ अप्राकृति सेक्स अपराध संबंधी भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत, और पॉक्सो कानून के तहत आरोप निर्धारित किए थे. 2015 के इस मामले में अदालत में प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज़ (पॉक्सो) कानून के तहत याचिका दायर की गई है.

याचिका में ज़ोनल बिशप डोमिनिक सैवियो और बिशप जॉन रोड्रिगेज़ के भी नाम दिए गए हैं. बिशप सैवियो पर पीड़ित परिवार की मदद की गुहार अनसुनी करने के, और मामले की जांच करने और बयान रिकॉर्ड करने वाले बिशप रोड्रिगेज़ पर परिवार के साथ जांच के तथ्य साझा नहीं करने के आरोप लगाए गए हैं.

बिशप सैवियो और बिशप रोड्रिगेज़ ने दिप्रिंट के कॉल का जवाब नहीं दिया. उनकी प्रतिक्रिया मिलने पर इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.

कोर्ट में पीड़ित का पक्ष देख रहे वकील चारमीन बोकारो ने दिप्रिंट को बताया, ‘हमने अपनी याचिका में कहा है कि तीनों (आर्कबिशप और दो अन्य) ने शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की, इसलिए अदालत इसमें दखल दे. इसमें पॉक्सो एक्ट की धारा 19 के प्रावधानों के तहत उचित कार्रवाई की जानी चाहिए. कोर्ट ने आरोपियों और अभियोजन पक्ष से जवाब दाखिल करने को कहा है.’

पॉक्सो कानून की धारा 19 के प्रवाधानों के अनुसार अवस्यक समेत किसी भी व्यक्ति को इस कानून के तहत अपराध किए जाने या इसकी आशंका होने पर, इसकी जानकारी किशोरों के लिए गठित विशेष पुलिस इकाई या स्थानीय पुलिस को देनी होगी.

‘कार्डिनल ने कोई कदम नहीं उठाया’

याचिका में कहा गया है कि कथित यौन शोषण की जानकारी मिलने के तुरंत बाद परिवार ने जोनल बिशप सैवियो को इसकी सूचना दी थी.

इसमें कहा गया है, ‘प्रथम सूचनादाता को कोई जवाब नहीं मिला और वह आर्कबिशप कार्डिनल ओस्वाल्ड ग्रेशस से मिलने कोलाबा स्थित उनके घर पर गया.’

‘कार्डिनल ने तीन दिन चक्कर कटवाने के बाद आखिरकार उन्हें 30 नवंबर 2015 को 5 मिनट का अप्वाइंटमेंट दिया, जब वह रोम के लिए रवाना हो रहे थे. फादर लॉरेंस जॉन्सन द्वारा यौन शोषण की घटनाओं के बारे में सूचित किए जाने के बाद भी भी कार्डिनल ने न तो कोई कार्रवाई की और न ही मामले की सूचना पुलिस को दी, जैसा कि पॉक्सो कानून की धारा 19 के तहत आवश्यक है.’

इसके बात पीड़ित के परिवार ने शिवाजी नगर पुलिस स्टेशन में रपट लिखाई. पीड़ित के परिवार ने यह भी कहा कि अगस्त 2018 से ही आर्कबिशप का सचिव उनसे संपर्क करता रहा है. उनकी शिकायत के अनुसार ‘अगस्त-सितंबर 2018 से ही फादर केटी इम्मैनुएल प्रथम सूचनादाता और उनकी पत्नी को कार्डिनल से मिलने के लिए कह रहे हैं.’

‘कोर्ट में उचित रूप से जवाब देंगे’

बॉम्बे आर्चडायसिस के प्रवक्ता फादर नाइजल बैरेट ने कहा, ‘उस दौरान बिशप डोमिनिक सैवियो शहर में भी नहीं थे, इसलिए मुंबई में उनके नहीं होने के बावजूद कार्रवाई नहीं करने के लिए उन्हें उत्तरदायी ठहराना ठीक नहीं है. बाकी बातों के संबंध में, चूंकि मामला न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है, याचिका पर हम कोर्ट में उपयुक्त जवाब देंगे.’

पीड़ित परिवार के कोर्ट में याचिका दायर करने से पहले बीबीसी ने कार्डिनल ग्रेशस से पूछा था कि क्या उन्हें मामले की सूचना पुलिस को नहीं देने का खेद है. इस पर उन्होंने कहा, ‘आप जानते हैं कि मैं ईमानदार हूं, मैं सौ फीसदी निश्चित नहीं हूं. पर मुझे उस पर चिंतन करना चाहिए. मैं मानता हूं कि मामले में पुलिस को तत्काल शामिल करना चाहिए था, निश्चय ही.

समुदाय एकमत नहीं

हालांकि, मुंबई के कैथोलिक समुदाय के लोग इस बात पर एकमत नहीं हैं कि क्या कार्डिनल को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए.

बॉम्बे कैथोलिक सभा के पूर्व अध्यक्ष डॉल्फी डिसूज़ा ने कहा, ‘यह तथ्य कि संबंधित मामले में अदालती सुनवाई चल रही है, यह साबित करता है कि चर्च ने इसे दबाने की कोशिश नहीं की. यह आरोप लगाना गलत है कि कोई कार्रवाई नहीं की गई और उन बातों को वर्तमान परिस्थिति से जोड़ना ठीक नहीं है.’


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उन्होंने कहा, ‘चर्च इस पर चिंतन कर रहा है और पोप यौन उत्पीड़न के व्यापक मुद्दे को लेकर बहुत चिंतित हैं. ऐसी परिस्थितियों के मद्देनज़र एक ठोस व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, वरना इसमें ना सिर्फ चर्च का नाम घसीटा जाता है, बल्कि इससे लोगों की आस्था भी प्रभावित होती है.’

परंतु, एसोसिएशन ऑफ कंसर्न्ड कैथोलिक्स के सचिव मेल्विन फर्नांडिस कहते हैं, ‘फादर लॉरेंस के खिलाफ इस मामले के अब चार साल हो गए हैं, पर अभी तक उन्हें हटाया नहीं गया है. ऐसे में कार्डिनल कैसे वेटिकन में बाल यौन शोषण संबंधी अंतर्राष्ट्रीय पैनल के सदस्य बन सकते हैं? उन्हें पहले अपना घर ठीक करना चाहिए.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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