दिल्ली के रामलीला मैदान से गरिमा यात्रा की तस्वीर | शुभम सिंह
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‘करीब 6 साल पहले की बात है. मेरा पड़ोसी बहुत दिनों से अजीबोगरीब हरकतें करता था. एक रात मेरे पति शादी में गए थे और मेरे बच्चे अपने दादा-दादी के घर गए थे. मैं अकेले थी. वह(मेरा पड़ोसी) मेरे घर में कूदा और मेरा रेप कर दिया. मैं चीखी, चिल्लाई लेकिन कोई बचाने नहीं आया.’

आपने केस नहीं किया.

‘सब किया. कोर्ट गई. वहां जज साहब कहते हैं कि तुम्हारा पति तुम्हें अकेले घर छोड़ कर क्यों गया. उसको नहीं छोड़ना था. गलती तुम्हारे पति की है.’

और ‘इस तरह मैं केस हार गई.’

40 साल की उर्मिला अपने साथ हुए दुष्कर्म का केस भले ही जिला कोर्ट में हार गईं हो, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी है.

लेकिन वो अकेली नहीं है. परिवार से लेकर समाज तक और पुलिस थाने से लेकर अदालत तक देश की आधी आबादी परेशान है. अपने साथ होने वाली किसी न किसी तरह के उत्पीड़न को लेकर. सदियों से चुपचाप यातनाएं झेल रही महिलाएं. लेकिन अब जमाना बदल गया है. अब वे उस कड़वी सच्चाई से ऊपर उठ रही हैं. जिसमें कहा जाता है कि किसी भी घटना के बाद वे चुप हो जाएंगी, शर्म के मारे घर के अंदर छुप जाएंगी, इज्जत के डर से सबसे सच्चाई छुपा लेंगी और सारा दोष अपने सर पर ले लेंगी. अब महिलाएं धीरे-धीरे ही सही, अपने ऊपर हो रहे जुर्म के खिलाफ़ आवाज़ उठाने लगी हैं.

गरिमा यात्रा

ऐसी ही हज़ारों की संख्या में महिलाएं रामलीला मैदान पर मौजूद थी. मौका था, देश में बच्चों और महिलाओं पर होने वाले यौन अपराध को समाप्त करने के सामूहिक प्रयास में डिग्निटी मार्च ने आज ‘नेशनल नेटवर्क ऑफ सरवाइवर्स’ के लांच किए जाने की घोषणा की. डिग्निटी मार्च में हज़ारों की संख्या में बलात्कार और यौन हिंसा से पीड़ित होने वाले लोगों ने सामूहिक पदयात्रा की.

22 दिसंबर से मुंबई में शुरू हुई इस पदयात्रा का आज दिल्ली में अंतिम पड़ाव था. जिसमें 10 हज़ार किलोमीटर की दूरी तय की गयी. यह यात्रा भारत के 200 जिलों से अधिक जिलों से होकर गुजरी , जिसे समाज के हर वर्ग का समर्थन मिला.

अलग-अलग राज्यों से आईं महिलाओं ने सुनाई अपनी आपबीती 

दिल्ली के रामलीला मैदान में आज कोई महाराष्ट्र से था तो कोई मध्यप्रदेश से. यूपी के झांसी से भी महिलाएं थी तो राजस्थान के निराला से भी महिलाएं शिरकत कर रही थी.

बैतूल मध्यप्रदेश से आई ललिता अपनी कहानी सुनाते हुए कहती हैं, ‘मैं काम ढ़ूढ रही थी. मेरे गांव की एक महिला ने मुझे एक आदमी से परिचय कराया और कहा कि 300 रुपये मिलेंगे काम के. मैं उनपर भरोसा करते हुए उस आदमी के पास गई. लेकिन उस आदमी ने मुझे काम देने की बजाय पहले मेरा दुष्कर्म किया फिर 55 हज़ार रुपये में मुझे बेच दिया. मैं वहां से किसी तरह 6 महीने यातना झेलने के बाद, उनके चंगुल से छूटी हूं. मुझे न्याय चाहिए.’

इस पदयात्रा में कुछ ऐसी भी महिलाएं है, जिनकी बेटियों के साथ दुष्कर्म हुए हैं.

इन्हीं में से एक हैं गीता. वे बताती हैं कि ‘मेरी 8 साल की बेटी के साथ एक रोज स्कूल जाते वक्त ब्लात्कार हुआ. आज लगभग पांच साल बीत जाने के बाद भी दोषियों को सजा नहीं मिल सकी है. बल्कि उल्टा पुलिस ने केस बंद कर दिया. मैं हर किसी से गुहार लगाई लेकिन किसी ने मदद नहीं की.’

मार्च 2017 से यूपी में योगी आदित्यनाथ की सरकार है. जिसने महिला सुरक्षा को लेकर तमाम वादे किए थे. क्या आपने उनसे मदद की गुहार नहीं लगाई ?

गीता आगे बताती हैं, ‘मैं योगी आदित्यनाथ के यहां नखलऊ भी गई थी, लेकिन उन्होंने भी मुझे झूठा आश्वासन देकर कहा तुम जाओ यहां से, तुम्हारा काम हो जाएगा. लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ.’

तो क्या अब आपको न्याय की उम्मीद है ?

‘मैं इस गरिमा यात्रा वाली संस्था से पिछले दो साल से जुड़ी हूं. और इन्होंने हमारी बहुत मदद की है. हमें वकील मुहैया कराया है और केस को फिर से खुलवा दिया है. यही नहीं मेरी बेटी की भी काफी मदद की जिससे वो दूबारा स्कूल जाने लगी है.’

राष्ट्रीय गरिमा अभियान

नेशनल नेटवर्क ऑफ सरवाइवर्स, भारत के 25 राज्यों और 250 जिलों के 25,000 पीड़ित व उनके परिवार के सदस्यों को मोबिलाइज एवं ओरिएंट करने का पहला अखिल-भारतीय नेटवर्क है.

राष्ट्रीय गरिमा अभियान, डिग्निटी मार्च के समन्वयक, आशिफ शेख बताते हैं कि, ‘जब हमने डिग्निटी मार्च शुरू किया, तो हमारा उद्देशय बच्चों और महिलाओं को बिना किसी शर्म के यौन हिंसा से जुड़े अपने अनुभवों के बारे में बताने के लिए प्रोत्साहित करना और पीड़ितों को शर्मिंदा करने वाली व्यापक संस्कृति को रोकना था.’

इस पदयात्रा में शामिल ज्यादातर महिलाएं ग्रामीण पृष्ठभूमि से हैं. जिनकी दुखद कहानी मीटू आंदोलन के जरिए सामने नहीं आ सकी. इस पदयात्रा में शामिल हो कर उन्हें मौका मिला है. अपनी बात खुलकर रखने का.

उन्होंने आगे कहा कि ‘ यह दुर्भाग्य की बात है कि जहां बलात्कार की घटनाओं को लेकर लोगों में काफी आक्रोश हैं,वहीं  लाखों पीड़ित विशेषकर बच्चे व्यावसायिक यौन शोषण एवं सामुदायिक व्याभिचार के दलदल में फंसे हैं. और समाज का कहना है कि चूंकि उन्होंने पैसा दिया है, इसलिए यह बलात्कार नहीं है. आज डिग्निटी मार्च समाप्त हो गया है, लेकिन यौन अपराधों के शिकारों के हितों की रक्षा और यौन अपराधियों के खिलाफ एक राष्ट्रीय आंदोलन की शुरुआत है.’


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