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Thursday, 13 June, 2024
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‘पिता-तुल्य’ हैं मोदी, योगी की जीत ‘क्षणिक सफलता’ नहीं है: हिंदुत्ववादी मीडिया ने BJP की जीत पर कहा

पेश है दिप्रिंट का इस बारे में राउंड-अप कि पिछले कुछ हफ्तों में हिंदुत्व समर्थक मीडिया ने किस तरह से समाचारों और सामयिक मुद्दों के बारे में खबर छापी और उन पर कैसी टिप्पणियां की.

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नई दिल्ली: इस महीने हुई मतों की गिनती में पांच में से चार विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत, निजीकरण और बेरोजगारी के मुद्दे, बॉलीवुड फिल्म द कश्मीर फाइल्स में कश्मीरी पंडितों के पलायन का चित्रण- ये कुछ ऐसे विषय हैं जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), भाजपा और उनके सहयोगी संगठनों से संबद्ध प्रकाशनों के पन्नों पर छाए रहे.

‘ऑर्गेनाइजर’ और ‘पांचजन्य’, जो आरएसएस से संबद्ध क्रमशः अंग्रेजी और हिंदी में छपने वाली पत्रिकाएं हैं, में उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की जीत पर कवर स्टोरीज (आवरण कथाएं) छपी हैं जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मनोनीत मुख्यमंत्री की पूरे पेज की तस्वीर भी शामिल की गई.

इस बीच, कई दक्षिणपंथी संगठन अब इस बात पर अपनी रणनीति बना रहे हैं कि उस बेरोजगारी को कैसे मिटाया जाए, जो इस वक्त देश की एक प्रमुख आर्थिक समस्या बना हुआ है.


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बेरोजगारी से निपटना और राष्ट्रहित को ध्यान में रखना

स्वदेशी जागरण मंच (एसजेएम) द्वारा प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘स्वदेशी ऑनलाइन’ ने इस महीने ‘बेरोजगारी से निपटने के लिए आठ दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा चलाये जा रहे एक आंदोलन, ‘स्वावलंबी भारत अभियान’ पर एक कवर स्टोरी छापी.

पत्रिका में कहा गया, ‘भले ही भारत को दुनिया का सबसे युवा राष्ट्र माना जाता है, मगर बेरोजगारी आज देश के सामने मौजूद सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है. हमारा उद्देश्य प्रत्येक भारतीय नागरिक को गरीबी रेखा से ऊपर लाना और प्रत्येक नागरिक को रोजगार प्रदान करना है.’

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इस अभियान में शामिल आठ संस्थाएं हैं: एसजेएम, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी), सहकार भारती, लघु उद्योग भारती, ग्राहक पंचायत, भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस), भारतीय किसान संघ और भाजपा.

उन्होंने फरवरी महीने में एक तीन दिवसीय बैठक भी आयोजित की जहां सभी संगठनों ने अपनी-अपनी योजनाओं और रणनीतियों को प्रस्तुत किया. लेकिन इस सारी चर्चा का किसी अंतिम योजना में तब्दील होना अभी बाकी है.

‘स्वदेशी ऑनलाइन’ के ही एक अन्य लेख में लेखक और पूर्व सिविल सर्वेंट के. के. श्रीवास्तव ने ‘कॉरपोरेट फ्रीडम बनाम राष्ट्रीय हित’ का सवाल उठाया.

टाटा समूह द्वारा एयर इंडिया का नेतृत्व करने के लिए तुर्की एयरलाइंस के पूर्व अध्यक्ष इल्कर आयसी को चुने जाने का उदाहरण देते हुए लेखक ने सवाल किया कि कैसे कोई कॉर्पोरेट संगठन राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों के प्रति ‘असंवेदनशील’ बना रह सकता है. हालांकि, आयसी ने बाद में यह पद लेने से इनकार कर दिया था.

श्रीवास्तव ने लिखा, ‘एयर इंडिया के पास प्रशिक्षित पायलट हैं, बड़ी विमानन संपत्तियां है लेकिन खराब प्रबंधन के कारण यह लाभ से वंचित रहा है. टाटा समूह ने भले ही इसके प्रबंधन से जुडी समस्या को सुलझाने के लिए व्यावसायिक रूप से सफल आयसी का चयन किया हो लेकिन उनकी नियुक्ति से पहले देश के हितों को ध्यान में रखा जाना चाहिए था. बिना गहन जांच के उन्हें नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए था.’


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यूपी के नतीजों के लिए मोदी, योगी की प्रशंसा

21 मार्च को ‘पांचजन्य’ में छपे एक लेख में आरएसएस की राष्ट्रीय कार्यकारणी के सदस्य राम माधव ने 2022 में हुए पांच विधानसभा चुनावों में से चार में भाजपा की जीत के लिए जिम्मेदार तीन कारकों के बारे में बताया.

सबसे पहले, पीएम मोदी को ‘पिता तुल्य पुरुष’ कहते हुए माधव ने कहा कि पीएम लोगों के साथ एक सीधा संबंध स्थापित करते हैं और एक पिता की तरह बच्चों की शिक्षा से लेकर बुजुर्गों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं तक सभी का ख्याल रखते हैं.’

दूसरा, उन्होंने कहा कि 2014 के संसदीय चुनाव के बाद भाजपा का संगठनात्मक तंत्र पहले से काफी मजबूत हुआ है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की वजह से भाजपा में कथित रूप से दरकिनार किए गए माधव ने पूर्व भाजपा अध्यक्ष को भी पार्टी की इस बड़ी जीत का श्रेय देने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

उन्होंने आगे कहा कि तीसरा कारण है भाजपा का सांस्कृतिक, राष्ट्रवादी राजनीतिक दर्शन, जिसे इसके आलोचकों द्वारा घृणास्पद और बहुसंख्यकवादी कहा जाता है लेकिन दरअसल यही भारत की संस्कृति और सभ्यता की आत्मा है. उन्होंने लिखा कि पीएम की ‘डबल इंजन’ सरकार केवल एक चुनावी नारा नहीं है, बल्कि यह राज्य के मुख्यमंत्रियों पर बेहतर प्रदर्शन हेतु दबाव भी बनाती है.

माधव ने स्वच्छ छवि वाले नेता, कुशल एवं विकास केंद्रित प्रशासक और लोगों के कल्याण के लिए काम करने वाले राजनेता के रूप में खुद को साबित करने के लिए योगी आदित्यनाथ की भी प्रशंसा की.

14 मार्च को ‘ऑर्गेनाइजर’ में छपे ‘एम-वाई: यूपी योगी कॉम्बिनेशन ‘ शीर्षक वाले एक लेख में, लेखक नीरेंद्र देव ने लिखा है कि ‘योगी आदित्यनाथ की प्रचंड जीत से यह पता चलता है कि उनकी राजनीतिक जीत न तो कोई क्षणिक सफलता है और न ही किन्हीं खास परिस्थितियों की उपज है’. लेखक ने पीएम मोदी के साथ योगी आदित्यनाथ, अमित शाह और जेपी नड्डा (इसी क्रम में) को इसका मुख्य श्रेय दिया.

मोदी के बारे में उन्होंने लिखा: ‘उन्होंने एक ऐसे हिंदू नेता की अपनी विजयी छवि को सबके सामने प्रस्तुत किया है जो भारत के विकास के लिए कड़ी मेहनत करता है. यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उस परिदृश्य में शामिल दिखते हैं.’

‘ऑर्गेनाइजर’ के संपादक प्रफुल्ल केतकर ने ‘असेंबली पोल्स रिजल्ट्स : रेडिफाइनिंग इंडियाज़ डेस्टिनी ’ शीर्षक से एक लेख लिखा, जिसमें कहा गया है कि ये परिणाम ‘इसकी [भाजपा की] उस तरह की राजनीति का जोरदार समर्थन करते हैं, जो हिंदुत्व के प्रति अपनी प्रतिबद्धता, राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर समझौता न करने वाले रुख और विकास एवं कल्याणकारी योजनाओं के सावधानीपूर्वक कार्यान्वयन के रूप में परिलक्षित होता है.’

केतकर ने लिखा, ‘ये चुनाव परिणाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो राजनीति में बहुत सारी ऊर्जा और एक उद्देश्य लेकर आये हैं, की स्थायी अपील को भी दर्शाते हैं. पीएम मोदी से प्रेरणा लेते हुए यूपी की ‘डबल इंजन’ सरकार ने भी राज्य में प्रशासन के काम करने के तरीके को बदल दिया है.‘

केतकर ने आगे लिखा, ‘योगी आदित्यनाथ के तहत, यूपी ने मजबूत आर्थिक और सामाजिक विकास, बहुआयामी विकास की पहल, सेवाओं के प्रभावी वितरण एवं कल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन तथा कानून-व्यवस्था की स्थिति में हुआ सुधार देखा है’.

ऑर्गेनाइजर के संपादक ने आगे कहा, ‘भ्रष्टाचार और अपराध पर उनके जीरो टॉलरेंस ने उन्हें ‘बुलडोजर बाबा’ की उपाधि दिलवाई है … अपराधियों के विरुद्ध की गई उनकी कार्रवाई का राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर एक स्पष्ट प्रभाव पड़ा, जिसे उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वी भी स्वीकार करते हैं.’


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‘लैंड जिहाद’

16 मार्च को ऑर्गेनाइजर ने ‘लैंड जिहाद’ नामक एक लेख भी प्रकाशित किया, जिसमें उसने तमिलनाडु के वेल्लोर में मुसलमानों द्वारा हिंदुओं की भूमि पर कब्ज़ा कर मस्जिद बनाने का आरोप लगाया.

इस लेख में लिखा गया, ‘लैंड (भूमि) जिहाद के एक हिस्से के रूप में मुसलमान अब हिंदू बहुल रिहायशी इलाकों में मस्जिद बनाने के इच्छुक हैं और इसने विधानसभा और हाल ही में स्थानीय निकाय चुनावों में द्रमुक की जीत के बाद और गति पकड़ी है.‘

इसने उन घटनाओं की श्रृंखला, जिनके कारण भूमि के स्वामित्व को लेकर हिंदुओं और मुसलमानों के एक समूह के बीच संघर्ष हुआ था, के बारे में विस्तार से बताया, ‘तमिलनाडु में मस्जिदों की बाढ़ सी आ गई है. द्रमुक की जीत से उत्साहित इस्लामवादी ताकतें अब हिंदू बहुल इलाकों में मस्जिदों के लिए जमीन हथियाने और उन्हें बनाने में लगे हैं.’ .


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‘अगर आप चलाक हो और पीएम, राष्ट्रपति बनना चाहते हो तो बीएमएस मत ज्वाइन करो’

अपनी मासिक पत्रिका ‘विश्वकर्मा संकेत’ के मार्च महीने के संस्करण में भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने कहा कि वह सरकार द्वारा संचालित जीवन बीमा निगम (एलआईसी) को शेयर बाजार में सूचीबद्ध किये जाने का समर्थन नहीं करेगा.

बता दें कि भारत की सबसे बड़ी जीवन बीमा कंपनी एलआईसी जल्द ही अपना इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (आईपीओ) लाने जा रही है. इस बारे में बीएमएस ने दावा किया कि यह एलआईसी के निजीकरण की दिशा में पहला कदम है.

इसमें कहा गया, ‘बीएमएस केंद्र की निजीकरण की नीतियों के खिलाफ एक आंदोलन भी शुरू करेगा. हम 17 नवंबर 2022 को निजीकरण के खिलाफ एक रैली का आयोजन करेंगे जिसमें बीमा क्षेत्र के लाखों कर्मचारी और अभिकर्ता (एजेंट) भी भाग लेंगे.’

बीएमएस के पूर्व अध्यक्ष हसुभाई दवे ने ‘इंडिविजुअल-सेंट्रिक लीडरशिप ‘ शीर्षक वाले लेख में नेतृत्व के लिए कुछ सुझाव दिए.

उन्होंने लिखा, ‘भारत में कोई भी ऐसा संगठन नहीं है जहां किसी व्यक्ति की वाहवाही करना मना हो लेकिन ऐसे में पूरा संगठन एक व्यक्ति के करिश्मे पर आधारित लगता है. मगर ऐसे ही नेता संगठन को आगे बढ़ने में मदद करने की कोशिश नहीं करते क्योंकि उन्हें संगठन के सदस्यों पर से अपनी पकड़ खोने का डर होता है.’

दवे ने बिना किसी का नाम लिए लिखा, ‘जब केंद्र सरकार की इकाइयों के किसी विभाग में मंजूरी मिल जाती है तो यही नेता जी-तोड़ कोशिश करते हैं ताकि संगठन आगे न बढ़े. क्योंकि संगठन का विस्तार करने से नए कार्यकर्ता बढ़ते हैं और किसी दिन ये नए कार्यकर्ता आगे आ सकते हैं. लेकिन इन दिनों, नेता लोग सोचते है कि दूसरों को कैसे दूर रखा जाए.’

उन्होंने आगे लिखा, ‘ऐसे में एक नेता तो चमक सकता है लेकिन संगठन कमजोर हो सकता है. केंद्रीय नेतृत्व और सामूहिक नेतृत्व के बीच यही प्राथमिक अंतर है.’

उन्होंने लिखा, ‘इसलिए अगर आप होशियार हैं तो बीएमएस ज्वाइन न करें. प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति बनें लेकिन हम देश के गौरव को फिर से हासिल करने के लिए काम करते रहेंगे. लोग तो आते-जाते रह सकते हैं.’


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‘द कश्मीर फाइल्स’ के बारे में

इस बीच, दक्षिणपंथी मीडिया प्लेटफॉर्म और टिप्पणीकार (कमेंटेटर) फिल्म निर्माता विवेक रंजन अग्निहोत्री द्वारा बनाई गई और कश्मीरी पंडितों के पलायन पर आधारित फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ का प्रचार भी कर रहे हैं. यह फिल्म 11 मार्च को सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी और बड़े पैमाने पर मिली व्यावसायिक सफलता के साथ चल रही है.

14 मार्च को छपे एक आलेख में ‘पांचजन्य’ ने दावा किया कि परिवार के बुजुर्ग लोग अपने छोटे सदस्यों को यह फिल्म देखने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं. इसमें कहा गया है कि कुछ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वालों के लिए इस फिल्म को मुफ्त में भी दिखा रहे हैं..

भाजपा के पूर्व राज्य सभा सदस्य बलबीर पुंज ने 16 मार्च को पंजाब केसरी में एक लेख लिखकर बताया कि उन्हें क्यों लगा कि एक ‘खास वर्ग’ द कश्मीर फाइल्स का विरोध कर रहा है.

पुंज ने लिखा, ‘ऐसे लोगों में कुछ स्वयंभू धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल, वामपंथी नेता और स्वयंभू उदारवादी शख्स शामिल हैं, जो कश्मीरी पंडितों द्वारा झेली गयी धार्मिक भयावहता को चुनौती दे रहे हैं. वे इस फिल्म को ‘झूठे प्रचार’ और ‘इस्लामोफोबिया’ के प्रतीक के रूप में वर्णित कर रहे हैं, जबकि वे स्वयं धर्म के नाम पर कश्मीरी पंडितों के बीच हुए हताहतों की संख्या को कम करने की कोशिश किये हुए हैं.’

उन्होंने आगे लिखा, ‘वास्तव में, वे उस जिहादी मानसिकता का बचाव कर रहे हैं जिसने पिछले 1,300 वर्षों में भारत में अनगिनत स्थानीय निवासियों को मार डाला है, उनका जबरन धर्म परिवर्तन करवाया है, उनकी महिलाओं को वासना का शिकार बनाया है, सैकड़ों मंदिरों को नष्ट किया है और देश का इस्लाम के नाम पर खून से लथपथ विभाजन किया है.‘

पुंज ने तर्क दिया कि मोदी सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 और 35 ए को खत्म किये जाने के प्रयासों के अलावा विभिन्न सरकारों, अदालतों और ‘स्व-घोषित मानवाधिकार संगठनों’ ने कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की दिशा में कभी कोई गंभीर प्रयास ही नहीं किया.

शल्य चिकित्सक (सर्जन) और दक्षिणपंथी टिप्पणीकार अमित थडानी ने ‘स्वराज्य‘ पत्रिका में 15 मार्च को छपे एक लेख में कहा कि यह फिल्म काफी अच्छा प्रदर्शन कर रही है, पर इसलिए नहीं कि यह ‘वायलेंस पोर्न’ (हिंसक अश्लीलता) है, जैसा कि वामपंथी आलोचकों ने दावा किया है.

इसके बाद उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का हवाला दिया: ‘एक क्षण आता है, जो आता है जरूर लेकिन इतिहास में शायद विरले ही कभी, जब हम ‘पुराने’ से ‘नए’ की ओर कदम बढ़ाते हैं, जब एक युग समाप्त होता है और जब किसी राष्ट्र की आत्मा, लंबे समय से दबा हुआ, अपना स्वर प्राप्त करती है’. थडानी ने लिखा, ‘कश्मीर फाइल्स हमारे समय काल के लिए उसी प्रतिज्ञा को पूरा करना का वह क्षण है.’

थडानी ने दावा किया कि इस फिल्म में कई सारे पात्र वास्तविक व्यक्तियों पर आधारित हैं- अभिनेत्री पल्लवी जोशी द्वारा निभाया गया चरित्र जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की प्रोफेसर निवेदिता मेनन पर आधारित प्रतीत होता है तथा चिन्मय मंडलेकर द्वारा निभाया गया आतंकवादी पात्र यासीन मलिक के साथ कश्मीरी अलगाववादी बिट्टा कराटे के चरित्र के सम्मिलन पर आधारित है. उन्होंने ध्यान दिलाया कि मलिक ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से उनके आवास पर भी मुलाकात की थी. साथ ही थडानी ने दोनों की हाथ मिलाते हुए एक तस्वीर भी साझा की.

दैनिक जागरण में लिखते हुए पत्रकार अनंत विजय ने इस फिल्म की तुलना गुलजार की ‘माचिस ‘ और विशाल भारद्वाज की ‘हैदर ‘ से की और लिखा कि आज इस फिल्म का विरोध करने वाले वर्ग ने कभी भी मुजफ्फरनगर और गुजरात दंगों पर बनी फिल्मों का विरोध नहीं किया.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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