Sunday, 3 July, 2022
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BJP ने 2023 में MP में 51% वोट का रखा लक्ष्य, बूथ स्तर पर ‘तकनीक-आधारित’ माइक्रो-प्लान की कवायद शुरू

2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को कांग्रेस के मुकाबले कुछ ही अंतर से हार का सामना करना पड़ा था, जबकि दोनों दलों को करीब 41% वोट मिले थे. अब, कई राज्यों में जीत के बाद भाजपा ने मध्य प्रदेश में 2023 के अंत में प्रस्तावित चुनावों की तैयारियां अभी से शुरू कर दी हैं.

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नई दिल्ली: विधानसभा चुनावों में अपनी हालिया जीत से उत्साहित और 2018 में मध्य प्रदेश में कांग्रेस के हाथों मामूली अंतर से हार को शायद अब तक भुला नहीं पाई भाजपा ने 2023 के राज्य विधानसभा चुनावों के लिए जमीनी स्तर पर अभी से कवायद शुरू कर दी है.

भाजपा की चुनावी मशीनरी ने एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है, वो ये कि 2023 में मध्य प्रदेश में पार्टी का वोट-शेयर 41 प्रतिशत से बढ़ाकर 51 प्रतिशत करना है. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए पार्टी ने अपने 65,000 बूथ-स्तरीय प्रमुखों से माइक्रो-प्लान बनाने, तकनीकी का पूरा लाभ उठाने और दलित और आदिवासी समुदायों तक पहुंच बढ़ाने को कहा है.

मध्य प्रदेश के साथ-साथ इस साल के अंत या अगले साल विधानसभा चुनाव वाले कई राज्यों जैसे गुजरात, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान आदि में भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस ही है, जिसकी स्थिति कई राज्यों में पहले से ही काफी खराब हो चुकी है.

भाजपा ने पार्टी कार्यकर्ताओं को तीन विशेष कैटेगरी— लाभार्थी मतदाता, प्रभावशाली मतदाता और नाखुश मतदाता में मतदाताओं की मैपिंग करके हर निर्वाचन क्षेत्र में 10 प्रतिशत वोट-शेयर बढ़ाने का जिम्मा सौंपा है.

राज्य इकाई ने बूथ-स्तरीय कैडर से कहा है कि फीडबैक और टीम-निर्माण के लिए बनाए गए संगठन के तकनीकी ऐप ‘संगठन ’ के जरिये जमीनी स्तर पर शिकायतों को उठाएं और नियमित तौर पर सुझाव भी भेजें. संगठन नामक यह ऐप भाजपा कार्यकर्ताओं का डेटाबेस तैयार करेगा और उनकी गतिविधियों की जानकारी भी उपलब्ध कराएगा.

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मध्य प्रदेश के लिए भाजपा के प्रभारी पी. मुरलीधर राव ने दिप्रिंट को बताया, ‘राज्य भर में पार्टी की पहुंच और 10 प्रतिशत वोट-शेयर बढ़ाने के उद्देश्य से शीर्ष स्तर पर योजना बनाने के बजाये इस बार सभी मंडल और बूथ नेताओं को अपने माइक्रो-प्लान तैयार करने को कहा गया है. जरूरत पड़ने पर मदद के लिए राज्य इकाई और पार्टी के एक्सपर्ट भी मौजूद हैं. लक्ष्य 51 प्रतिशत वोट-शेयर हासिल करना है.’


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कांग्रेस के साथ कांटे का मुकाबला

भाजपा अब तक यह नहीं भूली है कि 2018 के पिछले चुनाव में कैसे उसने मध्य प्रदेश को कांग्रेस के हाथों गंवा दिया था.

पार्टी ने 109 सीटें जीती थीं, जो बहुमत के लिए जरूरी 115 के आंकड़े से कम थी, जबकि कांग्रेस को 230 सदस्यीय विधानसभा में 114 सीटें मिली थीं. कांग्रेस और भाजपा दोनों का वोट-शेयर लगभग बराबर था और दोनों दलों को 41 प्रतिशत वोट मिलने के बावजूद कांग्रेस को भाजपा से पांच सीटें अधिक मिली थीं.

चुनाव नतीजे आने के बाद कांग्रेस नेता कमलनाथ ने करीब एक वर्ष तक मुख्यमंत्री के तौर पर काम किया, जब तक कि 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया गुट की बगावत के कारण उनकी सरकार गिर नहीं गई. भाजपा नेता शिवराज सिंह चौहान ने उसी साल मार्च में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली, जो उनका चौथा कार्यकाल है.

यद्यपि, मध्य प्रदेश में 21.5 प्रतिशत आदिवासी मतदाता और 15.6 प्रतिशत दलित मतदाता हैं लेकिन इन समूहों के एक बड़े वर्ग ने 2018 में भाजपा को वोट देने में कोई खास उत्साह नहीं दिखाया था. राज्य की 47 सुरक्षित एसटी सीटें और 35 सामान्य सीटें ऐसी हैं जहां आदिवासी आबादी कम से कम 50,000 है. यहां 35 सुरक्षित दलित सीटें भी हैं.

2013 और 2018 के बीच भाजपा ने दलित और आदिवासी क्षेत्रों में कई सीटें गंवा दी थी, 2013 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 47 आदिवासी सीटों में से 31 पर जीत हासिल की थी लेकिन 2018 में यह संख्या घटकर 16 रह गई. 2018 में कांग्रेस को इनमें से 31 सीटें मिली थीं.

इसी तरह, 35 सुरक्षित दलित सीटों में से भाजपा ने 2013 के मुकाबले 2018 में 11 सीटें गंवा दी, 2013 में 28 की तुलना में 2018 में उसने सिर्फ 17 सीटों पर जीत हासिल की.

2003 में 10 वर्ष के अंतराल के बाद भाजपा मध्य प्रदेश में सत्ता में लौटी थी, जिस दौरान कांग्रेस के दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री रहे थे, उस समय भाजपा ने 47 आदिवासी सीटों में से 37 पर जीत हासिल की थी. पार्टी ने 2008 में यह आंकड़ा और सुधारा और 41 सीटों तक पहुंच गई. पिछले साल, मुख्यमंत्री चौहान ने उपचुनाव में व्यापक चुनाव प्रचार और समुदाय के लिए बड़ी घोषणाओं के सहारे कांग्रेस से आदिवासी बहुल जोबट सीट भी छीन ली.


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प्रौद्योगिकी आधारित माइक्रो-प्लान

2018 की हार से सबक लेते हुए भाजपा ने बूथ प्रमुखों और संगठन ऐप के इर्द-गिर्द केंद्रित चुनावी योजना पहले से ही तैयार कर ली है.

सभी 65,000 बूथ प्रमुखों के साथ-साथ कार्यकर्ताओं और मंडल कार्यकर्ताओं को आईटी सेल प्रमुखों और अपनी राजनीतिक गतिविधियों के विवरण के साथ अपने फोन नंबर और फोटो ऐप पर अपलोड करने को कहा गया है, ताकि सभी को रीयल टाइम में ट्रैक किया जा सके.

मुरलीधर राव ने कहा, ‘मध्य प्रदेश इकाई एक अनुभवी इकाई है, फिर भी इस ऐप के माध्यम से हम राज्य के विभिन्न हिस्सों, जिलों और यहां तक कि बूथों में उनकी राजनीतिक गतिविधियों को ट्रैक कर सकते हैं. यह केवल पार्टी कार्यकर्ताओं का एक डेटाबेस नहीं है, बल्कि कम समय में जमीनी स्तर पर लोगों से जुड़ने और गतिविधियों के प्रबंधन की व्यवस्था को सुधारेगा.’

जमीनी स्तर पर कैडर को मजबूत करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं. राज्य भाजपा महासचिव भगवान दास ने बताया, ‘हमने बूथ प्रमुखों से कहा है कि अधिक से अधिक मतदाताओं से जुड़ने के लिए वे स्थानीय स्तर पर दीनदयाल उपाध्याय जयंती, आंबेडकर जयंती, वाजपेयी की जयंती और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि जैसे कम से कम छह समारोह आयोजित करें, क्योंकि हर कार्यक्रम संपर्क स्थापित करने का एक साधन है.’

मतदाताओं के वर्गीकरण पर बात करते हुए एक अन्य भाजपा नेता ने कहा, ‘ज्यादातर बूथों पर चार प्रकार के मतदाता होते हैं— एक जो हिंदुत्व विचारधारा या अन्य कारणों से राज्य और केंद्र सरकार के काम से खुश है, दूसरे जो सरकारी योजनाओं के लाभार्थी है, एक तीसरा वर्ग है जिसमें प्रभावशाली मतदाता जैसे शिक्षक, प्रोफेसर और धार्मिक प्रमुख शामिल हैं और चौथा वर्ग नाखुश मतदाताओं का है. हमने जमीनी स्तर की हर इकाई से बेहतर चुनावी तैयारियों के लिए इन समूहों की रूपरेखा तैयार करने को कहा है.’

उन्होंने कहा, ‘लाभार्थी और प्रभावशाली मतदाता चुनाव परिणामों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं क्योंकि वे सरकार के पक्ष या विपक्ष में माहौल बनाते हैं. इसलिए हमें उन पर पहले से ध्यान देना होगा.’

महत्वपूर्ण दलित वोट-बेस तक पहुंचना सुनिश्चित करने के लिए पार्टी ने एक दलित बस्ती प्रभारी भी नियुक्त किया है जो 100 मतदाताओं के लिए जिम्मेदार होगा.

भाजपा के राज्य अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रमुख कैलाश जाटव ने कहा, ‘इन लोगों का काम कल्याणकारी योजनाओं पर अमल को सुविधाजनक बनाना और लक्षित दलित समूहों तक पहुंच बनाना है. यदि कोई समस्या आती है, तो हम एक कार्यक्रम भी शुरू कर रहे हैं जिसमें एक सरकारी अधिकारी ऑन-द-स्पॉट योजनाओं की मंजूरी या किसी भी तरह की कठिनाई को दूर करने के लिए दलित बस्तियों का दौरा करेगा.’

साथ ही, उन्होंने कहा कि पार्टी ने पिछले हफ्ते एक दलित एक्शन ग्रुप से जुड़े राहुल जाटव, इंदौर निवासी मुकेश कैरों और मालवीय सामाजिक संघ के नरेश रजक जैसे जातीय नेताओं से संपर्क साधा और उन्हें भाजपा के साथ लाने की कोशिश की. जाटव ने कहा, ‘मैंने उन सभी के साथ बातचीत के जरिये समुदाय की चिंताओं और समस्याओं को समझने की कोशिश की, जिन्हें हम सुलझा सकते है.’

भाजपा की प्रदेश इकाई पिछले कुछ समय से दलितों और आदिवासियों को अपने पालने में लाने की कवायद में जुटी है. पिछले साल, मुख्यमंत्री चौहान ने बिरसा मुंडा जयंती को जनजातीय गौरव दिवस घोषित किया था, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छह आदिवासी संग्रहालयों की स्थापना की घोषणा की, जिसमें एक मध्य प्रदेश में खोला जाएगा.

चौहान ने आदिवासी समुदाय को खुश करने के लिए ही 18वीं सदी की गोंड रानी, रानी कमलापति के नाम पर हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम बदला था और समुदाय को वन प्रबंधन के अधिकार देने और घरों के निर्माण के लिए पट्टा भूमि आवंटित करने जैसे उपायों की घोषणा भी की थी.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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