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Monday, 12 October, 2026
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दिल्ली में प्रदर्शन पर पाबंदियों को लेकर SC में नई याचिकाओं पर सुनवाई, रोक और ‘पुलिस ज्यादती’ पर फोकस

BNSS के सेक्शन 163 के तहत रोक लगाने का आदेश और BNSS के सेक्शन 172 की कानूनी मान्यता, जो पुलिस को निर्देश न मानने पर लोगों को हिरासत में लेने या हटाने का अधिकार देती है, को भी चुनौती दी गई.

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों पर लगाई गई पाबंदियों को चुनौती देने वाली एक नई याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमति दे दी. यह तब हुआ, जब वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की ज्यादतियों के आरोप उठाए.

शंकरनारायणन ने कहा कि याचिका में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत जारी प्रतिबंधात्मक आदेश को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं कराने और इस कानून के एक प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है.

भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि इस मामले को मंगलवार को इससे जुड़ी दूसरी याचिकाओं के साथ सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा. वह जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना वाली तीन जजों की बेंच का हिस्सा थे.

वकील असीमा मंडला ने समृद्धि दास की ओर से यह याचिका दायर की है. इसमें BNSS की धारा 163 के तहत 9 अक्टूबर को जारी प्रतिबंधात्मक आदेश और BNSS की धारा 172 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है. धारा 172 पुलिस को निर्देशों का पालन नहीं करने वाले लोगों को हिरासत में लेने या वहां से हटाने का अधिकार देती है.

याचिका में 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर होने वाले विरोध प्रदर्शन से पहले सार्वजनिक परिवहन और मोबाइल इंटरनेट पर लगाई गई पाबंदियों को भी चुनौती दी गई है. याचिका में कहा गया है कि इन पाबंदियों से बोलने की आजादी, शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने और आने-जाने के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ.

शंकरनारायणन ने बेंच को बताया कि वरिष्ठ वकील एम.आर. फरासत को सड़कों पर घसीटा गया, जबकि दो अन्य वकीलों को बसों में हिरासत में लिया गया.

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि लाठी और डंडे लेकर आए कुछ निजी लोगों ने बच्चों पर हमला किया. उन्होंने बच्चों के सिर पर भी वार किए, जबकि पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए कुछ नहीं किया. उन्होंने कहा कि वह इन कथित घटनाओं के वीडियो अदालत को दिखाएंगे.

वकीलों से बार-बार संयम बरतने की अपील किए जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “मैं उम्मीद करता हूं कि अदालत पुलिस से भी यही बात कहेगी.”

चीफ जस्टिस ने कहा कि हर वकील और बार के हर सदस्य को तय जगहों पर शांतिपूर्ण गतिविधियों में हिस्सा लेने का अधिकार है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट को ऐसी जगह नहीं बनने दिया जा सकता, जहां अव्यवस्था पैदा हो.

अलग से, राज्यसभा सांसद और डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (DYFI) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ए.ए. रहीम ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर की है. इसमें आरोप लगाया गया है कि 11 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में DYFI के सदस्यों को पुलिस ने हिरासत में लिया और उनके साथ मारपीट की.

रहीम की याचिका के मुताबिक, जंतर-मंतर की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों को कथित तौर पर दोपहर करीब 12.30 बजे घसीटकर एक बस में बैठाया गया और एक सुनसान जगह पर ले जाया गया. इसके बाद उन्हें पांच हिस्सों में बंटे एक पुलिस वाहन में ले जाया गया.

याचिका में आरोप लगाया गया है कि वाहन के अंदर हिरासत में लिए गए लोगों को पीटा गया. बाद में उन्हें सूरजमल स्टेडियम ले जाया गया, जहां उन्हें शाम करीब 7.30 बजे तक रखा गया.

रहीम का दावा है कि पुलिस ने गिरफ्तारी मेमो नहीं बनाए, हिरासत में लिए गए लोगों को यह नहीं बताया कि उन्हें किस वजह से हिरासत में लिया गया है और उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने भी पेश नहीं किया गया.

याचिका में स्वतंत्र और अदालत की निगरानी में जांच कराने, CCTV फुटेज और वाहनों की लोकेशन से जुड़े रिकॉर्ड सुरक्षित रखने, घटना में शामिल पुलिसकर्मियों की पहचान करने, मुआवजा देने और विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिरासत में लेने के लिए दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई है.

इस याचिका में सुप्रीम कोर्ट के 11 अक्टूबर के उन निर्देशों का भी जिक्र किया गया है, जिनमें BNSS की धारा 163 लागू होने वाले इलाकों के बाहर शांतिपूर्ण और बिना हथियार वाले लोगों के समूहों को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लेने से रोकने की बात कही गई थी.

ये याचिकाएं राजधानी में चल रहे विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी दूसरी याचिकाओं के साथ जुड़ गई हैं. इनमें अदालत की अवमानना और बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) से जुड़ी याचिकाएं भी शामिल हैं.

फॉर्म 6 का मामला

इस बीच, सोमवार को इसी तरह की बेंच ने स्पष्ट किया कि उसने मतदाता पंजीकरण के लिए चुनाव आयोग के संशोधित फॉर्म 6 को न तो मंजूरी दी है और न ही उसे खारिज किया है.

बेंच मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के SIR से जुड़े कथित एकतरफा फैसलों को चुनौती देने वाली एक नई याचिका पर सुनवाई कर रही थी.

फॉर्म 6 पहली बार वोट देने वाले मतदाता भरते हैं. कई राज्यों में चल रही SIR प्रक्रिया के दौरान इसे बदले हुए प्रारूप में लागू किया गया है.

सुप्रीम कोर्ट पहले ही उन याचिकाओं पर नोटिस जारी कर चुका है, जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त के फॉर्म 6 में बदलाव करने के फैसले को रद्द करने की मांग की गई है. याचिकाओं में कहा गया है कि यह बदलाव नियमों के मुताबिक नहीं था.

सोमवार को भी बेंच ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR से जुड़ी याचिकाओं पर फैसला सुनाया था, तब संशोधित फॉर्म 6 मौजूद नहीं था.

बेंच ने कहा कि चीफ जस्टिस की 5 अक्टूबर को की गई इस टिप्पणी का यह मतलब नहीं निकाला जा सकता कि अदालत ने संशोधित फॉर्म 6 को मंजूरी दी थी या उसे खारिज किया था. उस समय यह मुद्दा अदालत के सामने आया ही नहीं था.

जस्टिस बागची ने कहा, “हमने सिर्फ यह कहा था कि जब बिहार में SIR का मामला हमारे सामने था, तब नया फॉर्म 6 मौजूद नहीं था. इसका मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने उसे मंजूरी दी थी या खारिज किया था.”

उन्होंने यह टिप्पणी तब की, जब नई याचिका के संबंध में पेश हुए वकील ने फॉर्म 6 का मुद्दा उठाया.

वकील ने 5 अक्टूबर को चीफ जस्टिस की टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा कि फॉर्म का नया प्रारूप लागू करने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी नहीं मिली थी. इसलिए अदालत को इस मुद्दे पर विचार करना चाहिए.

वकील ने कहा, “5 अक्टूबर को इस अदालत ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि भारत के सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म 6 को मंजूरी नहीं दी थी. लेकिन चुनाव आयोग ने प्रकाशित किया है कि बदले हुए फॉर्म 6 को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिल गई है. यह बहुत अहम बात है. मैं इस संबंध में निर्देश देने की मांग कर रहा हूं.”

इस पर चीफ जस्टिस ने कहा, “नए फॉर्म 6 को लेकर कोई याचिका हमारे सामने नहीं थी. हमने सिर्फ इतनी ही बात कही थी. उसे मंजूरी मिली थी या नहीं, यह अलग बात है. कृपया अपनी सुविधा के हिसाब से हमारी बातों में से कुछ शब्द चुनकर उनका मतलब न निकालें.”

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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